70.In Memory of My Father: “उन्नत ललाट, ऊंचा पूरा कद और फर्राटेदारआवाज, रौबीली मूंछों वाले मेरे पिता पंडित रवीशंकर शुक्ल

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मेरे मन/मेरी स्मृतियों में मेरे पिता

पिता को लेकर mediawala.in में शुरू की हैं शृंखला-मेरे मन/मेरी स्मृतियों में मेरे पिता। इस श्रृंखला की 70 वीं  किस्त में आज हम प्रस्तुत कर रहे है आकाशवाणी भोपाल में वरिष्ठ उद्घोषक अमिता त्रिवेदी का संस्मरण । पिता का साथ और साथ का एहसास भी जीवन के हर संग्राम में अडिग रहने, जूझने और स्वयं को सहेजने में कारगर होता है.अमिता कहती हैं कि मेरे लिए मेरे पिता वास्तविक अर्थों में फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड थे.उनके पिता अंग्रजी और संस्कृत के व्याख्याता थे.वे  इंदौर में चिकित्सा और स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत रहे और भोपाल में शिक्षा विभाग में 1956 से सेवा निवृत्ति तक
निवासरत रहे . 

अमिता उनके स्वभाव को याद करते हुए बता रही हैं कि पिताजी को सख़्तमिज़ाज,अनुशासनप्रिय,नियमित,  अपनी बात के पक्के और बड़े ही सिद्धांत वादी लोगों की श्रेणी में रखा जा सकता है.एक अजीब सा “औरा” था उनका जो जितना डराता था उतना ही सम्मोहित भी करता। अपने पिता के साथ स्नेहिल सम्बन्धों याद करते हुए अमिता अपने पिता को  अपनी भावांजलि दे रही है. – स्वाति 

“पिता”
एक ऐसा शब्द…
जो बोलने में छोटा लगता है,
लेकिन उसके बिना ज़िंदगी अधूरी होती है।
वो कभी थकता नहीं,
कभी रुकता नहीं,
कभी शिकायत नहीं करता —
बस हर रोज़ अपनी जिम्मेदारियों में डूबा रहता है।

 70.In Memory of My Father: “उन्नत ललाट, ऊंचा पूरा कद और फर्राटेदारआवाज, रौबीली मूंछों वाले मेरे पिता पंडित रवीशंकर शुक्ल

 अमिता त्रिवेदी

जिन्हें शब्दों में बांधना बड़ा कठिन है पर जिनसे सदा बंधी रही मै वो “पिताजी“ हैं। जबकि वो मेरी हर बात में मुखर रहे और सिद्धांतों में शामिल। मेरी अपनी सोच में, आदत में, पसंद में, शायद प्रतिक्रिया और आवेग में भी जो मुखरित होता है वह पिताजी की प्रतिछाया है। अब तक जीवन में जो सबसे प्रभावी रहा, जिसे घड़ी घड़ी दोहराया वह पिताजी ही रहे। वो आज भी सुख में, दुख में, उदासी में, ठहाको में, तनाव में, कष्ट में, सपने में, जागृत में, साथ हो लेते हैं और उनके एहसास की जीवंतता भीतर तक भर जाती है। जो संबल, दृष्टि और समझ की धरातल को पुख़्ता करता हुआ, अनुभवों की सारी विद्रूपताओं में विश्वास के बल सा, अनुकूलताओं में साथ की मिठास सा, विषमता में चेतावनी सा और चुनौती में आत्मबल बन कर सदा साथ है वो पिताजी का ही एहसास है।

इस बात को मोटे तौर पर कहें या व्यक्तिगत रूप में बोलूं तो मैं कहूंगी पिता का साथ और साथ का एहसास भी जीवन के हर संग्राम में अडिग रहने, जूझने और स्वयं को सहेजने में कारगर होता है। यूँ ये व्यक्तिगत एहसास की यात्रा भी हो सकती है लेकिन मेरे लिए मेरे पिता वास्तविक अर्थों में फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड थे/हैं। उनके होने पर जो स्ट्रेंथ महसूस होती थी, जो बेबाकी थी, जो निश्चिंतता और बेपरवाही थी, उसका कोई सानी नहीं। बेधड़क कर गुज़रना क्या होता है ये तब जाना जब उनकी छत्रछाया से वंचित हुए। यूं लगा मानो खुले में अकेला छोड़ दिया गया है। उससे पहले तक तो जो होता या करते वो सामान्य, सहजक्रम ही लगता।

किसी भी व्यक्ति या रिश्ते को पूरे तौर पर अभिव्यक्त करना या शब्दों में ढालना तो संभव ही नहीं पर कुछ बातें , घटनाएं, अनुभव होते हैं जो एक चित्र रच देते हैं। उस परिपेक्ष्य में कहा जाए तो पिताजी को सख़्त मिज़ाज,अनुशासनप्रिय,नियमित,  अपनी बात के पक्के और बड़े ही सिद्धांत वादी लोगों की श्रेणी में रखा जा सकता है। जिनकी सख़्ती क्रोध तक भी पहुँच जाती थी। जिनके सिद्धांत स्वयं या परिवार के हित से परे हो जाया करते थे। जीवन अनुशासन की इस सीमा तक था कि कोई भी परिस्थिति उसमें व्यवधान नहीं और नियमबद्धता ऐसी कि बारिश में छाता लेकर भी घूमने जाते जो उनका नियमित क्रम था और मोहल्ले वाले उनके जाने या आने के वक्त से घड़ी मिलाया करते। वो अलग बात है कि साथ के सब बच्चे मिलकर बहुत मजाक उड़ाते हमारा। लेकिन हम सब पास पड़ोस के बच्चे भी उनसे ख़ासा डरते। बावजूद इसके हमारे आसपास के कई सारे बच्चे दूध पीना और खाना खाना, पढ़ना, स्कूल जाना हमारे घर आकर ही सीखे, ऐसा मां और बड़ी दीदी बतातीं। बाद में ये हाल हमने अपने बाद वाली पीढ़ी तक के बच्चों में देखा।

एक अजीब सा “औरा” था उनका जो जितना डराता था उतना ही सम्मोहित भी करता। यूं तो डर की एक दूरी होती ही थी लेकिन फिर भी और लोगों की अपेक्षा “मैं“ काफी सरचढ़ी और मुंहलगी थी उनकी। परिणामतः डांट भी खाई और दूसरों की ईर्ष्या भी सही। अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए तो उनका डर ही काफी था और हम सब बिना कहे ही आदतन शाम को खेल कर आने के बाद पढ़ने बैठ जाते थे। उनसे कुछ पूछना यानि अपने आप को एक बड़ी परीक्षा में डालना होता था। लेकिन फिर भी मैं पहुंच जाती थी कुछ ना कुछ लेकर। ज़्यादातर वह मेरे वाद विवाद प्रतियोगिता या भाषण प्रतियोगिता का कोई विषय होता। लालसा ये रहती थी कि वह लिखवा दें क्योंकि आसपास के या साथियों के माता-पिता ही उन्हें लिख कर देते थे। मुझे नहीं याद पड़ता सिर्फ एक बार को छोड़कर, उन्होंने दो लाइनें भी कभी लिखवाई हों, लिखकर देना तो कल्पना से परे की बात थी। तीसरी कक्षा में थी मै तब पंडित रविशंकर शुक्ल पर एक भाषण देना था मुझे। वही पहला और आखरी मौका था जब उन्होंने तैयार करके मुझे दिया था जिसकी शुरुआत मैं आज तक नहीं भूली हूं –
“उन्नत ललाट, ऊंचा पूरा कद और फर्राटेदार रौबीली मूंछों वाले पंडित रवीशंकर शुक्ल का ………………… ”
उसके बाद कभी भी कोई वक्त, कोई मौका, कोई स्थिति ऐसी नहीं आई जब उन्होंने कुछ पूछने पर लिख कर दिया हो या बोल कर लिखवाया हो। हाँ वक्त बराबर दिया, भरपूर दिया। पहले पूछते, बताते, समझाते और लिखने को कहते। लिख कर ले जाने पर भी पढ़ कर ही सुनाना पड़ता था। फिर ग़लतियाँ बताते, सुधार होता फिर लिखा जाता और कम से कम यह प्रक्रिया तीन बार तो दोहराई ही जाती, तब जाकर कोई विषय मंच पर बोलने के लिए तैयार हो पाता। बहुत कोफ़्त होती थी तब। नाराज़गी भी, बुरा भी लगता और असहज भी। अब लगता है बताना, समझाना और उससे भी बढ़कर आदत डलवाना ज़्यादा मुश्किल भरा काम होता है। लिखकर दे देना तो सबसे आसान। ख़ुद से काम करने की आदत का शायद वह पहला सबक था जिसने सोचने समझने और अपने विचारों के प्रति दृढ़ होने की सीख अनजाने ही दे दी। वह सिलसिला आज भी क़ायम है। निर्भरता जैसी आदत फिर पनपी नही। अपना काम ख़ुद करना और अपने ही बूते पर पहचान को बनाना जीवन के संविधान का महत्वपूर्ण अनुच्छेद बन गया।
दसवीं कक्षा में थी मैं तब। वाद विवाद प्रतियोगिता होनी थी। जिसमें पहले स्कूल स्तर के विजेताओं को ज़िला और फिर राज्य स्तर पर प्रतियोगिता को जीत कर अंतर राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए दिल्ली जाना था। हर स्तर पर जीतते हुए मैं अपने राज्य के प्रतिनिधि के रूप में चुनी गई थी। फाइनल मुक़ाबला एक महीने बाद दिल्ली में होना था। उत्साह के साथ मै अपनी तैयारी में व्यस्त थी। सबसे बड़ी जरूरत विषय पर अच्छी पकड़ की थी जो हर स्तर पर बदल जाया करता था। विषय को अंतिम रूप देने के बाद जब पिताजी को सुनाया तो उन्होंने कहा एक टीचर हैं “गुर्जर मैडम“। यह पता है उनका। दिन में 3:00 बजे मिल लेना उचित समझेंगी तो सहायता कर देंगी। मेरा भी शायद पहला मौका था कि किसी बाहर वाले से कुछ पूछने जा रही थी। हम लोग 2nd स्टॉप पर रहते थे और मैडम गुर्जर 10 नंबर पर। दूसरे दिन स्कूल के बाद साइकिल उठाई और उनके घर पहुंच गई। दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खुलने पर उन्हें बताया कि हमें प्रतियोगिता हेतु उनकी सहायता की जरूरत है। वह बोली आपको 3:00 बजे का वक्त दिया था आप तो देर से आई हैं। मेरे पास कोई जवाब नहीं था। क्योंकि कुछ देर हो चुकी थी। मैंने इंतजार करने का विकल्प दिया तो बोलीं, बैठो मैं बुलाती हूं। उनकी बेटी छोटी सी थी। शायद उसी बच्ची के काम की व्यस्तता रही होगी। काफी देर बाद वो आईं और मैंने अपना लिखा हुआ उन्हें दिखाया। पढ़कर उनकी मुखाकृति कुछ बदली और रूखा सा व्यवहार भी कुछ नरम पड़ा। काफी देर तक फिर वह बताती समझाती रहीं।
चलने की बारी आई और मैं अभिवादन कर, धन्यवाद देकर उठने लगी तो उन्होंने पूछा
“तुम दादा को यानि त्रिवेदीजी को कैसे जानती हो”
“मेरे पिताजी हैं ”
वो अवाक थीं!
कुछ क्षण उन्हे वस्तुस्थिति को समझने में लगे।
आज भी मुझे याद है उनकी वो शक्ल, बनते बिगड़ते भाव। लगभग अविश्वसनीयता की हद तक गले न उतरने वाली मेरी बात सुन कर वो हैरान हो गईं थीं। फिर कुछ क्रोध, अधिकार, श्रद्धा, गर्व के मिलेजुले भाव से बोली
मुझसे कहा था एक स्टूडेंट आएगी कुछ पूछने, समय हो तो बता देना।
“ऐसे ही हैं दादा”

पिताजी 1956 में भोपाल आए थे इंदौर से अपनी सरकारी नौकरी को तिलांजलि देकर। भोपाल में उन्होंने शिक्षण कार्य आरम्भ किया। ये बातें किस्सों के रूप में यदाकदा सामने आईं क्योंकि ये मेरे जन्म से पहले का दृश्य था और फिर भोपाल उनका कार्यक्षेत्र और मेरा जन्मस्थान बना। सत्तर के दशक के आरम्भ की धुंधली सी बातें हैं जो समय के साथ स्पष्ट और सघन होती हुई यादें बन गईं। सेकंड स्टॉप की 89 की लाइन में 16 नंबर का घर था हमारा। दो मंज़िल मकानों में दूसरे नंबर का ऊपरवाला घर था। पिताजी को पैड पौधों से बहुत लगाव था। कई पौधे गमलों में लगे रहते और छत पर हर एक कौने मे मिट्टी डाल कर ईंटों से तिकोनी संरचना बना उनमें बागवानी की जाती। तमाम फूल, मौसमी सब्जियां यहाँ तक की गन्ने भी उस जगह पर उगाए जाते। दिवाली के बाद वाली एकादशी की पूजा में वही गन्ने सजते, बांटते और खाते जब तक उस घर में रहे। सुविधा के नाम पर तब कोई साजोसामान नहीं था और पिताजी बाल्टियों में पानी भर कर छत पर ले जाते पौधों में डालने के लिए। कालांतर में जब बारिश में छत टपकती और हम पी डब्ल्यू डी के ऑफिस रिपोर्ट लिखवाने जाते तो मकान नंबर पूछने पर 16 नंबर सुनते ही कहा जाता अच्छा सोलह नंबर, खेत वाली छत, कोई नहीं आयेगा जब तक खेत नहीं हटेगा। ना खेत हटा, ना ही टपकती छत पूरी तौर पर ठीक हो पाई।
इसी शौक से जुड़ा एक और किस्सा है। तब तक पिताजी रिटायर हो चुके थे और हम रत्नागिरी में रहने आए थे। भोपाल में ये कॉलोनी नई बनी थी। दरवाज़ा खोलते ही सीधे खाली जगह और सड़क।नीचे के घर में भी कोई फैंसिंग नहीं थी। पेड़ों के बिना पिताजी का जीवन कल्पना से परे। अभी घर भी नहीं जम पाया था कि बगीचा लगना शुरू हो गया। आसपास के लोगो ने टोका भी लेकिन ज़िद और जुनून। उसपर से तुर्रा ये कि इंसान ही है जो कहने बताने के बाद भी नहीं मानता, जानवर को चार दिन सिखाओ सीख जाता है और वाकई कर दिखाया उन्होंने। फैंसिंग तो बाद में लग पाई, बगीचा पहले तैयार हुआ क्योंकि ख़ुद पिताजी को ही करना था और करनी थी पहरेदारी भी। परिणामतः पड़ोस में रहने वाले गुप्ता अंकल भी जुट गए इस प्रयास में। एक बड़ा खूबसूरत बगीचा तैयार हुआ, हमारे और गुप्ता अंकल के घर को घेरता हुआ। जिसने बाहर के हिस्से की सीमा रेखा ही नहीं मिटाई बल्कि मन को भी जोड़ दिया। संबंधों का वो मेल उम्र भर बना रहा। अंकल आंटी अकेले ही रहते थे। उत्तरप्रदेश सिंचाई विभाग में इंजीनियर थे और रिटायरमेंट के बाद भोपाल शिफ्ट हो गए थे सुकून भरे जीवन की चाह में। उनकी एक बेटी भोपाल में थी जिस सिरे को थाम वो यहाँ आए थे। फिर पिताजी और गुप्ता अंकल ने मुहिम छेड़ी सड़क के उस पार की ज़मीन पर पौधारोपण की और गुलज़ार हो गया सामने का खाली बंजर मैदान। हम लोग तो दो ढाई साल बाद ही दूसरी कॉलोनी में शिफ्ट हो गए लेकिन सड़क पार के नीम, पीपल, बड़, पारिजात, कनेर, गुड़हल, चांदनी, चंपा………. की छाया और फूलों ने सदा पिताजी का नाम सहेजा। फिर जब कभी वहाँ जाना हुआ पिताजी और उनके पेड़ चर्चा का मुख्य विषय रहे।

पठन पाठन शायद पिताजी का मात्र शौक नहीं था व्यक्तित्व का प्रमुख हिस्सा या अनिवार्य तत्व था। यही वजह रही कि मध्यप्रदेश बनते ही वो अपनी पहली नौकरी छोड़ इंदौर से भोपाल आ गए और शिक्षण कार्य से जुड़ गए। उनकी अपनी बात की जाए तो हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत, भाषा में समान रूप से उनका अधिकार था। साथ ही अन्य भाषा जैसे फ्रेंच, रशियन में भी दखल रखते। ज्योतिष में सिद्धस्थ थे। मेरी अपनी याद्दाश्त में हमारे घर तांता लगा रहता था आने वालों का जो कष्ट, मुश्किल, परेशानी में जन्मपत्री लेकर आते या अंग्रेज़ी पढ़ने के लिए विद्यार्थी, आते ही रहते। विद्या दान की जाती है, बेची नहीं जाती। इस सिद्धांत के जीवंत उदाहरण रहे, जीवन पर्यन्त। अनजाने में भी यदि किसी ने कुछ ऑफर किया उन्हें तो वो दोबारा सीढ़ियां नहीं चढ़ पाया घर की। ईश्वरीय उपहार की तरह प्राप्त ज्योतिष को स्वाध्याय और अनुभव से यूं तराशा था कि उनका कहा, बताया पूरा होता ही था। शायद तभी एक से दूसरा, फिर तीसरा ………… दोस्त, रिश्तेदार, आस पड़ोस फिर उनके दोस्त, उनके रिश्तेदार और ये सिलसिला निरंतर चलता रहता। पिताजी के हिसाब से ज्योतिष एक सुपर हायर गणित है जिसके जितने फाइन कैलकुलेशन उतने ही सटीक परिणाम। अफसोसजनक बात ज़रूर ये रही कि हम भाई बहनों में से कोई भी इस ज्ञान को सहेज नहीं पाया। न ही उनकी की गई वो तमाम व्याख्या और कार्य। क्योंकि वो सब अंग्रेज़ी या संस्कृत में था। भोपाल में तब (2003) ज्योतिष की किताबें या शोध का अंग्रेजी में कोई जानकार हमे नहीं मिला। कुछ अलग अलग हिस्से कहीं कहीं दे दिए गए फिर।

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अमिता त्रिवेदी के माता पिता

पिताजी को सदा किताबों में डूबा, कुछ लिखते या फिर बगीचे को संवारते ही देखा। हमारा घर किताबों से भरा पूरा रहता, पिताजी के कमरे और उनकी किताबों के अलावा भी। घर में दो समाचारपत्र आते। एक हिंदी का दूसरा इंग्लिश का “Indian Express“ इसके अलावा नंदन, पराग और धर्मयुग। नियमित क्रम में Astrological Magzine भी आती। जो बैंगलोर से आती थी सब्सक्रिप्शन लेना पड़ता था। उसका इंतज़ार सबको होता। पिताजी को छोड़कर हम सब का एक ही शगल था मासिक भविष्य विशेषकर दिसंबर में आने वाले वार्षिक अंक का जिसमें सालभर का भविष्य आता। वो अलग बात है कि कितना याद रख पाते या भरोसा करते, पर पढ़ते ज़रूर थे। पढ़ने का चस्का घर में किताबों, पत्रिकाओं के ऐसे ही माहौल से लगा। वो भी किसी किताब या पत्रिका को सबसे पहले पढ़ने का मज़ा, नए ताज़े पन्नों की ख़ुशबू, उसका नशा ही अलग था। इस चाह में सुबह आये ताज़ा अंक को छुपा कर जाते ताकि स्कूल से लौट कर पहले हम ही पढ़ सकें। ये भी शायद जेनेटिक ही था क्योंकि पेपर को लेकर पिताजी की दीवानगी और कट्टरता ग़ज़ब थी। भोपाल में तब इंग्लिश का पेपर अगले दिन मिलता था। लेकिन पेपर वाले से कुछ तो सेटिंग थी, हमारे यहां पेपर शाम के बाद , रात होते तक आ जाता। एक और हिदायत थी, पेपर घर देकर जाना होगा। तब ऊपर के घर में बहुधा पेपर रोल कर सुतली से बांध नीचे से ही फेंका जाता। जिससे सख़्त चिड़ थी पिताजी को। एक ज़माने में प्रेस में स्ट्राइक हो गई जो काफी लंबी चली। दूसरा पेपर पिताजी को गवारा नहीं। शुरू में Times of India देने की कोशिश की तो बेचारे पेपरवाले को डांट खानी पड़ी। बमुश्किल लंबे अंतराल के बाद The Hindu पर कॉम्प्रोमाइज़ हो पाया क्योंकि स्ट्राइक तीन चार महीने से ज़्यादा खिंच गई थी। पढ़ने को लेकर ही नहीं पहनने में भी बड़ी पक्की पसंद थी। सफेद के अलावा कुछ और भाता ही नहीं था। घर में धोती कुर्ता सफेद ही होता। बिस्तर सफेद चादर, तकिए कवर सब सफेद। बाहर खासकर जबतक नौकरी में रहे सफेद शर्ट पेंट ही उनकी पहचान रहा। कभी कभी पैंट या कोट हल्के भूरे या हल्का नीला कोई ले आता तो कहते भैया रावण की सेना में भर्ती होने जाना है क्या?

कॉफी के शौकीन ही नहीं एडिक्ट थे। अपनी याद में मैने घर में कॉफी, वो भी नैस्केफे ही देखी। माँ चाय पीती लेकिन पिताजी और उनके मिलने वाले कॉफी। चाहे वो सज़ा ही लगे दूसरों को। उस ज़माने में यानि सत्तर, अस्सी के दशक में कॉफी के साथ बड़े खूबसूरत, छोटे छोटे कांच के ग्लास आया करते थे। कॉफी टीन के डब्बे में आती उसके ऊपर उल्टा करके ग्लास लगा होता। कालांतर में डिज़ाइनदार ग्लास या बोतल कुछ भी कह लें उसमें कॉफी आती, ढक्कन से सील बंद हो, जो खाली होने पर ग्लास या जार के रूप में काम आते। घर में उनकी खूब बहार थी। जो पड़ोसियों और रिश्तेदारों की भी डिमांड होती, वो भेजे भी जाते बाकायदा बुकिंग होती जिसकी।
भोजन एकदम सादा करते, प्याज़ लहसुन तब हमारे घर नहीं आता था। मीठे के बेहद शौकीन। रबड़ी की हद तक पहुंची खीर और बहते हुए घी वाला हलवा पहली पसंद था। हलवे की प्लेट को जरा टेढ़ा कर देखते, यदि चारों ओर से निकलता हुआ घी नहीं दिखता तो कहते “भैया प्यासा है तुम्हारा हलवा“ ।

कुछ बातें अपने परिवेश में जो मज़ा देती हैं वो आनंद फिर जीवन भर नहीं मिलता। 1997 की बात है मेरी पहली पोस्टिंग आकाशवाणी गुना हुई। पहली ही बार घर से निकली थी और घर बार बार आती। वापसी में हर बार पिताजी पूछते
“भैया पैसे हैं“ जवाब मेरा हाँ में ही होता।
फिर कहते “ले लो, काम आयेंगे“
“नहीं, आप ही कहते हो फ़िज़ूल खर्च करती हूं मैं। नहीं चाहिए।
“रख लो, नए नोट लाया हूं“ कहते हुए नए नए कुछ नोट पकड़ा देते। मैं प्रसन्न मना रख लेती।
मेरी खरीदी हुई लगभग सारी चीज़ों में उन नोट का बड़ा हाथ रहा है। नौकरी के तीस साल होने को आ रहे हैं , घर में भी सबसे छोटी रही तो पैसे मिल ही जाते हैं लेकिन आज भी कसकता है काश! कोई पूछे भैया पैसे हैं? ना करते करते भी थमा दे और मन पूरे अधिकार से स्वीकार ले।
ये सुख वक्त की नेमत ही होते हैं जो भाग्य से ही मिलते हैं।

जीवन को कैसे सहज, सरल जिया जाता है, साधारण कैसे असाधारण बन जाता है अनजाने ही स्थापित करते चले गए पिताजी। जिसके पीछे कोई तयशुदा रणनीति नहीं बल्कि सरल व्यवहार का वो सिलसिला था जो कभी दिखता नहीं था और जिसे बहुत बाद में हम जान पाए।
शाम को टहलना उनके नियमित क्रम का हिस्सा था। उसी दौरान एक बंदे से मुलाकात हुई उनकी। जिसकी सायकल सुधारने की एक अस्थाई दुकान थी जो अतिक्रमण में तोड़ दी गई थी और वो हैरान परेशान था। उसकी दो छोटी छोटी बच्चियां और पत्नी। कोई साधन नहीं, कोई आसरा नहीं। केरल के किसी गाँव का रहने वाला था। कुछ सांत्वना , कुछ मदद, कुछ आश्वासन तात्कालिक रूप से दे चुके थे पिताजी। संयोग था कि उसी दौरान नगरनिगम वैध गुमटियां अलॉट कर रहा था। जानकारी और आर्थिक सहायता से उसे वो दुकान अलॉट करवा के उसके काम को शुरू करवाया। फिर तो हर शाम वो घर आता, बैठता, चाय पीता, सायकल पौछता और थोड़ी देर बाद चला जाता।(वो सायकिल मेरे लिए आई थी जिसे स्कूल के दिनों में खूब चलाया फिर लूना चलाने लगे। उस सायकिल को पिताजी हवा भरवा कर अपडेट रखते और कभी कभार चला लेते) उसके जाने पर हम लोग मुस्कुरा लेते कि ये सुख तो मर्सिडीज़ को नहीं मिलता जो पिताजी की सायकल पाती है। ये सिलसिला पिताजी के रहते चलता रहा। गर्मियों में वो दो महीने अपने गाँव जाता तभी व्यवधान आता। एक साल (सन् 2003 में) जब वो गाँव से लौटा और सुबह ही मिलने आया, वो दिन पिताजी की अंतिम यात्रा का था। उसका आना और सब कार्य में शामिल होना किसी संयोग से कम ना था। पिताजी के बाद कुछेक बच्चे उन्हें खोजते हुए बीच बीच में आए कि दादाजी फीस जमा करते थे। कालीबाड़ी के पंडित “महालया“ से पहले आए उन्हें पूछते हुए कि कुछ श्लोक को लेकर उनकी चर्चा अधूरी थी।
ये वो बातें थी जिन्हें हम लोग भी उनके बाद ही जान पाए।
जब कभी ऐसी कोई बात जो हमारे भीतर स्पंदित होती हैं अनजाने ही वो परिभाषित कर दी जाए, उसे शोध या तथ्यात्मक रूप से साबित किया जाए तो हमारा बल और बढ़ जाता है। हमारा विश्वास जीत जाता है। हाल ही में (5 feb 2026) दैनिक समाचार पत्र में खबर छपी कि “The Newyork Times“ के हेल्थ साइकॉलजी जर्नल में प्रकाशित स्टडी के अनुसार माँ के आँचल से ज्यादा प्रभावी पिता का स्पर्श है जो बच्चे को जिंदगी भर बीमारियों से लड़ने की ताकत देता है। बच्चों के दिल और मेटाबॉलिक स्वास्थ पर असर डालता है।

।मेरा अनुभव भी यही कहता है बल्कि मुझे तो ये भी लगता है जो पिता बच्चों के मन को स्पर्श कर पाते हैं, भीतर तक छू जाते हैं वो बच्चे बीमारियों से ही नहीं वरन जीवन की हर जंग को पूरी ताकत से लड़ पाते हैं और स्वयं को साबित कर पाते हैं एक बेहतर इंसान के रूप में। ये अनुभव भी लगभग तेईस वर्ष का हो चला है अब। 15 मई 2003 में हम उनके साथ से वंचित हुए लेकिन पास वो आज भी हैं। ठीक उसी तरह जैसे कहीं से भी लौटने पर दरवाज़े पर इंतज़ार करते मिलते थे। हर एक परीक्षा का पर्चा (प्रश्नपत्र) देख कर, एक-एक प्रश्न पूछ कर आखिरी सवाल करते थे “कितने नंबर आ जाएंगे भैया“
अब पूर्णांक मिलने पर भी पूछने-बताने की सिलसिले कहीं पीछे रह गए। बस याद है, एहसास है और हैं ऐसी तमाम स्मृतियाँ जो एक शब्द में समाहित हो जाती हैं “पिता“

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अमिता त्रिवेदी
पता C 8, आकाशवाणी कॉलोनी,
श्यामला हिल्स, भोपाल
पिन 462002
मो 6267584225
शिक्षा B Sc, MA अंग्रेजी साहित्य, भारतीय इतिहास, B Ed, MEd

वर्तमान में आकाशवाणी भोपाल में वरिष्ठ उद्घोषक के पद पर कार्यरत। वर्ष 1997 से केंद्र की शासकीय सेवा, आकाशवाणी में पदस्त।
रेडियो प्रसारण और प्रस्तुतीकरण मुख्य कार्य
रेडियो की लगभग सभी विधाओं में सक्रिय लेखन।
इंटरव्यूज़, फोनिन प्रोग्राम, विज्ञान और बच्चों के कार्यक्रमों में विशेष रुचि।
वर्ष 2025 में एक कहानी संग्रह “थैंक यू यारा “ का प्रकाशन
कहानी संग्रह को माँ शिवरानी स्मृति शिक्षा संस्थान का “निराला सम्मान“ प्राप्त
वर्तमान में संस्मरणों से जुड़ी एक पुस्तक का संपादन
पठन पाठन, शास्त्रीय नृत्य, फोटोग्राफी और बागबानी में गहरी रुचि।
शास्त्रीय नृत्य ’कथक’ में डिग्री
वर्ष 2021 से ब्लॉग लेखन में संलग्न।
60. In Memory of My Father-बाबा की असामयिक मृत्यु से “जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स” से आर्टिस्ट बनने का मेरा सपना टूट गया -डॉ. सुनीता फड़नीस

52 .In Memory of My Father-shri Harilal Das: पिता की बातों में एक अटलता, विश्वास से भरी, जीवन के प्रति ललक हमेशा देखी -रीता दास राम