राजनीति से नैतिकता-राष्ट्रीय सरोकार ग़ायब 

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राजनीति से नैतिकता-राष्ट्रीय सरोकार ग़ायब 

दिनेेश मालवीय की विशेष रिपोर्ट 

मुझे कल से ही प्रधानमंत्री के आह्वान पर ऐसे अनेक पढ़े-लिखे और बहुत जिम्मेदार लोगों की टिप्पणियां पढ़कर बहुत अफसोस हो रहा है,जिनसे आम लोगों को सही मार्गदर्शन देने की अपेक्षा की जाती है। यह तो नहीं कह सकता कि ये लोग बात को समझ नहीं रहे हैं,लेकिन इतना अवश्य कहूंगा कि वे पूर्वाग्रह से बुरी तरह ग्रस्त हैं।

दुनियाभर में जो स्थितियां बनी हैं, उनसे देश के लिए संभावित खतरों से बचाना किसी भी प्रधानमंत्री का कर्तव्य है। सरकार के स्तर पर जो किया जाना है वह तो किया ही जाएगा,लेकिन संकट की गंभीरता को देखते हुए अकेले सरकारी प्रयास काफी नहीं हैं।

लोगों से उपलब्ध संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए ही तो कहा गया है। यह कहना कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश डूब रहा है। कुछ लोगों का यह सपना या अरमान हो सकता है,लेकिन ऐसा होगा नहीं।

इससे पहले जब भी देश की अर्थव्यवस्था पर संकट आया तब तत्कालीन प्रधानमंत्रियों ने देशवासियों से संसाधनों के संयमित उपयोग का आह्वान किया। लालबहादुर शास्त्रीजी ने गेहूं के संकट के समय देशवासियों से सोमवार को एक समय भोजन न करने का आह्वान किया। इंदिराजी ने 1967 में विदेश विनिमय भंडार की नाजुक स्थिति को देखते हुए लोगों से सोना नहीं खरीदने का आह्वान किया। कभी ऐसा भी हुआ है कि सरकार ने लोगों से शादी में पच्चीस से ज्यादा लोगों को न बुलाने को कहा।

कोई भी संकट हमेशा नहीं रहता। लेकिन सरकार और देशवासी एकजुटता से प्रयास करें तो इससे निपटना आसान होता है।

यही स्थिति आज बनी है। दुर्भाग्यवश अनेक लोग दलगत राजनीति को राष्ट्रीय हित से ऊपर रखकर ऊलजलूल बातें कर रहे हैं, जो उनकी संकीर्ण सोच का ही परिचायक है। इससे नैतिकता और राष्ट्रीय हित के प्रति दुर्लक्ष्य भी स्पष्ट होता है।

बहरहाल, इन लोगों की इस बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं कि देशवासियों से जो करने को कहा जा रहा है वह सरकार के स्तर पर भी न केवल होना चाहिए बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए।

“सियासत कीजिए जमकर,सियासत भी ज़रूरी है

जहां लाजिम हो करना तो बग़ावत भी ज़रूरी है

अदावत हो अगर लाजिम अदावत भी ज़रूरी है

मगर इक बात सबको हर क़दम पर याद रखना है

सियासत और अदावत में शराफ़त भी ज़रूरी है।”