Friday, December 13, 2019
Article 370 और 35A जंजीरों की तरह थे, ये जंजीरे अब टूट गई हैं : PM मोदी

Article 370 और 35A जंजीरों की तरह थे, ये जंजीरे अब टूट गई हैं : PM मोदी

मीडियावाला.इन।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को अपने दूसरे कार्यकाल के 75 दिन पूरे होने पर आईएएनएस के साथ विस्तार से बात की. उन्होंने अपनी आगे की प्राथमिकताओं का जिक्र किया और जम्मू एवं कश्मीर, मेडिकल सुधार, शिक्षा के महत्व के साथ-साथ नौकरशाही के अंदर से भ्रष्टाचार के ट्यूमर को निकालने जैसे कई संवेदनशील मुद्दों पर बात रखी.

आईएएनएस के एडिटर-इन-चीफ संदीप बामजई के साथ विस्तृत बातचीत में प्रधानमंत्री ने देश के सामने मौजूद सर्वाधिक विवादित मुद्दों और इन समस्याओं के निदान पर अपने विचार रखे.

आपने अपनी सरकार के 75 दिन पूरे किए हैं. हर सरकार इस तरह के मील के पत्थरों के नंबरों से गुजरती है और अपने द्वारा उठाए गए कदमों के बारे में बातें करती है. हम यह क्यों मानें कि आपकी सरकार अलग तरह की है?

हमारी सरकार ने शुरुआती कुछ दिनों में ही अभूतपूर्व रफ्तार पकड़ ली. हमने जो हासिल किया, वह सरकार की स्पष्ट नीति, सही दिशा का परिणाम है. हमारी सरकार के प्रथम 75 दिनों में ही बहुत कुछ हुआ. बच्चों की सुरक्षा से लेकर चंद्रयान 2, भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई से लेकर तीन तलाक जैसी बुराई से मुस्लिम महिलाओं को मुक्त करना, कश्मीर से लेकर किसान तक, हमने दिखाया है कि मजबूत जनादेश वाली दृढ़संकल्प सरकार क्या कुछ हासिल कर सकती है. हमने जल आपूर्ति सुधारने और जल संरक्षण को बढ़ावा देने के एकीकृत दृष्टिकोण और एक मिशन मोड के लिए जलशक्ति मंत्रालय के गठन के साथ समय के सर्वाधिक जरूरी मुद्दे को सुलझाने के साथ शुरुआत की है.

क्या अभूतपूर्व जनादेश ने आपकी लोगों के प्रति इस प्रतिबद्धता को और मजबूत किया है कि सुधारों को जमीनी स्तर तक ले जाना है? और, आपने अपने राजनैतिक वजन का इस्तेमाल कार्यपालिका से परे जाकर किया और जनादेश का इस्तेमाल विधायिका में किया?

एक तरह से, सरकार की जिस तरह जोरदार तरीके से सत्ता में वापसी हुई है, उसका भी यह परिणाम है. हमने इन 75 दिनों में जो हासिल किया है, वह उस मजबूत बुनियाद का परिणाम भी है, जिसे हमने पिछले पांच सालों के कार्यकाल में बनाया था. पिछले पांच सालों में किए गए सैकड़ों सुधारों ने यह तय किया है कि देश आज उड़ान भरने के लिए तैयार है, इसमें जनता की आकांक्षाएं जुड़ी हुई हैं. 17वीं लोकसभा के प्रथम सत्र ने रिकॉर्ड बनाया है. यह 1952 से लेकर अबतक का सबसे फलदायी सत्र रहा है. मेरी नजर में यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, बल्कि बेहतरी का एक ऐतिहासिक मोड़ है, जिसने संसद को जनता की जरूरतों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया है. कई ऐतिहासिक पहलें शुरू की गईं, जिसमें किसानों और व्यापारियों के लिए पेंशन योजना, मेडिकल सेक्टर का रिफॉर्म, दिवाला एवं दिवालियापन संहिता में महत्वपूर्ण संशोधन, श्रम सुधार की शुरुआत..आदि आदि. मुद्दे का सार यह है कि अगर नीयत सही हो, उद्देश्य और कार्यान्वयन स्पष्ट हो तथा लोगों का सहयोग हो तो फिर कोई सीमा नहीं है कि हम क्या कुछ कर सकते हैं."

मेडिकल सुधारों को लेकर चौतरफा चर्चा हो रही है. क्या आप समझते हैं कि आप जो बदलाव ला रहे हैं, उस पर अच्छी तरह से सोच-विचार किया गया है?

जब हमने 2014 में सरकार बनाई थी, तो मेडिकल शिक्षा की वर्तमान प्रणाली के बारे में कई चिंताएं थीं. इससे पहले अदालतें भारत में मेडिकल शिक्षा को देख रहीं संस्थानों पर कड़ी टिप्पणियां कर रही थीं और उसे 'भ्रष्टाचारियों की मांद' करार दिया था. एक संसदीय समिति ने भी व्यापक अध्ययन किया और कहा कि मेडिकल शिक्षा की हालत खस्ताहाल है और इसमें कुप्रबंधन, पारदर्शिता की कमी और मनमानी की ओर इशारा किया गया था.

पहले की सरकारों ने भी इस सेक्टर में सुधार का विचार किया था, लेकिन वे इसे कर नहीं पाए. हमने फैसला किया कि इसे करेंगे, क्योंकि यह ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसे हल्के में लिया जाए, क्योंकि यह हमारे लोगों के स्वास्थ्य से और हमारे युवाओं के भविष्य से जुड़ा मुद्दा है. इसलिए इसमें क्या सुधार किया जाए, इसके लिए हमने एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया. विशेषज्ञ समूह ने सिस्टम का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया और समस्याओं और सुधार के क्षेत्रों के बारे में सलाह दिया. हम विशेषज्ञों के सुझावों के आधार पर ही वर्तमान विधेयक को लेकर आए हैं.

फिर इस विधेयक पर इतनी हायतौबा क्यों मची है?

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का गठन दूरगामी सुधार के लिए किया गया है, जो प्रचलित समस्याओं को ठीक करने का प्रयास करता है. इसमें कई सुधार शामिल हैं, जो भ्रष्टाचार के खतरों पर अंकुश लगाते हैं और पारदर्शिता को बढ़ावा देते हैं. ऐसे समय में जब विभिन्न देश भारत को दुनिया में विकास की अगली लहर को बढ़ावा देने वाले देश के रूप में देख रहे हैं, हमने महसूस किया कि ऐसा केवल स्वस्थ आबादी के साथ ही संभव है. गरीबों को गरीबी के दुष्चक्र से मुक्त करने के लिए स्वास्थ्य में सुधार बहुत जरूरी है.

एनएमसी इस उद्देश्य को बहुत अच्छी तरह पूरा करता है. यह देश में मेडिकल शिक्षा के प्रबंधन में पारदर्शिता, जवाबदेही और गुणवत्ता सुनिश्चित करेगा. इसका लक्ष्य छात्रों पर बोझ कम करने, मेडिकल सीटों की संख्या बढ़ाने और मेडिकल शिक्षा की लागत कम करने का है. इसका मतलब है कि अधिक प्रतिभाशाली युवक एक पेशे के रूप में चिकित्सा को अपनाएंगे और इससे मेडिकल पेशेवरों की संख्या बढ़ाने में मदद मिलेगी. आयुष्मान भारत स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में क्रांति ला रहा है. यह विशेष रूप से छोटे और मझोले शहरों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा के साथ ही जागरूकता बढ़ाने का काम कर रहा है. हम यह सुनिश्चित करने के लिए भी काम कर रहे हैं कि हर तीन जिलों पर कम से कम एक मेडिकल कॉलेज हो. स्वास्थ्य सेवा के बारे में बढ़ती जागरूकता, लोगों की बढ़ती आय और लोगों द्वारा आकांक्षी लक्ष्यों पर अधिक ध्यान देने के साथ ही हमें मांग को पूरा करने के लिए हजारों-लाखों डॉक्टरों की जरूरत है, खास तौर से ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में. एनएमसी सभी हितधारकों के बेहतर परिणाम के लिए इन सभी मुद्दों पर ध्यान देगा. शैक्षणिक वर्ष 2019-20 में सरकारी कॉलेजों में किसी एक साल में सबसे ज्यादा सीटें बढ़ाई जाएंगी और करीब दो दर्जन नए मेडिकल कॉलेज खोले जाएंगे. हमारा रोडमैप स्पष्ट हैं -एक पारदर्शी, सुलभ और सस्ती चिकित्सा शिक्षा प्रणाली, जिससे स्वास्थ्य सेवा बेहतर हो सके.

युवा राष्ट्र के लिए शिक्षा बहुत जरूरी है. लेकिन आपकी सरकार के कार्यक्रमों में शिक्षा गायब है. सरकार इस बारे में क्या कर रही है?

शिक्षा न सिर्फ बहुत जरूरी है, बल्कि प्रौद्योगिकी-उन्मुख, समावेशी, जनकेंद्रित और जनसंचालित विकास मॉडल के लिए कुशल मानव संसाधन के समग्र स्पेक्ट्रम में सबसे महत्वपूर्ण घटक है. इससे न केवल जीवन को सकारात्मक रूप से बदलने की क्षमता है, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर भी इसका असर पड़ता है. हम शिक्षा के सभी पहलुओं पर काम कर रहे हैं. स्कूल के स्तर पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार, सीखने के परिणामों में सुधार, नवाचार और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने, अवसंरचना में सुधार, छात्रों के बीच समझ को बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी के प्रयोग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. हम स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निग जैसी तकनीक का लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं. उच्च शिक्षा में, हम लगातार सीटें बढ़ाने, देश भर में प्रमुख संस्थानों की उपस्थिति बढ़ाने, संस्थानों को अधिक स्वायत्तता देने और अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रहे हैं. हमने एक उच्च शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी (एचईएफए) की स्थापना की है, जिसे साल 2022 तक एक लाख करोड़ रुपये तक की धनराशि उपलब्ध कराई जाएगी. इसके लिए एक उच्च शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी (एचईएफए) की स्थापना की है. इसमें से 21,000 करोड़ रुपये अब तक स्वीकृत किए जा चुके हैं. 52 विश्वविद्यालयों सहित 60 उच्च शैक्षणिक संस्थानों को स्वायत्तता दी गई है. ये विश्वविद्यालय यूजीसी के दायरे में रहेंगे, लेकिन उन्हें नए पाठ्यक्रम, कैंपस सेंटर, कौशल विकास पाठ्यक्रम, अनुसंधान पार्क और किसी भी अन्य नए शैक्षणिक कार्यक्रमों को शुरू करने की स्वतंत्रता होगी. उन्हें विदेशी फैकल्टी को नियुक्त करने, विदेशी छात्रों को दाखिला देने, फैकल्टी को प्रोत्साहन-आधारित मेहनताना देने, अकादमिक सहयोग में प्रवेश करने और ओपन डिस्टेंस लर्निग कार्यक्रम चलाने की भी स्वतंत्रता होगी. राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मिशन को आगे बढ़ाने में भी प्रगति हुई है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के पहले मसौदे को ब्लॉक और पंचायत स्तर से लाखों इनपुट और सुझाव मिले हैं. विभिन्न हितधारकों की प्रतिक्रिया और रुचि को देखते हुए, समिति परामर्श का एक और दौर चला रही है. इस तरह के व्यापक विचार-विमर्श के बाद तैयार की गई शिक्षा नीति का नवीनतम मसौदा फिर से अंतिम दौर के इनपुट के लिए सार्वजनिक डोमेन में रखा गया है. शिक्षा में सभी हितधारकों - राज्यों, माता-पिता, शिक्षकों, छात्रों, परामर्शदाताओं आदि से कई बार सलाह ली गई है. हमारा फोकस यह है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और हितधारकों द्वारा संचालित किया जाना चाहिए, ताकि यह एक नीति न बने, बल्कि जल्द से जल्द व्यवहार में अपनाया जाए. भारत अपने विशाल जनसांख्यिकीय फायदों के साथ, दुनिया में एक अग्रणी ज्ञान अर्थव्यवस्था बनने की क्षमता रखता है.

भ्रष्टाचार को लेकर कुछ अहम फैसलों ने नौकरशाही में उथल पुथल मचा दी थी. आप क्या संदेश भेजना चाहते थे?

भारत की आजादी के बाद से ही एक जो चीज हमें पीछे कर रही थी, वह भ्रष्टाचार है. भ्रष्टाचार ने किसी को नहीं छोड़ा. न गरीब को न अमीर को. लोग भ्रष्टाचार या तो लालच में या जल्दी पैसा कमाने के लिए या किसी मजबूरी में करते हैं. लेकिन ये लोग भी चाहते हैं कि भ्रष्टाचार रुक जाए. सभी के दिमाग में एक सवाल होता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की शुरुआत कौन करेगा और कहां से करेगा. भ्रष्टाचार से लड़ाई को हमेशा लोगों, मीडिया, संस्थाओं का समर्थन मिला है, क्योंकि सभी इस बात में एक राय रखते हैं कि भारत के विकास के सफर में भ्रष्टाचार बाधक है. और यह सिर्फ पैसे के सवाल नहीं हैं. भ्रष्टाचार धीरे-धीरे समाज को खोखला कर रहा है. चाहे सरकारी ऑफिस हो या बाजार. एक आदमी पुलिस स्टेशन जाता है तो वह पहले यह सोचता है कि उसे इंसाफ मिलेगा या नहीं. इसी तरह एक आदमी अगर बाजार से कुछ खरीद रहा तो उसे मिलावट का डर रहता है. हमने फैसला किया कि पहले दिन से भ्रष्टाचार का डर खत्म करेंगे. किसी को कहीं से शुरुआत तो करनी थी, हमने वह शुरुआत करने का फैसला किया, वह भी राजनीति के प्रभाव की चिंता किए बिना. परिणाण बताते हैं कि हम सफल रहे. न सिर्फ भ्रष्टाचार कम हुआ है, बल्कि समाज में भरोसा भी बढ़ा है. पिछले पांच साल में इंकम टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या बढ़ गई है. हमने एक तय नीति से भ्रष्टाचार को कम किया और टैक्स भरने तथा रिफंड की प्रक्रिया को ऑनलाइन किया. पहले ऐसा होता था कि रिफंड इंकम टैक्स भरने वाले शख्स के खाते में सीधे पहुंच जाता था, वह भी बिना कोई इंसानी दखल के. हमने इसमें एक कदम आगे जाने का फैसला किया और लक्ष्य बनाया कि इनकम टैक्स रिटर्न के लिए फेसलेस असेसमेंट को हकीकत में लेकर आएंगे. यह कर प्रणाली में एक नए युग की शुरुआत जैसा है. हम इस बात को लेकर प्रतिबद्ध हैं कि हम न ही भ्रष्टाचार होने देंगे और न ही किसी तरह का शोषण बर्दाश्त करेंगे. इसलिए हमने मुश्किल कदम उठाए और बीते कुछ सप्ताहों में कुछ टैक्स अधिकारियों को कम्पलसरी रिटायरमेंट दे दिया. पहले कार्यकाल में भी हमें लगा तो हमने कई सरकारी अधिकारियों को हटाया था. हमने डीबीटी के माध्यम से तकनीक की ताकत का फायदा उठाया, जिससे हम 1.4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बचत करने में सफल रहे.

अनुच्छेद 370 हटाने के आपके फैसले की कई लोगों ने तारीफ की तो कुछ लोगों ने इसकी आलोचना भी की. इस समय लग रहा है कि एक अजीब-सी शांति है. आपको क्यों लगता है कि जम्मू एंव कश्मीर के लोग आपके साथ खड़े होंगे?

कश्मीर पर लिए गए निर्णय का जिन लोगों ने विरोध किया, उनकी जरा सूची देखिए -असामान्य निहित स्वार्थी समूह, राजनीति परिवार, जो कि आतंक के साथ सहानुभूति रखते हैं और कुछ विपक्ष के मित्र. लेकिन भारत के लोगों ने अपनी राजनीतिक संबद्धताओं से इतर जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के बारे में उठाए गए कदमों का समर्थन किया है. यह राष्ट्र के बारे में है, राजनीति के बारें में नहीं. भारत के लोग देख रहे हैं कि जो निर्णय कठिन ने मगर जरूरी थे, और पहले असंभव लगते थे, वे आज हकीकत बन रहे हैं. इस बात से अब हर कोई स्पष्ट है कि अनुच्छेद 370 और 35ए ने किस तरह जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख को पूरी तरह अलग-थलग कर रखा था. सात दशकों की इस स्थिति से लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं हो पाईं. नागरिकों को विकास से दूर रखा गया. हमारा दृष्टिकोण अलग है - गरीबी के दुष्चक्र से निकाल कर लोगों को अधिक आर्थिक अवसरों से जोड़ने की आवश्यकता है. वर्षो तक ऐसा नहीं हुआ. अब हम विकास को एक मौका दें.

इस नई और बंधनमुक्त व्यवस्था में जो जम्मू एवं कश्मीर के लोगों के लिए आप क्या संदेश देना चाहते हैं जो भारत के भविष्य में सुधार के बारे में जानना चाहतें है, नौकरियां चाहते हैं और एक बेहतर जिंदगी चाहते हैं?

जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के मेरे भाई-बहन हमेशा एक बेहतर अवसर चाहते थे, लेकिन अनुच्छेद 370 ने ऐसा नहीं होने दिया. महिलाओं और बच्चों, एसटी और एससी समुदायों के साथ अन्याय हुआ. सबसे बड़ी बात कि जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के लोगों के इनोवेटिव विचारों का उपयोग नहीं हो पाया. आज बीपीओ से लेकर स्टार्टअप तक, खाद्य प्रसंस्करण से लेकर पर्यटन तक, कई उद्योगों मे निवेश आ सकता है और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार पैदा हो सकता है. शिक्षा और कौशल विकास भी फलेगा-फूलेगा.

मैं जम्मू एवं कश्मीर के अपने बहनों और भाइयों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि ये क्षेत्र स्थानीय लोगों की इच्छाओं, सपनों और महात्वाकांक्षाओं के अनुरूप विकसित किए जाएंगे. "अनुच्छेद 370 और 35ए जंजीरों की तरह थे, जिनमें लोग जकड़े हुए थे. ये जंजीरे अब टूट गई हैं."

जो लोग जम्मू एवं कश्मीर पर लिए गए निर्णय का विरोध कर रहे हैं, वे बस एक बुनियादी सवाल का उत्तर दे दें कि अनुच्छेद 370 और 35ए को वे क्यों बनाए रखना चाहते हैं?

उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है. और ये वही लोग हैं, जो उस हर चीज का विरोध करते हैं जो आम आदमी की मदद करने वाली होती हैं. रेल पटरी बनती है, वे उसका विरोध करेंगे. उनका दिल केवल नक्सलियों और आतंकवादियों के लिए धड़कता है. आज हर भारतीय जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख के लोगों के साथ खड़ा है और मुझे भरोसा है कि वे विकास को बढ़ावा देने और शांति लाने में हमारे साथ खड़ा रहेंगे.

लेकिन क्या लोकतंत्र को लेकर चिंता नहीं है? क्या कश्मीर के लोगों की आवाज सुनी जाएगी?

कश्मीर ने कभी भी लोकतंत्र के पक्ष में इतनी मजबूत प्रतिबद्धता नहीं देखी. पंचायत चुनाव के दौरान लोगों की भागीदारी को याद कीजिए. लोगों ने बड़ी संख्या में मत डाले और धमकाने के आगे झुके नहीं. नवंबर-दिसंबर 2018 में पैंतीस हजार सरपंच चुने गए और पंचायत चुनाव में रिकार्ड 74 फीसदी मतदान हुआ. पंचायत चुनाव के दौरान कोई हिंसा नहीं हुई. चुनावी हिंसा में रक्त की एक बूंद भी नहीं गिरी. यह तब हुआ जब मुख्यधारा के दलों ने इस पूरी प्रक्रिया के प्रति उदासीनता दिखाई थी. यह बहुत संतोष देने वाला है कि अब पंचायतें विकास और मानव सशक्तिकरण के लिए फिर से सबसे आगे आ गईं हैं. कल्पना कीजिए, इतने सालों तक सत्ता में रहने वालों ने पंचायतों को मजबूत करने को विवेकपूर्ण नहीं पाया. और यह भी याद रखिए कि लोकतंत्र पर वे महान उपदेश देते हैं लेकिन उनके शब्द कभी काम में नहीं बदलते.

इसने मुझे चकित और दुखी किया कि 73वां संशोधन जम्मू एवं कश्मीर में लागू नहीं होता. ऐसे अन्याय को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? यह बीते कुछ सालों में हुआ है जब जम्मू एवं कश्मीर में पंचायतों को लोगों को प्रगति की दिशा में काम करने के लिए शक्तियां मिलीं. 73वें संशोधन के तहत पंचायतों को दिए गए कई विषयों को जम्मू एवं कश्मीर की पंचायतों को स्थानांतरित किया गया. अब मैंने माननीय राज्यपाल से ब्लॉक पंचायत चुनाव की दिशा में काम करने का अनुरोध किया है. हाल में जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने 'बैक टू विलेज' कार्यक्रम आयोजित किया जिसमें लोगों को नहीं बल्कि समूची सरकारी मशीनरी को लोगों तक पहुंचना पड़ा. वे केवल लोगों की समस्याओं को कम करने के लिए उन तक पहुंचे. आम नागरिकों ने इस कार्यक्रम को सराहा. इन प्रयासों का नतीजा सभी लोगों के सामने है. स्वच्छ भारत, ग्रामीण विद्युतीकरण और ऐसी ही अन्य पहलें जमीनी स्तर तक पहुंच रही हैं. वास्तविक लोकतंत्र यही है.

मैंने लोगों को आश्वस्त किया है कि जम्मू, कश्मीर में चुनाव जारी रहेंगे और केवल इन क्षेत्रों के लोग हैं जो वृहत्तर जनसमुदाय का प्रतिनिधित्व करेंगे. हां, जिन्होंने कश्मीर पर शासन किया, वे सोचते हैं कि यह उनका दैवीय अधिकार है, वे लोकतंत्रीकरण को नापसंद करेंगे और गलत बातें बनाएंगे. वे नहीं चाहते कि एक अपनी मेहनत से सफल युवा नेतृत्व उभरे. यह वही लोग हैं जिनका 1987 के चुनावों में आचरण संदिग्ध रहा है. अनुच्छेद 370 ने पारदर्शिता और जवाबदेही से परे जाकर स्थानीय राजनैतिक वर्ग को लाभ पहुंचाया. इसको हटाया जाना लोकतंत्र को और मजबूत करेगा.

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