विश्व संग्रहालय दिवस पर विशेष: राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पुरातत्व विद्वान एवं इतिहासकार तथा दशपुर प्राच्य शोध संस्थान निदेशक 

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विश्व संग्रहालय दिवस पर विशेष: राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त पुरातत्व विद्वान एवं इतिहासकार तथा दशपुर प्राच्य शोध संस्थान निदेशक 

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*श्री कैलाश चन्द्र पाण्डेय* से विशेष साक्षात्कार

*मंदसौर से डॉ घनश्याम बटवाल द्वारा*

*∆* विश्व संग्रहालय दिवस का प्रारंभ कब और कैसे हुआ —

विश्व संग्रहालय दिवस की शुरुआत 18 मई 1977 को इन्टरनेशनल आफ म्यूजियम्स के द्वारा की गई। इसका प्रमुख उद्देश्य मानव समाज में संग्रहालयों की भूमिका सुनिश्चित करना है। विश्व में इन समय सबसे महत्वपूर्ण संग्रहालय इंग्लैण्ड में है। ऐसा में इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कभी इंग्लैण्ड के साम्राज्य का सूर्य अस्त नहीं होता था। इसलिये इंग्लैण्ड के संग्रहालयों में पूरे विश्व की नायाब चीजों का विशाल संग्रह है।

*∆* भारत में संग्रहालय स्थापना का श्रेय किसे जाता है ?

भारत में संग्रहालय स्थापना का श्रेय अंग्रेजों को जाता है। उन्होंने ईस्ट इण्डिया कंपनी की राजधानी कोलकाता में पहला संग्रहालय 1814 में खोला।

*∆* वर्तमान में मध्यप्रदेश का सबसे पुराना संग्रहालय कब और कहां स्थापित हुआ 

जहाँ तक मेरी जानकारी है वर्तमान मध्यप्रदेश का पहला संग्रहालय होलकर रियासत के मुख्यालय इन्दौर में नररत्न मन्दिर के नाम से स्थापित किया गया था। इसके प्रथम क्यूरेटर प्रख्यात इतिहासकार गौरीशंकर हीरचन्द ओझा (अजमेर) के सुपुत्र डाक्टर रामेश्वरलाल ओझा बनाये गये थे।

*∆* आप संग्रहालय से कब और कैसे जुड़े इसकी स्थापना 1927 ई. मे हुई थी।

मन्दसौर के प्रथम उत्खनन में मैं प्रख्यात पुरातत्व विद्वान डॉ. वि. भी. वाकणकर का शिष्य बन गया था। 1978 के द्वितीय मंदसौर उत्खनन के वाद मुझे विक्रम वि.वि. उज्जैन में डॉ. वाकणकर के पास विक्रम कीर्ति मन्दिर में दैनिक वेतन भोगी के रूप में कार्य करने का अवसर मिला। यहाँ मंदसौर के डॉ बाबूलाल शर्मा के साले साहब डॉ. आर्य रामचन्द्र तिवारी (गांधी नगर, गुजरात) के मार्गदर्शन में संग्रहालय पंजिका संधारण करने का प्रशिक्षण प्राप्त हुआ।

*∆* आपको स्वतंत्र रूप से निर्माण और कार्य करने का कैसे अवसर मिला 

मुझे स्वतंत्र कप से संग्रहालय निर्माण करने का दायित्व मन्दसौर कलेक्टर पी. एस. तोमर (1982-85) ने प्रदान किया। मैंने श्री गिरिजाशंकर कनवाल व डॉ भारती जोशी (पुरावस्तु पंजीयन अधि. उज्जैन) के मार्गदर्शन में मन्दसौर खुला पुरातत्त्व संग्रहालय का निर्माण 1983 में मन्दसौर दुर्ग में टी. वी सेन्टर के पीछे किया। कलेक्टर श्री तोमर के आदेश से मै इस संग्रहालय का संग्रहाध्यक्ष रहा।

*∆* अबतक की जानकारी प्रदान करें कार्य करने का अनुभव ओर क्षेत्र क्या रहा 

मुझे रासेयो शिविर हिंगलाजगढ़ (1983) धर्म राजेश्वर, (1984) जीरन (1982) में प्रतिमा संग्रहण का अवसर मिला। इसके बाद उदनदेखेजी जिला शाजापुर, सी.आर. पी.एफ सग्रहालय नीमच, जिला पुरातत्व संग्रहालय कलेक्ट्रेट, हायर सेकेंडरी संग्रहालय कंजार्डा (नीमच) में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ।

*∆* आजकल संग्रहालय संबंधी क्या कार्य चल रहा है 

वर्तमान में दिगम्बर जैन संग्रहालय चूलगिरि जिला बड़‌वानी में जैन प्रतिमाओं का प्रतिभिज्ञान कर संग्रहालय पंजिका संधारण करने का कार्य कर रहा हूँ।

*∆* लंबा अनुभव पुरातत्व संग्रहालय कार्य करने का है ऐसा कोई प्रसंग जो अपने मिशन में सफ़ल नहीं हो सकें हों 

हाँ महाराज कुमार डॉ. रघुबीर सिंह की बहुत ईच्छा थी कि उनके सीतामऊ रियासत की प्रथम राजधानी लदुना में स्थित रामसिंह महल में जिला संग्रहालय की स्थापना हो। इस हेतु उन्होंने राज्य पुरातत्त्व विभाग से पत्राचार भी किया था। इस पर भी पुरातत्व विभाग के श्री आर. एस. गर्ग ने लदुना महल का मुआयना किया था। उन्होंने जिला संग्रहालय हेतु इस महल को अपर्याप्त पाया। और डॉ रघुबीरसिंह का स्वप्न उनके जीवनकाल में साकार न हो सका

*∆* मंदसौर के पुरातत्व संग्रहालय में किसकी विशिष्ट भूमिका रही 

वैसे तो पहले खुला संग्रहालय रहा बाद भवन निर्माण हुआ और 1997 में तत्कालीन पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री डॉ विजय लक्ष्मी साधो ने संग्रहालय लोकार्पण किया था ।

तत्कालीन मन्द‌सोर कलेक्टर श्री प्रहलाद सिंह तोमर ने जिला पुरातत्व खुला संग्रहालय की स्थापना कर जो महत्वपूर्ण कार्य किया उसे सार्थक करने में डिप्टीकलेक्टर जी. के सारस्वत व राजकु‌मार माथुर ने बहुत मेहनत की। आगे चलकर कलेक्टर एम.एम. उपाध्याय ने नवीन भूमि का अधिग्रहण कर संग्रहालय निर्माण कराया । कलेक्टर मनोज कुमार श्रीवास्तव के प्रयत्नों ने इसका नामकरण यशोधर्मन पुरातत्व संग्रहालय हुआ। कलेक्टर गौतमसिंह के प्रयायों से सबके जीर्णोद्वार हेतु 22 लाख रुपए की राशि . स्वीकृत हुए।

*∆* विश्व संग्रहालय दिवस पर विशेष संदेश क्या है 

जनसाधारण को चाहिये कि वे अपनी टूटी फूटी पाषाण प्रतिमाओं को पानी में प्रवेश कराने के बजाय संग्रहालयों में जमा करावें । विद्यार्थियों को चाहिये कि वे अपने पूर्वजों की विरासत से प्रेरणा ले। शिक्षण संस्थानों को भी रूचि लेकर विद्यार्थियों को प्राचीन संस्कृति और सभ्यता से रूबरू कराना चाहिए इससे जागरूकता होगी और युवा पीढ़ी तत्कालीन समय के बारे में जान पाएंगे ।

*∆* क्या अविभाजित मंदसौर जिले के नीमच जो अब पृथक जिला स्थापित है वहां संग्रहालय निर्माण उचित होगा 

बहुत पहले नीमच जिले में मैने नई विधा के पण्डित शिव नारायण गौड, प्रकाश मानव व राजेश मानव के आर्थिक सहयोग से गहन सर्वेक्षण कर जो जानकारी एकत्र की है। इससे अच्छा संग्रहालय निर्माण करना चाहिये । नीमच पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर की जन्म स्थली है। साथ ही पुरातत्व इतिहास संबंधी विशिष्ट संपदा नीमच जिले में है इसे संग्रहित कर संग्रहालय निर्माण कर रखा जाना चाहिए । जनप्रतिनिधियों को प्रशासन ओर नागरिकों को पहल करनी होगी तभी सार्थकता है ।

*∆* पद्मश्री डॉ वाकणकर पुण्यतिथि पर भोपाल कार्यक्रम क्या रहा 

अभी 3 अप्रैल को संस्थान में उनकी पुण्यतिथि पर विशेष व्याख्यान आयोजन किया गया । उनके शिष्य श्री नारायण व्यास को पद्मश्री अलंकृत होने पर और डॉ वाकणकर के शिष्य के रूप में सम्मानित किया गया । आयुक्त पुरातत्व विभाग मदन नागरगोजे द्वारा दोनों को “मॉन्यूमेंट मेन” उपाधि देते हुए योगदान की सराहना की ।