इंदौर लेखिका संघ की परिचर्चा : क्या विकास के लिए शहर की पहचान खोना उचित है ?
शहर के छावनी क्षेत्र में सड़क चौड़ीकरण के लिए की गई तोड़फोड़ को लेकर किया संवाद
इंदौर शहर के मुख्य हिस्से में स्थित वर्तमान छावनी (Chhawani) क्षेत्र की। यह क्षेत्र मूल रूप से ब्रिटिश रेजीडेंसी और होल्कर रियासत के बीच प्रशासनिक और सैन्य तालमेल का केंद्र था।
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रेजीडेंसी एरिया का विस्तार: इंदौर शहर में ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट (बाद में एजेंट टू द गवर्नर जनरल – AGG) के रहने और कार्यालय के लिए ‘रेजीडेंसी क्षेत्र’ (वर्तमान रेजीडेंसी कोठी के आसपास) बनाया गया।
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बाजार और नागरिक छावनी का उदय: इस रेजीडेंसी और ब्रिटिश अधिकारियों की सुरक्षा के लिए जो सैनिक टुकड़ियां (Native Infantry) तैनात की गईं, उनके ठहरने और रसद (सप्लाई) के लिए जो इलाका विकसित हुआ, वही आज इंदौर का छावनी क्षेत्र कहलाता है।
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व्यापारिक केंद्र: सैनिकों और ब्रिटिश परिवारों की दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए धीरे-धीरे यहां बाजार विकसित होने लगे। चूंकि यह मुख्य शहर (राजवाड़ा और जूनी इंदौर) और ब्रिटिश प्रशासनिक क्षेत्र के बीच की कड़ी था, इसलिए यह एक प्रमुख व्यापारिक हब बन गया (जो आज भी अनाज और कपड़ा व्यापार के लिए जाना जाता है)।
।इंदौर के छावनी क्षेत्र में वर्तमान में स्थिति बेहद संवेदनशील, तनावपूर्ण और उथल-पुथल भरी बनी हुई है। मई 2026 के आखिरी हफ्ते (विशेषकर 22 मई से शुरू हुई कार्रवाई) में इंदौर नगर निगम द्वारा मास्टर प्लान के तहत सड़क चौड़ीकरण के लिए यहां एक बहुत बड़ा और ताबड़तोड़ बुलडोजर एक्शन चलाया गया, जिसने पूरे इलाके की सूरत बदल कर रख दी है।वर्तमान स्थिति और इस तोड़-फोड़ से जुड़ी मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
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सड़क चौड़ीकरण (Master Plan): मधुमिलन चौराहे से लेकर छावनी और जगन्नाथ धर्मशाला तक की सड़क को 60 फीट चौड़ा करने के लिए नगर निगम का रिमूवल अमला भारी पुलिस बल, जेसीबी और पोकलेन मशीनों के साथ मैदान में उतरा।
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100 से अधिक निर्माण ध्वस्त: बताया गया इस कार्रवाई में करीब 120 से 150 से अधिक पुराने मकानों और दुकानों के बाधक हिस्सों को ढहा दिया गया। अधिकारियों के अनुसार यह कार्रवाई सड़क चौड़ीकरण में बाधक अतिक्रमणों को हटाने के लिए थी
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।इंदौर की 136 साल पुरानी छावनी बसाहट को विकास के नाम पर मलबे में तब्दील कर दिया गया। आरोप लगाया गया कि कार्रवाई इतनी जल्दबाजी में की गई कि लोगों को अपने घरों से सामान तक निकालने का समय नहीं मिला। जबकि कई रहवासियों के पास संपत्तियों की वैध रजिस्ट्री मौजूद है.इसी संवेदनशील विषय पर इंदौर लेखिका संघ ने विचार आमंत्रित किये ,क्या सोचती हैं प्रबुद्ध महिलाएं ,आइये जानते हैं –
1. इमारतों को तोड़ा जाना केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि भावनाओं और विकास के बीच का संघर्ष है-सुषमा शुक्ला

आज इंदौर की पुरानी छावनी और ऐतिहासिक इमारतों को तोड़ा जाना केवल एक निर्माण कार्य नहीं, बल्कि भावनाओं और विकास के बीच का संघर्ष है। बढ़ती आबादी, यातायात और आधुनिक सुविधाओं की आवश्यकता ने शहरों को विस्तार देने के लिए मजबूर किया है। चौड़ी सड़कें, नई इमारतें और आधुनिक व्यवस्थाएँ समय की ज़रूरत बन चुकी हैं।
परंतु प्रश्न यह भी उठता है कि क्या विकास का अर्थ केवल पुरानी पहचान मिटाना है? जिन इमारतों ने वर्षों तक संस्कृति, इतिहास और स्मृतियों को सँजोया, उनका अस्तित्व भी शहर की आत्मा होता है।
इसलिए यह कहना उचित होगा कि शहरीकरण कहीं न कहीं ज़रूरत भी है और मजबूरी भी। ज़रूरत इसलिए कि समय के साथ सुविधाएँ बढ़ें, और मजबूरी इसलिए कि बढ़ती जनसंख्या और बदलती जीवनशैली शहरों पर दबाव बना रही है।
लेकिन सच्चा विकास वही होगा, जहाँ आधुनिकता के साथ इतिहास और विरासत का सम्मान भी सुरक्षित रखा जाए। क्योंकि जिस शहर की जड़ें बची रहती हैं, वही शहर आने वाले समय में अपनी असली पहचान बनाए रखता है।इंदौर का छावनी
कभी शान थी शहर की, इतिहास की वह निशानी,
आज टूट रही चुपचाप, इंदौर की पुरानी छावनी।
जिन गलियों में बचपन ने सपनों के दीप जलाए थे,
आज उन्हीं रास्तों पर मशीनों ने शोर मचाए हैं।
वो बरगद की छाँव, वो चौक की पुरानी बातें,
हर ईंट में बसती थीं अपनों की सौगातें।
शहरीकरण की दौड़ में स्मृतियाँ बिखर रही हैं,
पुरखों की साँसों वाली दीवारें सिहर रही हैं।
इमारतें केवल पत्थर नहीं, जीवन का आईना होती हैं,
बीते वर्षों की हँसी और आँसू संजोए होती हैं।
नई चमक जरूरी है, विकास भी होना चाहिए,
पर इतिहास का सम्मान भी साथ में रहना चाहिए।
जो कल की पहचान थे, उन्हें यूँ मिटाया न जाए,
इंदौर की आत्मा को कंक्रीट में दबाया न जाए।
कल जब नई सड़कें होंगी, ऊँची इमारतें मुस्काएँगी,
तब छावनी की पुरानी यादें आँखों में उतर आएँगी।
२.अतिक्रमण तोड़ा वहां तक तो ठीक है, लेकिन मकानों को जो क्षति हुई उसके भरपाई कौन करेगा ? -प्रभा तिवारी

किसी भी शहर में, गलियों मेंसड़क चौड़ीकरण करना मजबूरी भी और जरूरी भी है.पर दोनों का संतुलित होना चाहिए।
हम इंदौर को ही इस परिचर्चा में देखें तो इंदौर हमारी सांस्कृतिक धरोहर है।इसकी पहचान राजबाड़ा,छतरी, लालकिला, घंटाघर, शनि मंदिर , बड़ा रावला, छावनी ऐसे कई उदाहरण है ऐतिहासिक धरोहर है और पुरानी गलियों के जो नाम है उनसे इंदौर की पहचान है और रही है।
इतने सालो बाद भी आज क ई गलियां उन्ही पुराने नाम से प्रचलित है जो नाम किसी न किसी पहचान से,किसी गली का नाम समाज की पहचान से ऐतिहासिक धरोहर के नाम से रखे गए थे ।परिवर्तन होना भी जरूरी है क्योंकि उस समय और आज के समय में जमीन आसमान का अन्तर होता चला जा रहा है।जनसंख्या में वृद्धि , आधुनिक तकनीक जैसे कई बदलाव आए है।बढ़ते ट्रैफिक दबाव के कारण सड़क का चौड़ीकरण करना जरूरी होता है लेकिन सरकारी अमला सिर्फ आदेश को देखकरबस नोटिस बताकर पहुंच जाते हैं अमला तोड़ने के लिए ऐसे में कई मकान और बाधक निर्माण को हटाने से वहां के स्थानीय लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।ऐसे लागू करते समय प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा और पुनर्वास प्रदान करना भी उतना ही जरूरी है।
सड़क चौड़ीकरण के नाम से ज्यादातर आर्थिक स्थिति से कमजोर लोग, मिडिल क्लास के लोग ही ज्यादा सफर करते हैं
जो रसूखदार लोग है उनका बाधक निर्माण हटाने का काम बहुत सोच-समझकर करतें है.
जबकि बाधक निर्माण को हटाने के लिए समान रूप से सबके साथ पेश आना चाहिए लेकिन ऐसा होता नही है।
छावनी में जो अतिक्रमण तोड़ा वहां तक तो ठीक है लेकिन आसपास के मकानों को जो क्षति हुई है उसके भरपाई कौन करेगा ।छावनी जो एक ऐतिहासिक संस्कृति एक ऐतिहासिक धरोहर था
आज विकास के नाम पर उस धरोहर को समाप्त करना यह कोई उचित नहीं है उसका संरक्षण करना चाहिए जितने भी पुराने धरोहर है, गलियां जो जीवंत इंदौर का परिचय देती है।अगर उस को विकास के नाम पर ढहा दिया जाएगा संरक्षण नहीं मिलेगा एक दिन इंदौर की पहचान खत्म हो जाएगी।
अतः पुराने दस्तावेज, पुरानी इमारत को संरक्षण देते हुए
जहां सड़क चौड़ीकरण करना है
वहां करें पर व्यवस्थित तरीके से
करें वहां बसे लोगों की भावनाओं को नज़र अंदाज़ न करें।
और जहां बहुत ही छोटी-छोटी गलियां है जहां फायर ब्रिगेड पहुंच नहीं पाती है और ऐसे में जनहानि होती है अतः यहां सड़क चौड़ीकरण मजबूरी हो जाती है।
अंत में यही कहूंगी इंदौर की आत्मा है बरसों पुरानी धरोहर उसको यू न उजाड़ो।
जिस प्रकार अपना पुराना मकान ,पुराना पेड़ हो जाता है पर हमारा उससे लगाव कम नहीं होता है उसी प्रकार हमारी प्राचीन धरोहर को संरक्षण के साथ विकास करना चाहिए ।
3. भावनाओं से इतर यदि प्रैक्टिकली सोचें तो यह अपने ही कर्मों का भुगतान है-डॉ निशी मंजवानी

किसी भी ज़मीन पर अवैधानिक रूप से अतिक्रमण सही नहीं है। अपने व्यवसाय के प्रसार हेतु अनाधिकार ज़मीन का प्रयोग अब बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यातायात तो बाधित होता ही है, साथ ही पार्किंग भी प्रभावित होती है।
देखा जा रहा इंदौर पिछले कुछ सालों में बहुत विस्तारित व विकसित हुआ है। जिसके लिए छावनी जैसे बहुत से कदम उठाए गए। नगर के व्यस्ततम मार्ग पर बनी दुकानों और घरों के अग्र भाग को तोड़कर, सड़क चौड़ीकरण किया जाता रहा है,और हो रहा है। यह ज़रूरी इसीलिए है क्योंकि कई लोगों ने आवश्यकता एवं परमीटेड से अधिक जमीन का अधिग्रहण कर लिया है, जो कि गैरकानूनी है।
निगम अधिकारियों की मजबूरी यह है कि बढ़ते वाहन और कम होते पैदल चालकों को देखते हुए, उन्हें अपने ही शहर के लोगों की बसी बसाई ज़िंदगी को उजाड़ना पड़ा। लेकिन किसी भी चीज़ को नया रूप देने से पहले, खूबसूरत बनने से पहले थोड़ा विकृत होना पड़ता है।
यदि हर नागरिक नियमों का पालन करते हुए, सरकारी जमीन पर अनाधिकार प्रवेश ना करे, तो बेशक इस नुकसान से बचा जा सकता है। भावनाओं से इतर यदि प्रैक्टिकली सोचें तो यह अपने ही कर्मों का भुगतान है।
जो अधिग्रहण अतिरिक्त किया
वही उजाड़ उपयुक्त कर दिया।
नागरिक नज़रिए से देखें यदि हम,
क्या हमने कुछ गलत नहीं किया!?
विरासत संस्कार हैं, दिलों में बसते,
सड़क, इमारत वक्त की निशानियाँ।
4.यूं न नष्ट करो शहर की आत्मा दम तोड़ दे-वन्दिता श्रीवास्तव

सुनो
रुको
सोचो
समझो
विचारो
तब
हथौड़े
चलाओ
शहर की
धमनियो
को
यूं न
नष्ट करो
शहर की
आत्मा
दम
तोड़ दे ।।
5. छावनी का दर्द-मत तोड़ो!इस इंदौर के दिल की गलियों को,नहीं चाहिए हमें यहां कोई बायपास-प्राची पांडे
मेरी वो संकरी गलिया,
जिनसे होकर बहती थी
जलेबी और पेड़ो की खुशबू,
तर घेवर की बहती चाशनी,
रंगत टपकते गुलाबजामुन की,
मत उजाड़ो। मत उजाड़ो।।
ऊंची नीची घुआवदार
गलियों से होते तांगे,
घूमते रोकते फेरी वाले,
लेलो बेन! लेलो भिया!
मनुहार करते दुकानदार,
वो कपड़ों के थान की खुशबू,
वो सिलाई मशीन की
दूर से आती खट खट आवाज।
वो ठेले वाले, टेम्पू और हम्माल,
खो रहे है शहरीकरण में।
उड़ते धूल के गुबार,
अच्छे थे काले बदबूदार धुएं से।
मत तोड़ो!
इस इंदौर के दिल की गलियों को,
नहीं चाहिए यहां कोई बायपास,
यहां दर्द अपनो से मिलकर
कम हो जाते है,
शिकवे चाय की चुस्की में
पिघल जाते है,
एम वाय तक का रास्ता
तंग रहे चाहे,
दोस्त चुटकी में उठा,
गोद में ले जाते है।
6.लोग समझ सकें जरूरत को इतना समय तो दिया जाना चाहिए -रूचि बागड़देव

पता चला कि कि कार्रवाई इतनी जल्दबाजी में की गई कि लोगों को अपने घरों से सामान तक निकालने का समय नहीं मिला।क्या यह क्रूरता नहीं है . केवल दो दिन पहले सूचना देकर भारी पुलिस बल और मशीनों के साथ तोड़फोड़ शुरू कर दी गई।क्या यह उचित है .पुरानी बसाहट को विकास के नाम पर उजाड़ दिया. तोड़-फोड़ के कई दिनों बाद भी पूरे क्षेत्र से पूरी तरह मलबा साफ नहीं हो पाने के कारण धूल का गुबार, बिखरे सामान और कंक्रीट की वजह से राहगीरों और वाहन चालकों को भारी परेशानी हो रही है। पूरे छावनी क्षेत्र और उसके आसपास के रास्तों पर लगातार ट्रैफिक जाम की स्थिति बन रही है।विकास होना चाहिए लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए क्षेत्र अपना मूल स्वरुप ही ना खो दे .जनता संकट में ना आ पाए .रहवासियों को विश्वास में लिया जाना चाहिए ,उससे मानसिकता पीड़ा और दुःख की कम होती है और लोग सहर्ष स्वयम सहयोग करते हैं .





