
Kailash Mansarovar: जीवन की सबसे अमूल्य अनुभूतियों में से एक ‘आकाश से कैलाश – मानसरोवर दर्शन’
महेश बंसल
कैलाश-मानसरोवर… यह केवल एक स्थान नहीं, बल्कि आस्था का शिखर है। वर्षों से इस दिव्य धाम के दर्शन की अभिलाषा मन में संजोए हुए था। किंतु जब बुलावा आया, तब आयु 70 वर्ष पार कर चुकी थी। लगा जैसे गत वर्ष किए गए आदि कैलाश और ॐ पर्वत के दर्शन का ही प्रताप है कि अब स्वयं कैलाश का आह्वान हुआ।
नियमानुसार 10 वर्ष से कम और 70 वर्ष से अधिक आयु के श्रद्धालुओं को सड़क मार्ग से यात्रा का परमिट नहीं मिलता। ऐसे में नेपालगंज से विभिन्न ट्रैवल एजेंसीयों द्वारा संचालित चार्टर हवाई यात्रा ही एकमात्र विकल्प बनती है, जहां आकाश से कैलाश और मानसरोवर के दर्शन कराए जाते हैं।
जब विमान नयनाभिराम हिम आच्छादित हिमालय की ऊँचाइयों को पार करता हुआ आगे बढ़ा, तो खिड़की के उस पार जो दृश्य उभरा, उसने मन को स्तब्ध कर दिया। बादलों की परतों के बीच, नीले आकाश की पृष्ठभूमि में एक दिव्य श्वेत शिखर कैलाश था। मानो स्वयं भगवान शिव हिमालय की गोद में ध्यानमग्न खड़े हों। नीचे फैली बर्फीली घाटियाँ, ऊपर हल्की धुंध और बीच में शांत, अडिग, दिव्य कैलाश। ऐसा लगा जैसे प्रकृति स्वयं मौन होकर उस दृश्य की महिमा उद्घाटित कर रही हो। कुछ क्षणों के इन दर्शन में, जैसे वर्षों की साधना साकार हो गई।

कैलाश पर्वत तिब्बत (चीन अधिकृत क्षेत्र) में स्थित है, जबकि विमान केवल नेपाल के हवाई क्षेत्र में ही उड़ान भरता है। अतः दर्शन दूर से ही संभव होते हैं। किंतु यात्रियों की भावनाओं का सम्मान करते हुए विमान ने तीन बार दिशा बदलकर सभी को दोनों ओर से तीन बार दर्शन का अवसर दिया।
विमान के भीतर का वातावरण भी अद्भुत था – मौन, श्रद्धा और भक्ति का संगम। अनेक श्रद्धालु अपने साथ पूजन सामग्री लाए थे। खिड़की के पास बैठकर उन्होंने उसी दिशा में अर्पण किया और उसे अपने साथ सुरक्षित रख लिया, ताकि घर पहुंचकर देवस्थल में अर्पित कर सकें। हर हर महादेव का जयघोष सतत् चलता रहा।

एयरलाइंस की ओर से 27,000 फीट की ऊंचाई से कैलाश दर्शन के अलौकिक क्षण की आधिकारिक स्मृति हेतु प्रमाणपत्र भी प्रदान किया गया।
कुछ ही क्षणों के इन दर्शन में जो शांति और संतोष मिला, वह जीवन की सबसे अमूल्य अनुभूतियों में से एक बन गया।
यह यात्रा केवल दूरी तय करने की नहीं थी—यह वर्षों की आस्था का साक्षात अनुभव थी।





