
आज ‘संविधान हत्या दिवस’ पर राजनीति का दिन है…
कौशल किशोर चतुर्वेदी
51 साल पहले 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा भारत में आपातकाल की घोषणा की गई थी। विरोधियों को जेलों में ठूंस दिया गया था और भारत में इंदिरा की आवाज का राज था, बाकी सभी आवाजें दबा दी गई थीं। और जब आपातकाल हटा और कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई, तब भारत में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी।
और दूसरा दृश्य यह है कि आपातकाल लागू होने के पचास साल पूरे होने के 11 साल पहले से भारत में एनडीए की सरकार थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विपक्ष हाशिए पर था। विपक्ष की तरफ से संविधान बचाओ, संविधान बचाओ की आवाज दी जा रही थी। ऐसी परिस्थितियों में जून 2024 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ मनाना ये याद दिलाएगा कि जब भारत के संविधान को कुचला जाता है तो क्या होता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर उन्होंने लिखा, “यह हर उस व्यक्ति को श्रद्धांजलि देने का भी दिन है जो आपातकाल की ज़्यादतियों की वजह से उत्पीड़ित हुए। कांग्रेस ने भारतीय इतिहास में ये काला दौर शुरू किया था।” वहीं कांग्रेस ने भारत सरकार के स्तर पर किए गए इस फ़ैसले की आलोचना करते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री एक बार फिर हिपोक्रेसी से भरी एक हेडलाइन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा था, “यह वही नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने भारत के संविधान और उसके सिद्धांतों, मूल्यों एवं संस्थानों पर सुनियोजित ढंग से हमला किया है।”
भारत सरकार द्वारा 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाने के लिए जारी की गई गजट अधिसूचना में कहा गया था, “जबकि, 25 जून, 1975 को आपातकाल की घोषणा की गई थी, तत्पश्चात उस समय की सरकार द्वारा सत्ता का घोर दुरुपयोग किया गया और भारत के लोगों पर ज्यादतियां और अत्याचार किए गए और जबकि भारत के लोगों को भारत के संविधान और भारत के लोकतंत्र पर दृढ़ विश्वास है; इसलिए, भारत सरकार ने आपातकाल की अवधि के दौरान सत्ता के घोर दुरुपयोग का सामना और संघर्ष करने वाले सभी लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया है। और भारत के लोगों को, भविष्य में, किसी भी तरह से सत्ता के घोर दुरुपयोग का समर्थन नहीं करने के लिए पुन: प्रतिबद्ध किया है।”
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने केंद्र सरकार के इस फ़ैसले पर पार्टी की ओर से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक्स पर लिखा, “यह वही नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने भारत के संविधान और उसके सिद्धांतों, मूल्यों एवं संस्थानों पर सुनियोजित ढंग से हमला किया है। यह वही नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री हैं जिनके वैचारिक परिवार ने नवंबर 1949 में भारत के संविधान को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि यह मनुस्मृति से प्रेरित नहीं था। यह वही नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री हैं जिनके लिए डेमोक्रेसी का मतलब केवल डेमो-कुर्सी है।”
2024 के पूरे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कहा था कि संविधान को बचाना है तो बीजेपी को हराना होगा। राहुल गांधी अक्सर अपनी सभाओं में संविधान की प्रति लहराते रहते थे।अपनी सभाओं में राहुल गांधी कहते रहे कि बीजेपी अगर दोबारा सत्ता में आई तो वो संविधान को बदल देगी। मई, 2024 में अपने एक भाषण में राहुल गांधी ने कहा था, “जो भी हिंदुस्तान के आदिवासियों को मिला है, दलितों को मिला है, पिछड़ों को मिला है… आपके जल, जंगल और ज़मीन का जो हक है… वो सारा का सारा इस संविधान ने आपको दिया है। नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि इसको परे किया जाए और उनका पूरा का पूरा राज हो। आपके जो अधिकार हैं वो आपसे छीने जाएं। हम उनको रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
और तब 24 जून से शुरू हुए संसद के सत्र में संविधान और इमरजेंसी का मुद्दा छाया रहा था। राहुल गांधी ने सांसद के तौर पर शपथ लेते वक्त अपने हाथ में संविधान की प्रति रखी थी। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने शपथ के बाद जय संविधान कहा था। इसके बाद संसद की संयुक्त बैठक के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण में भी इमरजेंसी का ज़िक्र था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने भाषण में कहा था,”आज 27 जून है। 25 जून, 1975 को आपातकाल लागू करना संविधान पर सीधे हमले का सबसे बड़ा और काला अध्याय था। पूरा देश इससे क्रोधित था। लेकिन देश ऐसी असंवैधानिक ताकतों पर विजयी हुआ क्योंकि लोकतंत्र की परंपराएं भारत के मूल में हैं।”
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने साल 2021 में आपातकाल पर कांग्रेस का पक्ष रखते हुए इस फ़ैसले को एक भूल बताया था। उन्होंने जाने-माने अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर कौशिक बासु के साथ बातचीत में कहा था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का आपातकाल लगाने का फ़ैसला एक गलती थी। राहुल ने कहा था कि 1975 से 77 के बीच 21 महीने के आपातकाल के दौरान जो कुछ भी हुआ वो गलत था।
राहुल गाँधी ने ये भी कहा था कि आपातकाल के दौरान संवैधानिक अधिकार और नागरिक आजादी निलंबित कर दी गई थी, प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया था और बड़ी संख्या में विपक्षी नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया था। लेकिन ये सारी चीज़ें आज के माहौल से बिल्कुल अलग थी।
“मैं मानता हूँ कि वो एक भूल थी। पूरी तरह से गलत फैसला था। और मेरी दादी (इंदिरा गाँधी) ने भी ऐसा कहा था। लेकिन तब कांग्रेस ने भारत के संस्थानिक ढाँचा पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की थी। सच कहें तो यह क्षमता भी नहीं है। कांग्रेस की विचारधारा हमें ऐसा करने की अनुमति भी नहीं देती है। आपातकाल और आज जो कुछ हो रहा है, उसमें मूलभूत अंतर है। आरएसएस संस्थानों में अपने लोगों को भर रहा है। अगर हमने बीजेपी को चुनाव में हरा भी दिया तब भी हम संस्थानिक ढाँचा में बैठे उनके लोगों से मुक्त नहीं हो पाएंगे। आधुनिक लोकतांत्रिक प्रणाली संस्थानिक संतुलन के कारण है। संस्थान स्वतंत्र रूप से काम करते हैं। संस्थानों की स्वतंत्रता पर भारत का सबसे बड़ा संगठन, जिसे आरएसएस कहा जाता है, वो हमला कर रहा है। यह सुनियोजित तरीक़े से किया जा रहा है। हम ये नहीं कहेंगे कि लोकतंत्र कमजोर किया जा रहा है बल्कि उसे नष्ट किया जा रहा है।”
तो पूरे देश में आज आपातकाल लागू होने वाले दिन और संविधान हत्या दिवस पर राजनीति का दिन है। आरोप प्रत्यारोपों में यही सब बातें शामिल रहेंगी। और हर साल की तरह, इस साल भी 25 जून का दिन यह सब देखने के लिए थोड़ा ज्यादा समय रुककर अंततः विदा ले लेगा…।
लेखक के बारे में –
कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।
वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।





