
The Late Sardar Gurnam Singh Dang : शिक्षा-जगत के देदीप्यमान नक्षत्र थे सरदार गुरनाम सिंह डंग
मौत हैं उसकी जिसका जमाना करें अफसोस, यूं तो सभी आए हैं मरने के वास्ते!
एक नेक, विशाल हृदय, सबका सहयोग करने वाला, मृदुभाषी और सेवा-भाव से ओतप्रोत व्यक्तित्व जब इस संसार से विदा लेता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं जाता, बल्कि संवेदनाओं, प्रेरणाओं और मानवीय मूल्यों की एक प्रज्वलित दीपशिखा छोड़ जाता है जो आने वाली पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करती हैं। सरदार गुरनाम सिंह डंग का वाहे गुरु के चरणों में विलीन हो जाना रतलाम ही नहीं, समूचे मालवा अंचल के लिए ऐसी ही अपूरणीय क्षति है। गुरु तेग बहादुर शैक्षणिक विकास समिति के अध्यक्ष के रूप में 14 वर्षों से अधिक समय तक उन्होंने जिस समर्पण, अनुशासन और दूरदर्शिता के साथ कार्य किया, वह शिक्षा-जगत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित रहेगा। आधुनिक तकनीक, नैतिक मूल्यों और ज्ञान के समन्वय से उन्होंने जिस आदर्श संस्थान को आकार दिया। वह उनकी कर्मनिष्ठा और शिक्षा के प्रति अटूट आस्था का जीवंत प्रमाण है। उनके लिए शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं थी, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम थी- एक ऐसी साधना, जिसमें वे स्वयं भी निरंतर तपते रहें।
8 अप्रैल, बुधवार को जब उनकी अंतिम यात्रा शहर की सड़कों से गुजर रही थी, तब उमड़ा जनसैलाब केवल संख्या का परिचायक नहीं था, बल्कि उस प्रेम, सम्मान और आत्मीयता का दर्पण था, जिसे उन्होंने जीवन भर अर्जित किया। समाज के प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति इस यात्रा में शामिल था। और उससे भी अधिक मार्मिक दृश्य वह था, जब घरों के झरोखों से झांकते मासूम बच्चे उन्हें विदा होते देख अश्रुपूरित आंखों से सुबक रहें थे। वह दृश्य बताता था कि उन्होंने केवल संस्थान नहीं बनाया, बल्कि पीढ़ियों के हृदयों में अपना स्थान निर्मित किया। सरदार गुरनाम सिंह डंग का व्यक्तित्व विनम्रता का पर्याय था। सहयोग के लिए सदैव तत्पर रहना, कभी आत्ममुग्ध न होना और प्रचार-प्रसार से दूर रहना उनकी विशिष्ट पहचान थी। बहुप्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी गुरनाम सिंह जी को सेवा की प्रेरणा अपने पूज्य पिताश्री सरदार राजेंद्र सिंह जी डंग से मिली, जो समूचे मालवा में प्रतिष्ठित समाजसेवी के रूप में जाने जाते थे। बचपन से ही उन्हें संस्कारों से भरे परिवार का सान्निध्य मिला, जिसने उनके जीवन को सेवा की दिशा दी। श्री डंग को तत्कालीन अध्यक्ष सरदार हरदयाल सिंह, सचिव सरदार महेंद्र पाल सिंह अजीमल, कोषाध्यक्ष सरदार दर्शन सिंह गुरुदत्ता का पूरा सानिध्य मिला वहीं वर्तमान समिति के देवेंद्र सिंह वाधवा, हरजीत चावला, हरजीत सलूजा, सुरेंद्र सिंह भामरा, अजीत छाबड़ा, कुलवंत सग्गू सहित समिति का निरंतर सहयोग मिला तो गुरु सिंघ सभा का हमेशा सानिध्य रहा। उनके मित्र जोस चाको बताते हैं कि विद्यार्थी जीवन में वे हॉकी टीम के गोलकीपर हुआ करते थे।

भारी शरीर होने के बावजूद उनकी फुर्ती और सजगता देखने योग्य होती थी। यही सजगता बाद में उनके प्रशासनिक कौशल में भी दिखाई दी। उन्होंने शिक्षा संस्थान के माध्यम से न केवल विद्यार्थियों को शिक्षित किया, बल्कि प्रतिभाओं को पहचानकर उन्हें प्रोत्साहित करने का भी बीड़ा उठाया।किसी भी क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले बच्चों को सम्मानित करना उनके स्वभाव का अभिन्न हिस्सा था। वे कहा करते थे- “यह पूरा मेरा परिवार है।” जब भी कोई उनके समर्पण, संगठन क्षमता या योगदान की प्रशंसा करता, तो वे विनम्रतापूर्वक दोनों हाथ जोड़कर कहते-“ये वाहे गुरु की कृपा है। वह जो सेवा देता है, उसे अपने सामर्थ्य के अनुसार पूरी करने का प्रयास करता हूं; इसमें मेरा कोई योगदान नहीं।” उनकी यही विनम्रता उन्हें सर्वप्रिय बनाती हैं। ऐसे विलक्षण प्रतिभा के धनी, सेवा-भाव से ओतप्रोत और शिक्षा-जगत के उज्ज्वल नक्षत्र का अचानक हमारे बीच से चले जाना न केवल रतलाम, बल्कि समूचे मालवा अंचल के लिए अपूरणीय क्षति है। उनका जीवन हम सबके लिए प्रेरणा है- सेवा, समर्पण और विनम्रता का संदेश देता हुआ। वाहे गुरु से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने चरणों में स्थान प्रदान करें और उनके परिजनों तथा असंख्य शुभचिंतकों को इस दुख को सहने की शक्ति दें। उनकी स्मृतियां सदैव हमारे हृदयों में दीप की तरह प्रज्वलित रहेगी!
कैलाश व्यास, वरिष्ठ साहित्यकार.





