इंदौर लेखिका संघ की चित्र आधारित लेखन कार्यशाला की कुछ रचनाएं

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इंदौर लेखिका संघ की चित्र आधारित लेखन कार्यशाला की कुछ रचनाएं 

अभ्यास प्रक्रिया की दृष्टी से इंदौर लेखिका संघ अपनी कार्यशालाओं के माध्यम से लेखन की प्रक्रिया  को विभीन्न गतिविधियों के द्वारा संचालित करते हुए महिलाओं में पठन पाठन और लेखन की रूचि जाग्रत करने के लिए प्रयासरत है .आज चित्र आधारित लेखन कार्यशाला के माध्यम से डॉ. रूचि  बागड़ देव एवं डॉ.स्वाति तिवारी ने  मात्रा -वर्तनी प्रशिक्षण दिया और डॉ. निशी मंजवानी ने  चित्र आधारित लेखन  कार्केयशाला संचालित की  ,बड़ी संख्या में सदस्यों ने  रचनाये तैयार की गई .कुछ रचनाये यहाँ प्रस्तुत हैं –

  1. उत्थान पर क़ुर्बान

कई सालों से खड़ा था सिर तानकर,
अपने आपको सबका रखवाला मानकर।
पीढ़ियाँ बीत गईं सबको छाया देता था,
हज़ारों पंछियों के अंडे प्यार से सेता था।

नव कुमारियों की खिलखिलाहट सुनी थी,
उनके लिए फूलों की पंखुड़ियों चुनी थी।
वो इठलाते बादलों के साथ महका था ।
वो शीतल बयारों के साथ महकता था ।

आज यहाँ वहाँ तितर-बितर टूटा सा,
अस्थि पिंजर सा बिखरा हुआ पड़ा था।
वृक्ष को यूँ इस तरह देखा तो साँस थम गई,
क्या कहे ? हाय आँखें नम सी हो गई ।
कहने वालो ने कहा नगर का उत्थान हो गया,
अरे रूको देखो कौन क़ुर्बान हो गया ?

 माधुरी निगम मधुबन इंदौर

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2.  ए सखी साजन?

विधा- मुकरिया(प्रयास)

उसके आने से सांस आती,
खुद को मैं सुरक्षित पाती।
तपन बढ़े जो वो न समक्ष,
ए सखी साजन?! ना सखी वृक्ष!

मुझमें समाए,मैं हूं उससे,
अस्तित्व मेरा है उसी से।
भूली उसे होकर खुदगर्ज,
ए सखी साजन?! ना सखी रज!

उसकी आहट राहत देती,
छुअन मुझे शीतलता देती।
उसका साथ पा रहूं जवां,
ए सखी साजन?! ना सखी हवा!

जहां देखूं बस वो ही दिखे,
अपना साया मुझपर रखे।
साथ ना छोड़े जाऊं जहां,
ए सखी साजन?! ना सखी आसमां!

डॉ निशी मंजवानी

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3.कैसा यह विकास हमारा

पर्यावरण और विकास
कटते वन, दम तोड़ती नदियाँ,
कैसा यह विकास हमारा।
धरती रोई, मानव हँसता,
भूल गया वह मूल सहारा।

कंक्रीटों के जंगल उगते,
सूख रही उपवन की छाया।
सुविधाओं के मोह में मानव,
भूल गया प्रकृति की माया।

ईंटों के ऊँचे महलों ने,
हरियाली का हृदय है कुचला।
प्रकृति रूठी तो समझ आएगा,
कितना महँगा सौदा यह निकला।

धुआँ निगलता नीला अम्बर,
नदियों का जल हुआ विषैला।
लोभ बढ़ा इतना मानव में,
काट दिया जीवन का मेला।

पेड़ों की हर कटती शाखा,
आने वाले कल को काटे।
प्रकृति का अत्यधिक दोहन
सभ्यता को विनाश ही बांटे।

विकास अगर विनाश बने तो,
प्रगति नहीं वह अभिशाप है।
धरती माँ की पीड़ा सुनना,
मानवता का प्रथम जाप है।

छोटा-सा अंकुर भी देखो,
जीवन का संदेश सुनाता।
प्रकृति संग चलने वाला ही,
सच्चा सुख और शांति पाता।

आओ ऐसा मार्ग चुनें हम,
जहाँ प्रकृति हर पल मुस्काए।
विकास वही सच्चा कहलाता।
जो धरती का मान बढ़ाए।

डॉ. प्रतीक्षा शर्मा
इंदौर (मध्यप्रदेश)

Shoot (botany) - Wikipedia

4. कोपल

अहा,
यह कैसा तना, तन खड़ा
रंगबिरंगी काठ
भीतर है गड्ढे दिखते
कई सौ सौ गांठ।

रहते जिनमें जीव अनगिनत
चींटी से आते जाते
करे खोखला इस दरख़्त को
भीतर तक खा जाते।

रात में जगमग
बिजली के जुगनू
टिमटिम करते सारे
मंडराए जिन पर पतंगे
फिर गिर कर मरते सारे

नहीं कोई
लता नाजुक सी
अल्हड़ मतवाली डाली
पत्ते तो सब नोट बन गए
वायु बहती काली।

हाय रे
यह तो दानव वन है
कंक्रीट का जंगल
भयभीत हो इसे निहारे
प्यारी नन्ही कोपल।

प्राची शर्मा पांडे

plant 100 times more saplings than number of trees cut in ridge area dda accept supreme court proposal रिज एरिया में काटे गए पेड़ों की जगह लगाएं सौ गुना पेड़, SC का

5. जंगल काट के शहर बसाएं

रोटी, कपड़ा, घर चाहिए, भूखे पेट न सोए कोई,
बिजली, सड़क, अस्पताल बने, तरक्की की बात न खोए कोई।
पेड़ कटे तो फिर उगेंगे, यही सोचकर मन बहलाएं,
पहले भूख मिटाना ज़रूरी, फिर हरियाली गीत सुनाएं।

कहते हैं कुछ दिन की बात, जंगल काट के शहर बसाएं,
फिर हरियाली लौटा देंगे, आज ज़रा हम साँस घटाएं।
पर ये समझौता कब तक का, ठूँठ गवाही दे न सके,
एक बार जो सोना खोया, फिर वो सपना ले न सके।

महल खड़ा कर के क्या पाया, जब जड़ ही कटती जाए,
ठूँठ पे बैठी तरक्की तेरी, किसको ऑक्सीजन दे पाए?
ये सौदा है मौत का साथी, कल को हम भी सूख ही जाएंगे,
पत्ता आखिरी चिल्लाता है, अब भी संभलो, मर जाएंगे।

धरती माँ की कोख उजाड़े, ऐसा विकास न स्वीकार,
जिसकी कीमत साँसें चुकाएं, उस पर थूकें सौ बार।
ठूँठ नहीं ये लाश पड़ी है, जीवन की हत्या साफ दिखे,
एक पत्ते की चीख सुनो अब, ये महल हमें नहीं लिखे।

सुषमा शुक्ला इंदौर