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संजय…अब भारत देश…मुखर्जी का है…

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संजय…अब भारत देश…मुखर्जी का है…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

आज का दिन बीसवीं सदी में सक्रिय रहीं दो महत्त्वपूर्ण राजनैतिक हस्तियों का है। और यह दो हस्तियां भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले दो महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की हैं। एक हैं पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जिन्होंने जनसंघ की स्थापना कर भारतीय राजनीति में कांग्रेस को चुनौती देने के लिए एक राजनैतिक दल की नींव डाली थी। और आज उस नींव पर जो इमारत खड़ी है, उसने कांग्रेस को बैकफुट पर धकेल दिया है। और दूसरी महत्त्वपूर्ण राजनैतिक हस्ती हैं संजय गांधी। संजय गांधी 33 साल की अल्पायु में इस दुनिया से विदा हो गए और उनकी मौत ने ही राजीव गांधी के लिए राजनीति का दरवाजा खोला था। लेकिन उतनी कम आयु में संजय ने राजनीति में जो मुकाम हासिल किया था, उसको प्रशंसकों और आलोचकों की नजर में आज भी याद किया जाता है। यह दोनों ही हस्तियां 23 जून को इस दुनिया से विदा हुई थीं। आज अगर

राजनैतिक दृष्टिकोण से इन दोनों हस्तियों को याद करते हुए कुछ कहा जाए तो यही कहा जा सकता है कि संजय अब यह देश मुखर्जी का है। और यह भी कहा जा सकता है कि मुखर्जी… अब भारत देश में पिछले 12 साल से भारतीय जनता पार्टी की सरकार राज कर रही है। और 2026 में आजादी के बाद पहली बार पश्चिम बंगाल में भी भाजपा की सरकार बन चुकी है। शायद पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी का लक्ष्य यही था कि जनसंघ राज करे। उसी जनसंघ की विचारधारा को आगे बढ़ाने वाली भाजपा अब पूरे भारत में राज कर रही है।

आइए इन दोनों हस्तियों के बारे में आज कुछ जानते हैं। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी (जन्म: 6 जुलाई 1901-मृत्यु: 23 जून 1953) शिक्षाविद्, चिन्तक और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। 1943 से 1946 तक वे अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष भी रहे। 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी का जन्म हुआ। 33 वर्ष की अल्पायु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इस पद पर नियुक्ति पाने वाले वे सबसे कम आयु के कुलपति थे। उन्होंने बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किया। इस सरकार में वे वित्तमन्त्री बने। इसी समय वे सावरकर के राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए। मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था। वहाँ साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ रही थी। साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो। अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया। 1942 में ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न राजनैतिक दलों के छोटे-बड़े सभी नेताओं को जेलों में डाल दिया।ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षड्यन्त्र को एक कांग्रेस के नेताओं ने अखण्ड भारत सम्बन्धी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। उस समय डॉ. मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की माँग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खण्डित भारत के लिए बचा लिया। गांधी जी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे भारत के पहले मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए। उन्हें उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गयी। संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य और केन्द्रीय मन्त्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया। किन्तु उनके राष्ट्रवादी चिन्तन के चलते अन्य नेताओं से मतभेद बराबर बने रहे। फलत: राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने एक नई पार्टी बनायी जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था। अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ का उद्भव हुआ।

मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमन्त्री (वजीरे-आज़म) अर्थात् प्रधानमन्त्री कहलाता था। संसद में अपने भाषण में डॉ. मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। उन्होंने तत्कालीन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।

संजय गांधी (14 दिसम्बर 1946 – 23 जून 1980) भारत के एक राजनेता थे। वे भारत की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र थे। मेनका गांधी उनकी पत्नी हैं और वरुण गांधी उनके पुत्र। भारत में आपातकाल के समय उनकी भूमिका बहुत विवादास्पद रही। अल्पायु में ही एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में उनकी मौत हो गयी। इनका जन्म 14 दिसम्बर 1946 को हुआ था। इनकी माता देश की पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी थीं एवं इनके पिता फिरोज गांधी थे जो कि पारसी समुदाय से थे। जिन्होनें शादी के बाद अपना नाम परिवर्तित करके फिरोज गांधी कर लिया था। इनके पिता पेशे से पारसी राजनेता एवं पत्रकार थे, वे लोकसभा के सांसद भी रहे। संजय गांधी का मूल निवास स्थान मुम्बई था, क्योंकि यहीं पर उनके पिता फिरोज गांधी का जन्म हुआ था। संजय गांधी के बडे भाई का नाम राजीव गांधी था। बताते चले कि इंदिरा गांधी जी ने,फिरोज गांधी से शादी अपने पिता एवं देश के पुर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ जाकर की थी। संजय गांधी भले ही देश के प्रधानमंत्री न बने सके,मगर सदैव ही पद की लालसा रखते थे। वहीं इंदिरा गांधी जी भी चाहती थी कि उनके कार्यकाल के बाद संजय ही देश के प्रधानमंत्री बने, इस बात की झलक उनकेे आपातकाल लगाये जाने के समयकाल में देखने को मिलती है। 25 जून 1975 में देश में आपातकाल की घोषणा की गई,आपातकाल के 1 वर्ष बाद यानि 1976 में संजय गांधी ने देश में बढ़ती आबादी पर रोक लगाने के लिए नसबंदी कानून को पास किया। 16 साल के किशोर से लेकर 80 वर्ष के बुजुर्ग की जबरन नसबंदी की गई। इस तरह से मात्र एक वर्ष के समयकाल में ही लगभग 60 लाख लोगों की नसबंदी कर दी गई। आपातकाल पूरे 21 महीनों तक चला। अतः नसबंदी कार्यक्रम आपातकाल के समाप्त होने के बाद ही बंद किया गया। देश को सबसे सस्ती मारुती कार संजय गांधी की ही देन है। शादी के 6 साल बाद 21 जून 1980 की सुबह संजय गांंधी एवं दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के दिल्ली फ्लाइंग क्लब से उड़ान भरी। विमान अनियंत्रित होकर अशोक होटल के पीछे खाली पड़ी जमीन में क्रैश होता है। इस प्रकार 23 जून 1980 को संजय गांधी का निधन हो गया।

तो आज भारतीय जनता पार्टी पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों को पूरा कर रही है। पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार वास्तव में मुखर्जी कि उस समय की हिन्दुत्व सोच को समर्पित सरकार ही मानी जा सकती है। कश्मीर में अनुच्छेद 370 को खत्म कर भाजपा ने मुखर्जी का सपना ही पूरा किया था। संजय गांधी अगर जिंदा रहते तो शायद भारत की राजनीति का एक अलग ही इतिहास होता। खैर, फिलहाल यही कहा जा सकता है कि संजय…अब भारत देश…मुखर्जी का है…।

 

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।