
केनाइन डिस्टेम्पर बीमारी से पीड़ित मादा तेंदुआ पूरी तरह से स्वस्थ,वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ सेंटर को है वन विभाग के आदेश का इंतजार!
गणेश पांडे की रिपोर्ट
भोपाल। केनाइन डिस्टेम्पर नामक बीमारी जिससे पीड़ित कान्हा में दो टाइगर और तीन शावक की हाल ही में मौत हो गई थी, वहीं बड़ी राहत भरी खबर है कि वेटरनरी विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ’ में इसी बीमारी से संक्रमित एक मादा तेंदुआ को दो महीनों तक चली इलाज के बाद अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुकी है।
यह कहा जा सकता है कि स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ के चिकित्सकों ने टाइगर रिजर्व डॉक्टरों की योग्यता पर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यानि कहीं न कहीं भोपाल में शीर्ष पद पर बैठे अफसरों से लेकर पार्क में पदस्थ डॉक्टरों की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े कर दिए है।
स्वस्थ हुए इस मादा तेंदुआ को नरसिंहपुर के करेली वन परिक्षेत्र से बेहद गंभीर स्थिति में रेस्क्यू कर इलाज के लिए जबलपुर लाया गया था। जांच में पाया गया था कि मादा तेंदुआ केनाइन डिस्टेम्पर नाम की एक अत्यंत खतरनाक और जानलेवा बीमारी से पीड़ित थी।
विशेषज्ञों के अनुसार यह मूल रूप से कुत्तों में होने वाली एक बेहद गंभीर संक्रामक बीमारी है, जो वायरस के कारण फैलती है। इस बीमारी का सबसे घातक पहलू यह है कि इसका वायरस वन्य जीवों के शरीर के कई अंगों पर एक साथ हमला करता है। तेंदुओं में यह बीमारी होने पर उनका पूरा नर्वस सिस्टम (तंत्रिका तंत्र) डैमेज हो जाता है, जिससे वे शिकार करने की क्षमता तक खो देते हैं। ऐसी स्थिति से इस मादा तेंदुआ का उबरना वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए एक बड़ी सफलता है।
*सावधानी के लिए 1 महीना और निगरानी*
संस्थान की डायरेक्टर डॉ. शोभा जावरे ने बताया कि केनाइन डिस्टेम्पर एक बेहद संवेदनशील बीमारी है। इसमें इलाज के बाद भी तीन महीनों का सख्त प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य होता है, क्योंकि इस अवधि में ‘वायरस शेड’ (वायरस के दोबारा सक्रिय होने या फैलने) का खतरा बना रहता है।
वन्यजीव विभाग कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता, इसलिए एहतियात के तौर पर मादा तेंदुआ को अभी एक महीने और संस्थान में ही आइसोलेशन में रखा जाएगा। इससे बीमारी की पुनरावृत्ति को रोका जा सकेगा और अन्य जानवरों में संक्रमण फैलने का
खतरा भी पूरी तरह खत्म हो जाएगा।
*लम्बे समय से तेंदुआ को वापस जंगल छोड़ने का इंतजार*
वन विभाग के आदेश का इंतजार लंबे और कठिन इलाज के बाद पूरी तरह रिकवर हो चुकी इस मादा तेंदुआ को वापस प्राकृतिक आवास में भेजने की तैयारी है। संस्थान को अब केवल मुख्य वन संरक्षक वन्यप्राणी, भोपाल के आधिकारिक आदेश का इंतजार है। जैसे ही तीन महीने का निधारित प्रोटोकॉल और कानूनी औपचारिकताएं पूरी होंगी, वन विभाग के निर्देशानुसार इसे पुनः किसी सुरक्षित जंगल या प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाएगा।





