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गुलजार बाजार में विक्रेता इतना लाचार क्यों!

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गुलजार बाजार में विक्रेता इतना लाचार क्यों!

गुरविंदर सिंह घुम्मन

अर्थशास्त्र का ही सिद्धांत है कि स्वस्थ बाजार से स्वस्थ अर्थव्यवस्था का जन्म होता है। यदि बाजार व्यवस्था स्वस्थ और बाजार के नियमों के अनुरूप है तो विक्रेता का मुनाफा और उपभोक्ता के सभी हित भी सुरक्षित रहते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि प्रकृति का नियम है और वह हर पल बदलती रहती है। यदि अर्थव्यवस्था की प्रकृति बदलती है तो बाजार भी बदलता है। उसके कायदे-कानून भी बदलते हैं। जिस दिन नदी अपने मूल स्वभाव के अनुरूप बहना छोड़ देगी तो उसका पानी कुछ समय बाद तालाब में तब्दील हो जायेगा और साथ ही उस पानी की जीवंतता खत्म हो जायेगी। सही मायने में व्यक्ति हो या बाजार उसका समय के साथ कदमताल करना जरूरी होता है। इसी में उसका जीवन निहित है और साथ ही भविष्य भी है।

देश ने गुलामी का लम्बा काल देखा। गुलामी के काल की त्रासदी ने हमारा आर्थिक शोषण किया। शोषण का शिकार होने पर सोच भी बदलती है। हमारी क्रय शक्ति उससे सीधे प्रभावित होती है। हम सीमित साधनों में असीमित सुख चाहते हैं। यही सोच हमें बाजार में उतरते वक्त भाव-तौल करने को बाध्य करती है। अर्थव्यवस्था का नियम है कि हर व्यक्ति अपनी मुद्रा का अधिकतम सुख चाहता है। जो पैसा उसके हाथ में उससे अधिकतम लाभ चाहता है। मानसिक संतुष्टि चाहता है। लेकिन उसके लिये जरूरी है कि हम बाजार व्यवस्था की नैतिकता का पालन करें। इस नैतिकता की अपेक्षा जहां विक्रेता से की जाती है तो उसी नैतिकता की उम्मीद ग्राहक से भी की जाती है। ऐसा नहीं हो सकता कि बाजार में बैठा विक्रेता अपना सारा मुनाफा किसी ग्राहक के लिये यूं ही छोड़ देगा।

बाजार में मूल्य का निर्धारण कई घटकों से होता है। निस्संदेह, एक विक्रेता जब कोई अपना कारोबार शुरू करता है तो बाजार में उतरने का जोखिम उठाता है। वह अपने तमाम संसाधनों को जोखिम में डालता है। कारोबार के लिये पूंजी का निवेश करता है। ऐसा निवेश करता है, जिसका भविष्य अनिश्चित है। बाजार की तमाम शक्तियां उसके निवेश को प्रभावित करती हैं। लेकिन इस जोखिम के बावजूद वह बाजार में उतरता है। पूंजी के अलावा वह अपनी कार्यशाला, फैक्ट्री या दुकान के रूप में भी वह अतिरिक्त निवेश करता है। वह कई कामगारों को रोजगार के अवसर भी देता है। बिजली पानी आदि अनेक अन्य खर्चों का वहन करता है। केंद्र व राज्य के विभिन्न करों का भुगतान करता है। आजकल के दिनों में भले ही जीएसटी व्यवस्था लागू होने के कारण इसके नियमों से करों में एकरूपता आई हो, लेकिन अतीत में उसे कई तरह के करों का भुगतान करना पड़ता रहा है। फिर उसे कर निर्धारक अधिकारियों और विभिन्न नियामक संस्थाओं के कारिंदों की जायज-नाजायज इच्छाओं का भी ध्यान रखता है। इस तरह से कई प्रकार के बाजार के जोखिम होते हैं।

भविष्य के बाजार को लेकर चले गए दांव कई बार उलटे भी पड़ सकते हैं। बाजार के उतार-चढ़ाव उसके फैसले को प्रभावित करते हैं। बहुत संभव है कि बाजार में उत्पाद को लेकर विक्रेता ने कई फैसले लिये हों। लेकिन सभी फैसले सटीक हों, यह तय नहीं है। कई बार उसके आकलन में चूक हो सकती है। कुछ मौसमी तीव्रता और बाजार की नकारात्मक प्रवृत्तियां भी उसके भविष्य के आकलन को प्रभावित करती हैं। बाजार में होने वाले उपद्रव भी उसकी आय व मुनाफे को प्रभावित करते हैं।

इतना सब कुछ होने के बाद व्यापारी को ने केवल अपनी लागत व तमाम खर्चे निकालने हैं बल्कि अपने परिवार के भरण-पोषण के लिये लाभांश भी निकालना है। वह बाजार में महज किसी धर्मार्थ कार्य के लिए नहीं बैठा है। उसे जोखिम का प्रतिफल भी चाहिए और अपना लाभांश भी। लेकिन ग्राहक को लगता है कि व्यापारी सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाने के लिये ही बैठा है। कालांतर में ग्राहक की यही सोच बाजार में एक अस्वस्थ प्रतियोगिता को जन्म देती है। सही मायनों में हम आज एक बीमार बाजार में सेहतमंद प्रतियोगिता की उम्मीद लगाए बैठे हैं। बाजार के भीतर की कुछ नकारात्मक प्रवृत्तियां आज इस कदर हावी है कि उससे न केवल विक्रेता का सारा उत्साह ठंडा हो रहा बल्कि उससे आखिरकार ग्राहक को ही हानि उठानी पड़ रही है। इस बीमार बाजार का शिकार केवल दुकानदार ही नहीं है, बल्कि किसान, मजदूर और ग्राहक समेत पूरी अर्थव्यवस्था की गति को ही नुकसान पहुंच रहा है।

निश्चित रूप से किसी बाजार में नैतिक मूल्यों की जरूरत होती है। एक दूध का विक्रेता अपने खर्च निकालने के लिये यदि एक सीमा तक पानी का उपयोग करता है तो वह स्वीकार्य हो सकता है। लेकिन यदि पानी का अनुपात दूध से अधिक हो जाता है तो ग्राहक उसे स्वीकार नहीं करता है। हर चीज की एक सीमा होती है। जीवन के सामान्य नियम बाजार में मूल्य निर्धारण करते हैं। इसे निर्धारित करने में व्यापारी एकतरफा फैसले नहीं कर सकता। इस बात को ग्राहक को स्वीकार करना चाहिए कि व्यापार के एक श्रृंखलाबद्ध चरण होते हैं। उत्पादक की लागत, उसके मुनाफे, मालभाड़ा और सामान की अंतिम डिलीवरी तक के चरण तो विक्रेता लागत के रूप में जो भी धन लगाते हैं , तब जाकर बाजार में वस्तु के मूल्य का निर्धारण होता है।

ऐसे में यदि ग्राहक सोचे कि विक्रेता लागत में से भी मुनाफा निकालकर उसे छूट दे दे तो ये संभव नहीं हो सकता। मूल्य निर्धारण में कई तरह के संतुलन के सिद्धांत काम करते हैं, जिसकी अनदेखी ग्राहक को नहीं करनी चाहिए। उसे छूट की लूट का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। निश्चित तौर पर बाजार में आज गला-काट प्रतियोगिता है। लेकिन उससे बड़ी प्रतियोगिता ग्राहक द्वारा छूट का लाभ उठाने की है। यह भारतीय ग्राहक की सोच बन गई है कि उसे हर उत्पाद खरीदते समय छूट मिलनी चाहिए, भले ही विक्रेता को पड़ता खाये या नहीं खाये। ग्राहक की यही जिद ही बाजार में अनैतिकता को बढ़ावा देती है। बाजार में आया विक्रेता दान-पुण्य के लिए नहीं बैठा है। वह अपने उत्पाद की लागत तो निकालेगा ही, साथ ही अपना मुनाफा नहीं छोड़ेगा। लेकिन ग्राहक की जिद है कि उसे तो बड़ी छूट चाहिए। यहीं से शुरू होता है बाजार में मूल्य युद्ध।

आम धारणा है कि विक्रेता सिर्फ मुनाफा कमाता है और वह नैतिक मूल्यों का पालन नहीं करता। यह धारणा गलत है कि बाजार में बैठा हर कारोबारी सिर्फ मुनाफा कमाना जानता है जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। बाजार में तमाम ईमानदार और कम मार्जिन में कारोबार करने वाले व्यापारी भी होते हैं। जिनकी साख पीढ़ी-दर-पीढ़ी होती है। उनके ग्राहक आंख मूंदकर उनके पास खरीददारी करने चले आते हैं। उनके व्यापार के अपने कुछ कायदे-कानून हैं। उनके मार्जिन निर्धारित होते हैं। ऐसे में बाजार में छूट की लूट की सोच उनके कारोबार को प्रभावित करती है।

छूट की अंतहीन लालसा बाजार को अस्वस्थकर बनाती है। कोई भी विक्रेता बाजार में अपने घर से लागत लगाकर उत्पाद नहीं बेच सकता। वह तमाम उपक्रम अपने उत्पाद की लागत निकालने और अपना लाभांश निकालने के लिये करेगा। इससे बाजार में एक अनैतिक प्रक्रिया का जन्म होता है। फिर दुकानदार ऐसी तरकीब लगाता है कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। वह वस्तु की कीमत ऐसे निर्धारित करता है कि उसका लाभांश भी मिल जाये और ग्राहक का छूट का मनोविज्ञान भी संतुष्ट हो जाये। मसलन कीमत बढ़ाकर और फिर उसमें कटौती करके ग्राहक को संतुष्टि देने का उपक्रम होता है।

दरअसल, छूट व मुनाफे का यही टकराव कालांतर बाजार में अस्वस्थ प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है। एक अविश्वास के भाव को बढ़ावा देता है। कालांतर हमारी अर्थव्यवस्था में गहरे प्रभाव डालता है। बाजार में रोजगार के अवसरों को प्रभावित करता है। रोजगार की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। यहां तक की विक्रेता व क्रेता के रिश्तों को बाधित करता है। इससे जहां उत्पादक को अपनी लागत नहीं मिल पाती है, वहीं विक्रेता को अपना मुनाफा। बाजार को सामान्य ढंग से संचालित करने के जो नियम है उनके पालन का जितना दायित्व विक्रेता का है उतना ही क्रेता का भी है।