
150 साल बाद लौटी ‘जंगली शान’, काजीरंगा टाइगर रिजर्व से लाए गए भैंसों से जंगल होगा गुलजार
गणेश पांडे की विशेष रिपोर्ट
भोपाल। कान्हा टाइगर रिजर्व में विलुप्त हो चुकी जंगली भैंसा प्रजाति को पुन: बसाने की दिशा में बड़ी सफलता मिली है। पुनस्थापना कार्यक्रम के दूसरे चरण में सुपखार क्षेत्र में चार और जंगली भैंसों को विशेष बाड़े में सुरक्षित रूप से मुक्त किया गया।
बताया गया है कि 150 वर्ष बाद कान्हा में ‘जंगली शान’ की वापसी से न केवल जंगल गुलजार होगा बल्कि जंगलों में भैसों की धमक गूंजेगी और जैव विविधता का दायरा भी बढ़ेगा।
शनिवार को सुपखार परिक्षेत्र में आयोजित कार्यक्रम के दौरान चार जंगली भैंसों के दल को बाड़े में छोड़ा गया। इस मौके पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) डॉ समिता राजौरा और अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक एल. कृष्णमूर्ति सहित वन विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
यह अभियान मध्यप्रदेश में करीब 150 वर्ष पूर्व विलुप्त हो चुकी जंगली भैंसा प्रजाति को पुन: स्थापित करने के लिए चलाया जा रहा है।
*काजीरंगा टाइगर रिजर्व से लाए गए हैं भैंसे*
इस परियोजना के तहत असम के काजीरंगा टाइगर रिजर्व से जंगली भैंसों को लाकर कान्हा के सुपखार क्षेत्र में बसाया जा रहा है, जहां पहले इनके अस्तित्व के प्रमाण मिल चुके हैं। परियोजना के पहले चरण में 28 अप्रैल को चार जंगली भैंसों को बाड़े में छोड़ा गया था। अब दूसरे चरण में चार और भैंसों के शामिल होने से कुल संख्या 8 हो गई है, जिनमें 2 नर और 6 मादा शामिल हैं। वन विभाग ने अगले तीन वर्षों में 50 जंगली भैंसों को पुन: स्थापित करने का लक्ष्य रखा है।
*72 घंटे में 2220 किमी का तय किया सफर*
करीब 2220 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर इन भैंसों को विशेष वन्यजीव वाहनों से सडक़ मार्ग द्वारा कान्हा लाया गया। लगभग 72 घंटे की इस यात्रा के दौरान विशेषज्ञ चिकित्सकों की टीम लगातार उनकी निगरानी करती रही। यह पुन: स्थापना अभियान न केवल मध्यप्रदेश में जैव विविधता संरक्षण की दिशा में अहम कदम है, बल्कि विलुप्तप्राय प्रजातियों के पुनर्वास के लिए एक ऐतिहासिक पहल भी माना जा रहा है।





