
थोपे गए युद्धविराम, अधिक भयानक युद्ध लाते हैं…
कौशल किशोर चतुर्वेदी
अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर से युद्ध शुरू हो गया है। डोनाल्ड ट्रंप जिस तरह से युद्ध विराम थोपकर ईरान को शांति भेंट करने की कवायद करते नजर आते हैं, वह उतनी ही जल्दी बेअसर होकर पहले से ज्यादा अशांति और भयंकर युद्ध लेकर आती है। ट्रंप से बेहतर तो इन दिनों बेंजामिन नेतन्याहू साबित हो रहे हैं, जो लेबनान को लेकर अपना रुख बदलने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में जब भी उनके बीच शांति की सफल वार्ता होगी, तब बराबरी और सम्मान की स्थिति में होगी और वह ज्यादा टिकाऊ साबित होने की संभावना लिए रहेगी। अमेरिका-ईरान युद्ध और इसके युद्ध विराम की कवायद ठीक वैसी ही लग रही है जैसी 107 साल पहले 28 जून 1919 को वर्साय की सन्धि को जर्मनी पर जबरदस्ती थोपकर प्रथम विश्वयुद्ध को खत्म किया गया था। वर्साय की सन्धि को जर्मनी पर जबरदस्ती थोपा गया था। इस कारण एडोल्फ हिटलर और अन्य जर्मन लोग इसे अपमानजनक मानते थे और इस तरह से यह सन्धि द्वितीय विश्वयुद्ध का सबसे महत्वपूर्ण कारण बनी थी। प्रथम विश्वयुद्ध के लिए एकमात्र जर्मनी को जिम्मेदार ठहराया गया था। इस संधि के बाद जर्मनी प्रतिशोध की आग में लगातार तपता रहा और 1933-34 में जर्मन राजनीति में हिटलर के उत्कर्ष के बाद वर्साय की शर्तों को तोड़ना तो एक मामूली बात हो गई।
1935-36 में हिटलर ने संधि के निःशस्त्रीकरण से संबंधित प्रावधानों का उल्लंघन कर सेनाओं में वृद्धि की और 1936 में राईनलैंड पर अधिकार कर लिया। मार्च 1938 में ऑस्ट्रिया को जर्मनी के साथ मिलाकर तथा सितम्बर 1938 चेकोस्लोवाकिया को मिलाकर हिटलर ने वर्साय की संधि के प्रादेशिक व्यवस्थाओं के प्रावधानों को भंग कर दिया। जब हिटलर ने वर्साय संधि द्वारा निर्मित पोलैण्ड से संबंधित पोलिश गलियारे एवं डान्जिंग बंदरगाह संबंधी व्यवस्थाओं को तोड़ने के उद्देश्य से पोलैंड पर आक्रमण किया तो द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हो गया। कुछ मिलाकर वर्साय संधि की अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं को तोड़ने के लिए ही हिटलर ने घटनाओं की वह श्रंखला आरंभ की जिसके कारण द्वितीय विश्वयुद्ध का विस्फोट हुआ।
आज प्रथम विश्वयुद्ध और वर्साय की संधि की बात इसलिए हो रही है क्योंकि आज 28 जून है। वर्साय संधि प्रावधानों का उल्लंघन एवं संशोधन इसलिए किया गया कि यह अत्यधिक कठोर एवं अपमानजनक थी। ऐसी कठोर एवं अपमानजनक संधि की शर्तों को कोई भी स्वाभिमानी राष्ट्र एक लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं कर सकता था। अतः यह स्पष्ट था कि जर्मनी भविष्य में उपर्युक्त अवसर मिलते ही वर्साय संधि द्वारा थोपी गई व्यवस्था से मुक्त होने तथा अपमान के कलंक धोने का प्रयास करेगा। जर्मनी की कैथोलिक सेंटर पार्टी के एजर्बर्गर का विराम संधि के समय वक्तव्य था कि “जर्मन जाति कष्ट सहेगी परंतु मरेगी नहीं।” स्वभाविक रूप से जर्मनी ने इस अपमानजनक शर्तों को धोने का सफल प्रयास किया। परिणामस्वरूप कुछ ही वर्षों में यूरोप का राजनीतिक वातावरण अत्यंत अशांत हो गया और विश्व को प्रथम महायुद्ध से भी अधिक भयंकर और प्रलयंकारी युद्ध देखना पड़ा। इसी संधि में द्वितीय विश्वयुद्ध के बीज विद्यमान थे।
तो अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और युद्धविराम को लेकर 18 जून 2026 को समझौता हुआ था।
इस समझौते (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग) पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने हस्ताक्षर किए थे।
इस समझौते में लेबनान समेत सभी मोर्चों पर युद्धविराम करने की बात शामिल थी। हालांकि, समझौता करने वाले दोनों प्रमुख देशों के बीच ही यह नहीं टिक पाया और आठ दिन में ही 26 जून 2026 को फिर से दोनों देशों के बीच युद्ध की शुरुआत हो गई। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर (आईआरजीसी) ने इस हमले के लिए अमेरिका और इसराइल को ज़िम्मेदार ठहराया। आईआरजीसी ने अमेरिका और इसराइल पर सीज़फ़ायर तोड़ने के आरोप लगाए। आईआरजीसी ने कहा, “समझौता तोड़ने वाला अमेरिकी शासन हमेशा की तरह अपने वादे तोड़ता है और अलग-अलग बहानों से ईरान के तट पर हवाई हमला करता है।”
आईआरजीसी ने चेतावनी देते हुए आगे कहा, “अगर हमला दोबारा हुआ तो हमारा जवाब इससे भी बड़ा होगा।”
आईआरजीसी ने इसराइल पर भी लेबनान में सीज़फायर तोड़ने का आरोप लगाया। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रमुख इब्राहिम अज़ीज़ी ने अमेरिकी हमले की तीखी आलोचना की। उन्होंने एक्स पर लिखा, “अमेरिका ने बातचीत के बीच एक बार फिर ईरान पर हमला किया। नाकाम अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिखा दिया है कि उसे बातचीत या युद्धविराम के नियमों की कोई परवाह नहीं है। इब्राहिम अज़ीज़ीने आगे लिखा, “यह लापरवाही भरा उल्लंघन हमेशा की तरह उनके पीछे हटने और पछतावे की वजह बनेगा। अब आरोप-प्रत्यारोप का खेल काम नहीं करता।” और यह पछतावे की वजह शायद द्वितीय विश्व युद्ध की तरह ही भयंकर युद्ध और उसके विनाशकारी परिणामों को जन्म देने वाली साबित हो सकती है।
सार यही है कि तब भी अमेरिका प्रमुख भूमिका निभा रहा था और आज भी अमेरिका प्रमुख भूमिका में है। प्रथम विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों के प्रमुख सदस्य ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, इटली, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका थे। इसके अलावा, सर्बिया, बेल्जियम, रोमानिया और ग्रीस जैसे कई अन्य देश भी इस गठबंधन में शामिल थे। तो दूसरी तरफ, जर्मनी अकेला सबसे जूझ रहा था। अब ईरान अकेला खड़ा नजर आ रहा है और अमेरिका है कि बार-बार कोहराम मचा रहा है। बात बस इतनी सी है कि ट्रंप को युद्ध शुरू करने की इतनी अकुलाहट भी नहीं होनी चाहिए, तभी युद्ध विराम जैसे शब्द सार्थक हो सकेंगे। और ट्रंप को यह बात समझ में आनी चाहिए कि थोपे गए युद्धविराम, अधिक भयानक युद्ध लाते हैं…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।





