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प्रसंग विशेष – मंदसौर की शिवना: शिवना नदी की व्यथा: हमारी सभ्यता का मौन संकट

प्रसंग विशेष – मंदसौर की शिवना: शिवना नदी की व्यथा: हमारी सभ्यता का मौन संकट

वरिष्ठ पत्रकार डॉ घनश्याम बटवाल , मंदसौर

हमारे प्राचीन दशपुर धरा को राजस्थान के सीमावर्ती सेवना से जोड़ने के साथ सारे क्षेत्र को अभिसिंचित करती शिवना नदी अष्टमुखी भगवान पशुपतिनाथ महादेव का जलाभिषेक करती है तो विशाल कृषि क्षेत्र को सिंचित करने के साथ लाखों लोगों के कण्ठ भी तृप्त करती रही है शिवना । पर कुछ दशकों से सदा नीरा ” शिवना ” स्वरुप में परिवर्तित होकर संकट ग्रस्त है । क्योंकि हमारे इतिहास और भूगोल की पहचान शिवना रही

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कभी यह नदी केवल जलधारा नहीं थी—यह आस्था, जीवन और संस्कृति का प्रवाह थी। इसके तटों पर सभ्यताएँ पलीं, ऋषियों ने ध्यान किया, और सामान्य जन ने इसे माँ का दर्जा दिया। पर आज वही नदी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है—धीरे-धीरे, चुपचाप, हमारी ही उदासीनता के बोझ तले दम तोड़ती हुई।

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वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो किसी भी नदी का स्वास्थ्य उसकी जलधारा (flow), जैव विविधता (biodiversity), और स्व-शुद्धिकरण क्षमता (self-purification capacity) पर निर्भर करता है। जब इन तीनों पर आघात होता है—अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगिक अपशिष्ट, सीवेज का प्रवाह, और प्राकृतिक स्रोतों का अवरोध—तो नदी केवल एक “ड्रेन” बनकर रह जाती है। यही इस शिवना नदी के साथ हुआ ओर हो रहा है। लाखों – करोड़ो रुपए की योजनाएं बनी और बिगड़ी है साथ ही समस्या फिर भी बनी रही।

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जल में घुलित ऑक्सीजन का स्तर गिर चुका है, जीव-जंतु विलुप्त हो रहे हैं, और जल अब जीवन नहीं, बल्कि रोगों का वाहक बन गया है।

लेकिन यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है—यह आध्यात्मिक विघटन भी है। हमारे भारतीय चिंतन में नदी को “माता” कहा गया है—जो देती है, लेती नहीं। पर जब वही माँ उपेक्षित, प्रदूषित और अपमानित होती है, तो यह हमारे भीतर के मूल्य-संकट को उजागर करता है। हमने पूजा तो जारी रखी, पर संरक्षण भूल गए; हमने श्रद्धा दिखाई, पर जिम्मेदारी नहीं निभाई।

यह स्थिति केवल किसी एक नदी की नहीं, बल्कि हमारी सोच की परछाईं है। सवाल यह है—क्या हम विकास के नाम पर विनाश को स्वीकार कर चुके हैं? या अभी भी समय है कि हम अपने दृष्टिकोण को बदलें?

समाधान केवल नीतियों में नहीं, मानसिकता में परिवर्तन में छिपा है।

हमें समझना होगा कि नदी को बचाना केवल सरकार का कार्य नहीं, बल्कि सामूहिक दायित्व है।

घरों से निकलने वाला कचरा

धार्मिक अनुष्ठानों के बाद छोड़ी गई नीरमाल्य सामग्री

और जल के प्रति हमारी लापरवाही

ये सब मिलकर उस नदी को खत्म कर रहे हैं, जिससे हमारा अस्तित्व जुड़ा है।

आवश्यक है कि हम विज्ञान और आध्यात्म के बीच संतुलन बनाएं—

जहाँ एक ओर आधुनिक तकनीक से जल शुद्धिकरण हो, वहीं दूसरी ओर हमारी संस्कृति हमें संरक्षण के लिए प्रेरित करे।

यह केवल एक नदी शिवना की कहानी नहीं—यह चेतावनी है।

अगर आज हमने इसे नहीं समझा, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें क्षमा नहीं करेंगी।

अब भी समय है—

नदी को फिर से “धारा” बनाने का,

श्रद्धा को “कर्तव्य” में बदलने का,

और विकास को “संतुलित” करने का।

क्योंकि जब नदियाँ मरती हैं,

तो केवल जल नहीं—सभ्यताएँ भी सूख जाती हैं।

वैसे भी दो दशकों से प्रयोगशाला ही बनी हुई है हमारी शिवना। कई अभियान चले , जलकुंभी हटाई , गहरीकरण किया , शिवना जागरण रैली पदयात्रा भी निकाली, हजारों हाथों ने मिलकर गाद और कचरा उठाया – हटाया ओर यह क्रम कम – ज्यादा आज भी जारी है फिर भी शिवना अपने घाट पर बहाव क्षेत्र में

आचमन योग्य नहीं हो पाई है । सरकारें बदली , दल बदले, झंडे बदले पर नहीं बदली हमारी शिवना की सूरत?

 

विगत दिनों से जनप्रतिधि, पार्षद, विधायक एवं विभिन्न क्षेत्रों और संस्थाओं द्वारा शिवना शुद्धिकरण अभियान चलाया जा रहा है कचरा बाहर निकाला जा रहा है पर अभी बहुत कुछ करना पड़ेगा तभी जीवन दायिनी शिवना जल शुद्ध होगा, क्षेत्र के अन्य जल स्त्रोतों पर भी गम्भीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है ।

नदियों से संस्कृति पोषित और पल्लवित होती है, जल प्रवाह के साथ आगे बढ़ कर सभ्यता और संस्कार को जोड़ती है तो नदी बचेगी तो अब कुछ बच पाएगा और जल के साथ सबको बचाना है तो हमें सामूहिक जिम्मेदारी निभाना होगी । दोष देना तो आसान है पर दायित्वों का निर्वहन महत्वपूर्ण है और

यह प्रमाणित भी हो गया है जब जल पुरुष ओर मैग्सेसे अवॉर्ड सम्मानित डॉ राजेंद्र सिंह , जल ऋषि और झाबुआ के गांधी पद्मश्री महेश शर्मा, भू जल विज्ञानी सुनील चतुर्वेदी, डॉ रवीन्द्र शुक्ला, कृषि वैज्ञानिक नरेंद्र सिंह सिपानी ने अनुभवों और अंचल की भौगोलिक स्थिति आधार पर स्पष्ट किया है कि सबकी जिम्मेदारी ही क्रांतिकारी बदलाव ला सकती है तभी हम आनेवाली पीढ़ी को नदी ओर जल स्त्रोतों को सौंप पाएंगे और आशा हम कर रहे हैं ।