शहडोल और मुरैना में वन अमले पर जानलेवा हमले,MP में जंगलों के पहरेदार खतरे में, कहीं पिटाई तो कहीं ट्रेक्टर से कुचलकर हत्या

हर साल वनकर्मियों के साथ मारपीट के 20-30 मामले,।मुरैना में रेत माफिया से निपटने के लिए SAF बटालियन की मांग 

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शहडोल और मुरैना में वन अमले पर जानलेवा हमले,MP में जंगलों के पहरेदार खतरे में, कहीं पिटाई तो कहीं ट्रेक्टर से कुचलकर हत्या

गणेश पांडे की विशेष रिपोर्ट

भोपाल। मप्र में माफियाओं के हौसले बुलंद हैं, जिससे जंगलों के पहरेदार लगातार हमले का शिकार हो रहे हैं। रेत और लकड़ी माफिया द्वारा वन विभाग की टीम को बंधक बनाकर पीटने, वाहन से कुचलने और ड्यूटी के दौरान वनकर्मियों के ही अवैध कटाई में लिप्त होने की घटनाएं सामने आ रही हैं। शहडोल और मुरैना जैसे जिलों में वन अमले पर जानलेवा हमले की घटनाएं प्रशासन के लिए चुनौती बनी हुई हैं।

एपीसीसीएफ अमित दुबे का कहना है कि मुरैना में माफिया से निपटने के लिए विशेष सशस्त्र बल की मांग को लेकर डीजीपी को दो पत्र लिखे किन्तु वहां से न बल मिला और न ही पत्र का जवाब आया। बुधवार को वन रक्षक हरकेश गुर्जर की हत्या ने फ्रंटलाइन वन स्टॉफ की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

गत बुधवार की सुबह 5.30 बजे ट्रेक्टर से कुचलकर की गई हत्या से भयभीत और असुरक्षित है। इस बीच संरक्षण शाखा के प्रमुख एपीसीसीएफ अमित दुबे मुरैना के लिए रवाना हो गए हैं। मुरैना रवाना होने से पहले छोटी सी मुलाक़ात में बताया कि रेत माफिया से निपटने के लिए एसएएफ की तीन बटालियन उपलब्ध कराने के लिये वन बल प्रमुख के माध्यम से डीजीपी को पत्र लिखे गए हैं किन्तु कोई बल नहीं मिला। डंडे के दम पर वन अमला माफिया से कैसे मुकाबला कर सकता है। यही नहीं, डीएफओ मुरैना द्वारा एसएएफ बटालियन उपलब्ध कराने के लिये वन मुख्यालय को एक से अधिक पत्र लिखें हैं। वन विभाग के अधिकारी और मैदानी अमला यही कह रहा है कि यदि समय रहते मुरैना वन मंडल को एसएएफ बटालियन की तीन टुकड़ियां उपलब्ध करा दी जाती तो शायद वन रक्षक हरकेश गुर्जर की जान बचायी जा सकती थी।

*हर साल वनकर्मियों के साथ मारपीट के 20-30 मामले*

संरक्षण शाखा से एकत्रित आकड़ों के मुताबिक वन एवं वन्य प्राणियों की सुरक्षा में हर साल वनकर्मियों के साथ मारपीट के 20-30 प्रकरण दर्ज हो रहे है। पिछले तीन सालों में जंगलों की सुरक्षा में आधा दर्जन वनकर्मियों को अपनी जान तक गंवाने पड़े है। शहडोल में हमला: लकड़ी माफियाओं ने वन विभाग की टीम को बंधक बनाकर पीटा, जिसमें रेंजर और डिप्टी रेंजर गंभीर रूप से घायल हो गए। यही नहीं, मुरैना, भिंड, ग्वालियर, शहडोल, विदिशा, रायसेन, गुना, शिवपुरी, नरसिंहपुर, बालाघाट, बैतूल, छिंदवाड़ा, सागर, दमोह, बुरहानपुर, वन मंडलों में 2 दर्जन से अधिक वन कर्मचारियों पर वन और खनिज माफिया प्राणघातक हमला कर चुके हैं। *नर्मदापुरम में मिलीभगत:* नर्मदापुरम जिले की बानापुरा वन रेंज में वनरक्षक और चौकीदार ही सागौन की अवैध कटाई में शामिल पाए गए, जहां 112 ठूट मिले।

*किस सर्किल में कौन माफिया सक्रिय*

– ग्वालियर सर्किल में मुरैना-भिंड और शहडोल सर्किल में रेत माफिया

– शिवपुरी-खनिज माफिया और अतिक्रमण माफिया

– बालाघाट- टिम्बर माफिया

बैतूल- अतिक्रमण और टिम्बर माफिया

भोपाल- अतिक्रमण, खनिज और टिम्बर माफिया

छतरपुर- टिम्बर और खनिज माफिया

छिंदवाड़ा- वन माफिया

ग्वालियर- फर्शी-पटिया और खनिज माफिया

होशंगाबाद- टिम्बर माफिया और शिकारी

इंदौर- टिम्बर और अतिक्रमण माफिया

जबलपुर- टिम्बर माफिया

खंडवा- खनिज और अतिक्रमण माफिया

रीवा- खनिज माफिया

सागर- टिम्बर और खनिज माफिया।

*जस्टिस चौहान आयोग की सिफारिशें पर खा रही है धूल*

पर्यावरण क्षेत्र में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अजय दुबे ने लटेरी गोलीकांड के बाद गठित जस्टिस चौहान न्यायिक जांच आयोग की सिफारिशें पर अनुशंसाएं शासन को सौंपी थीं, लेकिन ये अनुशंसाएं आज भी मंत्रालय में धूल खा रही हैं। जस्टिस चौहान आयोग और तत्कालीन पीसीसीएफ हॉफ के सुझावों और वन बल को हथियार उपलब्ध कराने संबंधी अनुशंसाओं पर समय रहते निर्णय लिया होता, तो शायद शहीद हरिकेश गुर्जर की जान बचाई जा सकती थी। आयोग ने पुलिस की तरह फारेस्ट को भी बल घोषित किया जाए और उन्हें हथियार चलाने का अधिकार देने के साथ-साथ महाराष्ट्र, ओडिशा और असम की तर्ज पर मध्य प्रदेश में भी वनकर्मियों के लिए ‘मजिस्ट्रेट जाँच’ की अनिवार्यता लागू की जानी चाहिए। दुबे ने मांग की है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत वनकर्मियों को तत्काल आवश्यक कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए।