Election Analysis : पीथमपुर नगर निकाय खोना मध्यप्रदेश में भाजपा की बड़ी हार!  

नगर निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए सबक!

704

Election Analysis : पीथमपुर नगर निकाय खोना मध्यप्रदेश में भाजपा की बड़ी हार!

वरिष्ठ पत्रकार छोटू शास्त्री का विश्लेषण

Dhar : मध्यप्रदेश में नगर निकाय के सबसे ज्यादा चुनाव धार जिले में हुए और कांग्रेस को यहीं ज्यादा जीत भी मिली। धार जिला मुख्यालय समेत 9 जगह निकाय चुनाव के लिए वोट पड़े। पर, जब नतीजे आए तो सत्ताधारी भाजपा की आंखे खुल गई। 6 निकाय चुनाव कांग्रेस ने जीते और भाजपा सिमटकर 3 पर रह गई। प्रदेशभर में 19 में से 11 जगह भाजपा की जीत बड़ी दिखती हो, पर अकेले धार जिले ने कांग्रेस की लाज बचाई है। लेकिन, भाजपा सबसे बड़ी हार पीथमपुर को माना जाना चाहिए, जहां कांग्रेस ने भाजपा से यह सीट छीन ली। वास्तव में ये प्रदेश में भाजपा की बड़ी पराजय है। क्योंकि, भाजपा ने पीथमपुर के विकास को लेकर उद्योगपतियों के सामने जो खाका पेश किया था, वहां की जनता ने उसे उलट दिया।

IMG 20230124 WA0041

प्रवासी सम्मेलन, ग्लोबल इनवर्टर समिट, सिंगल विंडो, ब्रिलिएंट कन्वेंशन सेंटर की व्यवस्था और लाखों करोड़ों रुपए के निवेश का बाजार अभी थमा भी नहीं था कि देश का डेट्राइट कहे जाने वाले पीथमपुर नगर पालिका चुनाव के नतीजे सामने आ गए। नतीजे भी ऐसे आए कि भारतीय जनता पार्टी को समझ आ गया कि उसके लिए सबकुछ पाना आसान नहीं है। पीथमपुर नगर पालिका भाजपा के हाथ से चली गई। जबकि, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। पीथमपुर के लिए वो सबकुछ किया जो वे कर सकते थे, पर जिले के भाजपा नेताओं की इमेज मुख्यमंत्री की कोशिशों पर भारी पड़ गई।

पीथमपुर प्रदेश ही नहीं देश का सबसे बड़ा औद्योगिक क्षेत्र है। उद्योग, निवेश और इन्वेस्टर समिट की चर्चा के बीच उद्योगपतियों का स्वर्ग कहे जाने वाले पीथमपुर में मजदूर, मध्यम वर्ग, किसान और छोटे कारोबारियों ने भाजपा के कथित कुशल संगठन को नगरीय निकाय से बेदखल कर दिया। जबकि, यही वर्ग नगरीय क्षेत्रों में भाजपा का कोर वोट बैंक रहा है। काग्रेस के लिए जीत के मायने भले ही महत्वपूर्ण हो, पर भाजपा के लिए चिंता और चिंतन का विषय है।

समझा जा सकता है कि जिले में भाजपा की सियासी नींव कमजोर होने लगी। भाजपा संगठन में सत्ता सुख लेने वालों के मुंह में रियल स्टेट और लाइजनिंग के मलाईदार कारोबार का स्वाद लग गया है। पिछले 3 साल के सबसे बड़े औद्योगिक आयोजन, प्रवासी सम्मेलन, सरकार का उद्योगों के प्रति किसानों से भी ज्यादा झुकाव दिखाने के बाद भी मध्य प्रदेश के औद्योगिक सांस और ध्वनि कहे जाने वाले पीथमपुर में भाजपा क्यों हारी!

भाजपा की पीथमपुर में हार और कांग्रेस की जेट का क्या ये मतलब निकाला जाए कि ग्लोबल इन्वेस्टर समिट में की जाने वाली घोषणाएं और एमओयू की विश्वसनीयता जनता के दिमाग में निकल गई! न्यूज़ चैनलों, अख़बारों के पन्नों, होर्डिंग से लगाकर एयरपोर्ट तक पर जिस तरह का स्वागत उद्योगपतियों का किया गया, वैसा कभी किसान, और मजदूरों के लिए नहीं किया। क्या पीथमपुर के इन नतीजों को पीथमपुर के मध्यमवर्ग और आम जनता की प्रतिक्रिया समझा जाए!

आदिवासी अंचल का सबसे सफल और प्रभावी राजनीतिक क्षेत्र धार है। धार जो आज सोचता है कुछ दिनों बाद पूरा निमाड़ और आदिवासी अंचल वही करता है। यदि निष्पक्ष रुप से भाजपा के संगठन और सरकार के नुमाइंदों का परीक्षण कराया जाए, तो भविष्य के चुनाव नतीजे इससे बहुत अलग नहीं होंगे। मुख्यमंत्री की सहजता, सरलता अपनी जगह पर पार्टी संगठन और सरकार के नुमाइंदों का आचरण उसके समकक्ष नहीं है। सच्चाई यह है कि संगठन और सरकार के नुमाइंदों को देखकर आम जनता में बदले की भावना जन्म ले रही है। ख़ास बात ये कि इस मनोविज्ञान को समझने में संगठन और सरकार दोनों ही असफल है। अगर यह बात समझ में आ जाती तो भाजपा न तो कुक्षी हारती और न पीथमपुर उसके हाथ से जाता।

मजबूत नेतृत्व, 18 साल की सरकार, मिस कॉल से सदस्यता, पन्ना प्रमुख जैसा कोई भी प्रयोग पीथमपुर और कुक्षी में भाजपा को नहीं जिता पाया। जिस ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट की सफलता के कसीदे पढ़े जा रहे थे, वहीँ चंद दिन बाद भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा। कहा जा सकता है कि पीथमपुर में भाजपा की हार धार की जीत से कहीं ज्यादा बड़ी है। यहाँ भाजपा का हारना एक बड़ी चिंता की और इशारा करता है।

सरकार और संगठन दोनों ही कई बार इस बात को मान चुके हैं कि मध्य प्रदेश का मतलब इंदौर है और इंदौर का मतलब मध्य प्रदेश! ऐसा लगता है कि विकास, स्वच्छता या कोई भी प्रशासनिक या औद्योगिक नवाचार सिर्फ इंदौर के लिए ही है। यह भावना भाजपा के लिए अगले विधानसभा चुनाव में भारी नुकसान दे सकती है। क्योंकि इंदौर की तुलना में प्रदेश में कोई ऐसा जिला नहीं है ,लेकिन सरकार एक ही रही है।

शिवपुरी, रीवा, अलीराजपुर, राजगढ़ या बालाघाट हर जगह पिछले 18 साल से एक ही सरकार रही है। फिर किस की कीमत पर इंदौर का विकास होता है। हर आदमी जो जिस जिले का है वह अपने अंदर अपने जिले में एक इंदौर देखना चाहता है। पर, पिछले 18 साल में प्रदेश को सिर्फ एक ही इंदौर मिला, दूसरा क्यों नहीं! भाजपा के सत्ता-संगठन को यह स्वीकारना होगा कि यदि इंदौर से सटे पीथमपुर में इन्वेस्टर समिट और प्रवासी सम्मेलन बेअसर रहे तो ग्वालियर, चंबल, सागर, शहडोल और रीवा में इसका असर कैसे होगा!

9 में से 3 नगर निकाय चुनाव जीतकर उत्साहित होने वाले धार के जिला अध्यक्ष के लिए ये संकेत है कि कहीं न कहीं नेतृत्व में रिसन है। उनसे इस हार को लेकर संगठन सवाल कर सकता है। पर, इससे समस्या सुलझेगी या नहीं, यह तो भाजपा को सोचना है। एक सच्चाई यह भी कि प्रदेश के उद्योग मंत्री राजवर्धन सिंह दत्तीगांव भी धार जिले के अकेले मंत्री हैं।

18 साल की एंटी इनकंबेंसी, सत्ता और संगठन के नुमाइंदों का अहम् भरा आचरण, सिंधिया समर्थकों की भाजपा में दखलंदाजी और आपसी सामंजस्य की कमी पार्टी में इस रूप में उभरकर आई है। भाजपा के अंदर पनक रहे नए गुट और टिकट की मारामारी, आदिवासियों के ‘जयश’ संगठन का कांग्रेस के प्रति झुकाव, पुराने भाजपा नेताओं की अवहेलना कहीं अगले विधानसभा चुनाव में पूरे प्रदेश को पीथमपुर या कुक्षी न बना दे, ये सोचना होगा। धार जिले के संकेत नगरीय निकाय के नतीजों से प्रदेश की भविष्य की सियासत की यही कहानी कह रहे हैं। जो आज धार में हुआ है कहीं वह पूरे प्रदेश में न फैल जाए।