आओ आज आधुनिक तुर्की के निर्माता “मुस्तफ़ा कमाल पाशा” की बात करते हैं…

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आओ आज आधुनिक तुर्की के निर्माता “मुस्तफ़ा कमाल पाशा” की बात करते हैं…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

विश्व के आधुनिक इतिहास में एक राजनेता सूरज बनकर चमकता नजर आता है। वह है तुर्की का कमाल पाशा।कमाल अतातुर्क उर्फ “मुस्तफ़ा कमाल पाशा” (जन्म- 19 मई, 1881; मृत्यु- 10 नवम्बर, 1938 ई.) को ‘आधुनिक तुर्की का निर्माता’ कहा गया है।साम्राज्यवादी शासक सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय का तुर्की में पासा पलट कर वहाँ कमाल की सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था कायम करने का जो क्रान्तिकारी कार्य कमाल अतातुर्क ने किया, उस ऐतिहासिक कार्य ने उनके नाम को सार्थक सिद्ध कर दिया था। कमाल अतातुर्क ने तुर्की सेना को अत्यंत आधुनिक ढंग से संगठित किया। उनके विशेष प्रयासों से ही तुर्क जाति आधुनिक जाति बनी। और पूरी दुनिया में अगर एक मुस्लिम देश को आधुनिक बनाने का साहस अगर किसी ने किया तो वह मुस्तफा कमाल पाशा ही कर पाया।

आज हम मुस्तफा कमाल पाशा की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि 19 मई पाशा का जन्मदिन है। मुस्तफ़ा कमाल पाशा का जन्म 19 मई, 1881 ई. में सलोनिका में एक किसान परिवार में हुआ था। सुल्तान की तानाशाही और विदेशियों के षड्यंत्रों को मिटाकर तुर्की को आधुनिक बनाने का जो संघर्ष कमाल पाशा ने किया, उसे अतुलनीय माना जा सकता है। कमाल अतातुर्क ने एक युद्ध में कुस्तुंतुनिया पर अधिकार करने की ब्रिटिश चाल को व्यर्थ कर दिया और उसके बाद उनकी जीत पर जीत होती चली गई। फिर भी महायुद्ध में तुर्की हार गया। कमाल दिन रात परिश्रम करके विदेशियों के विरुद्ध आंदोलन करते रहे। 1920 ई. में ‘स्व्रो की संधि’ की घोषणा हुई, पर इसकी शर्तें इतनी खराब थीं कि कमाल ने फौरन ही एक सेना तैयार कर कुस्तुंतुनिया पर आक्रमण की तैयारी की। इसी बीच ग्रीस ने तुर्की पर हमला कर दिया और स्मरना में सेना उतार दी जो कमाल अतातुर्क के प्रधान केंद्र अंगारा की तरफ़ बढ़ने लगी। अब कमाल अतातुर्क के लिए बड़ी समस्या पैदा हो गई, क्योंकि इस युद्ध में यदि वे हार जाते तो आगे कोई संभावना न रहती। उन्होंने बड़ी तैयारी के साथ युद्ध किया और धीरे-धीरे ग्रीक सेना को पीछे हटना पड़ा। इस बीच फ़्राँस और रूस ने भी कमाल अतातुर्क को गुप्त रूप से सहायता देना शुरू किया। थोड़े दिनों में ही ग्रीक निकाल बाहर किए गए। ग्रीकों को भगाने के बाद ही अंग्रेज़ों के हाथ से बाकी हिस्से निकालने का प्रश्न था। देश कमाल अतातुर्क के साथ था, इसके अतिरिक्त ब्रिटेन अब लड़ने के लिए तैयार नहीं था। इस कारण यह समस्या भी सुलझ गई। कमाल ने देश को प्रजातंत्र घोषित किया और स्वयं प्रथम राष्ट्रपति बने।

अब राज्य लगभग निष्कंटक हो चुका था, पर मुल्लाओं की ओर से उनका विरोध हो रहा था। इस पर कमाल ने सरकारी अखबारों में इस्लाम के विरुद्ध प्रचार शुरू किया। अब तो धार्मिक नेताओं ने उनके विरुद्ध फ़तवे जारी कर दिए और यह कहा कि- “कमाल ने अंगारा में स्त्रियों को पर्दे से निकाला और और देश में आधुनिक नृत्य का प्रचार किया है, जिसमें पुरुष स्त्रियों से सटकर नाचते हैं। इसका अंत होना चहिए।” हर मस्जिद से यह आवाज उठाई गई। तब कमाल अतातुर्क ने 1924 ई. के मार्च में खिलाफत प्रथा का अंत करते हुए और तुर्की को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करते हुए एक विधेयक रखा। अधिकांश संसद सदस्यों ने इसका विरोध किया, पर कमाल ने उन्हें धमकाया। इस पर विधेयक पारित हो गया। लेकिन भीतर-भीतर मुल्लाओं के विद्रोह की आग सुलगती रही। कमाल अतातुर्क के कई भूतपूर्व साथी मुल्लाओं के साथ मिल गए। इन लोगों ने विदेशी पूँजीपतियों से धन भी लिया। कमाल अतातुर्क ने एक दिन इनके मुख्य नेताओं को गिरफ्तार पर फाँसी पर चढ़ा दिया। कमाल अतातुर्क ने देखा कि केवल फाँसी पर चढ़ाने से काम नहीं चलेगा, देश को आधुनिक रूप से शिक्षित करना है तथा पुराने रीति रिवाजों को ही नहीं, पहनावे आदि को भी समाप्त करना है। कमाल अतातुर्क ने हमला तुर्की टोपी पर किया। इस पर विद्रोह हुए, पर कमाल ने सेना भेज दी। इसके बाद इन्होंने इस्लामी क़ानूनों को हटाकर उनके स्थान पर एक नई संहिता स्थापित की, जिसमें स्विटज़रलैंड, जर्मनी और इटली की सब अच्छी बातें शामिल थीं। बहुविवाह ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही पतियों से यह कहा गया कि वे अपनी पत्नियों के साथ ढोरों की तरह-व्यवहार न करके बराबरी का बर्ताव रखें। प्रत्येक व्यक्ति को वोट का अधिकार दिया गया। सेवाओं में घूस लेना निषिद्ध कर दिया गया और घूसखोरों को बहुत कड़ी सजाएँ दी गईं। पर्दा उठा दिया गया और पुरुष पुराने ढंग के परिच्छेद छोड़कर सूट पहनने लगे। इससे भी बड़ा सुधार यह था कि अरबी लिपि को हटाकर रोमन लिपि की स्थापना की गई। कमाल अतातुर्क स्वयं सड़कों पर जाकर रोमन वर्णमाला पढ़ाते रहे। इसके साथ ही कमाल अतातुर्क ने तुर्की सेना को अत्यंत आधुनिक ढंग से संगठित किया। इस प्रकार तुर्क जाति उनके कारण आधुनिक जाति बनी। 1938 ई. के 10 नवम्बर में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की मृत्यु हुई तो आधुनिक तुर्की के निर्माता के रूप में उनका नाम संसार में चमक चुका था।

इस तरह 100 साल पहले अपने देश को रूढ़ियों और परंपराओं से मुक्त कर आधुनिक बनाने का जो काम कमाल पाशा ने किया, उसकी बदौलत ही तुर्की आज एक अलग पहचान रखता है।

आज कमाल पाशा तो भारत के सन्दर्भ में भी विशेष रूप से याद किया जा सकता है। भारत में भी स्थितियाँ लगातार बदल रही हैं और अब बात यूसीसी यानि समान नागरिक संहिता तक आ पहुँची है। ऐसे सुधारों के संदर्भ और राष्ट्रहित में सभी भारतवासियों को कमाल पाशा को एक बार अवश्य ही पढ़ना चाहिए। तब यूसीसी और वह सभी कानून तर्कसंगत नजर आने लगेंगे, जिनका विरोध फिलहाल अलग-अलग स्तर पर होता नजर आता है। और वास्तव में आधुनिक भारत का निर्माण तभी होगा जब पूरा देश एक ही नियम कानून से बंधकर राष्ट्रहित में सर्वस्व समर्पण करने को तैयार रहेगा…।

 

 

आओ आज आधुनिक तुर्की के निर्माता “मुस्तफ़ा कमाल पाशा” की बात करते हैं…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

विश्व के आधुनिक इतिहास में एक राजनेता सूरज बनकर चमकता नजर आता है। वह है तुर्की का कमाल पाशा।कमाल अतातुर्क उर्फ “मुस्तफ़ा कमाल पाशा” (जन्म- 19 मई, 1881; मृत्यु- 10 नवम्बर, 1938 ई.) को ‘आधुनिक तुर्की का निर्माता’ कहा गया है।साम्राज्यवादी शासक सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय का तुर्की में पासा पलट कर वहाँ कमाल की सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था कायम करने का जो क्रान्तिकारी कार्य कमाल अतातुर्क ने किया, उस ऐतिहासिक कार्य ने उनके नाम को सार्थक सिद्ध कर दिया था। कमाल अतातुर्क ने तुर्की सेना को अत्यंत आधुनिक ढंग से संगठित किया। उनके विशेष प्रयासों से ही तुर्क जाति आधुनिक जाति बनी। और पूरी दुनिया में अगर एक मुस्लिम देश को आधुनिक बनाने का साहस अगर किसी ने किया तो वह मुस्तफा कमाल पाशा ही कर पाया।

आज हम मुस्तफा कमाल पाशा की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि 19 मई पाशा का जन्मदिन है। मुस्तफ़ा कमाल पाशा का जन्म 19 मई, 1881 ई. में सलोनिका में एक किसान परिवार में हुआ था। सुल्तान की तानाशाही और विदेशियों के षड्यंत्रों को मिटाकर तुर्की को आधुनिक बनाने का जो संघर्ष कमाल पाशा ने किया, उसे अतुलनीय माना जा सकता है। कमाल अतातुर्क ने एक युद्ध में कुस्तुंतुनिया पर अधिकार करने की ब्रिटिश चाल को व्यर्थ कर दिया और उसके बाद उनकी जीत पर जीत होती चली गई। फिर भी महायुद्ध में तुर्की हार गया। कमाल दिन रात परिश्रम करके विदेशियों के विरुद्ध आंदोलन करते रहे। 1920 ई. में ‘स्व्रो की संधि’ की घोषणा हुई, पर इसकी शर्तें इतनी खराब थीं कि कमाल ने फौरन ही एक सेना तैयार कर कुस्तुंतुनिया पर आक्रमण की तैयारी की। इसी बीच ग्रीस ने तुर्की पर हमला कर दिया और स्मरना में सेना उतार दी जो कमाल अतातुर्क के प्रधान केंद्र अंगारा की तरफ़ बढ़ने लगी। अब कमाल अतातुर्क के लिए बड़ी समस्या पैदा हो गई, क्योंकि इस युद्ध में यदि वे हार जाते तो आगे कोई संभावना न रहती। उन्होंने बड़ी तैयारी के साथ युद्ध किया और धीरे-धीरे ग्रीक सेना को पीछे हटना पड़ा। इस बीच फ़्राँस और रूस ने भी कमाल अतातुर्क को गुप्त रूप से सहायता देना शुरू किया। थोड़े दिनों में ही ग्रीक निकाल बाहर किए गए। ग्रीकों को भगाने के बाद ही अंग्रेज़ों के हाथ से बाकी हिस्से निकालने का प्रश्न था। देश कमाल अतातुर्क के साथ था, इसके अतिरिक्त ब्रिटेन अब लड़ने के लिए तैयार नहीं था। इस कारण यह समस्या भी सुलझ गई। कमाल ने देश को प्रजातंत्र घोषित किया और स्वयं प्रथम राष्ट्रपति बने।

अब राज्य लगभग निष्कंटक हो चुका था, पर मुल्लाओं की ओर से उनका विरोध हो रहा था। इस पर कमाल ने सरकारी अखबारों में इस्लाम के विरुद्ध प्रचार शुरू किया। अब तो धार्मिक नेताओं ने उनके विरुद्ध फ़तवे जारी कर दिए और यह कहा कि- “कमाल ने अंगारा में स्त्रियों को पर्दे से निकाला और और देश में आधुनिक नृत्य का प्रचार किया है, जिसमें पुरुष स्त्रियों से सटकर नाचते हैं। इसका अंत होना चहिए।” हर मस्जिद से यह आवाज उठाई गई। तब कमाल अतातुर्क ने 1924 ई. के मार्च में खिलाफत प्रथा का अंत करते हुए और तुर्की को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करते हुए एक विधेयक रखा। अधिकांश संसद सदस्यों ने इसका विरोध किया, पर कमाल ने उन्हें धमकाया। इस पर विधेयक पारित हो गया। लेकिन भीतर-भीतर मुल्लाओं के विद्रोह की आग सुलगती रही। कमाल अतातुर्क के कई भूतपूर्व साथी मुल्लाओं के साथ मिल गए। इन लोगों ने विदेशी पूँजीपतियों से धन भी लिया। कमाल अतातुर्क ने एक दिन इनके मुख्य नेताओं को गिरफ्तार पर फाँसी पर चढ़ा दिया। कमाल अतातुर्क ने देखा कि केवल फाँसी पर चढ़ाने से काम नहीं चलेगा, देश को आधुनिक रूप से शिक्षित करना है तथा पुराने रीति रिवाजों को ही नहीं, पहनावे आदि को भी समाप्त करना है। कमाल अतातुर्क ने हमला तुर्की टोपी पर किया। इस पर विद्रोह हुए, पर कमाल ने सेना भेज दी। इसके बाद इन्होंने इस्लामी क़ानूनों को हटाकर उनके स्थान पर एक नई संहिता स्थापित की, जिसमें स्विटज़रलैंड, जर्मनी और इटली की सब अच्छी बातें शामिल थीं। बहुविवाह ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही पतियों से यह कहा गया कि वे अपनी पत्नियों के साथ ढोरों की तरह-व्यवहार न करके बराबरी का बर्ताव रखें। प्रत्येक व्यक्ति को वोट का अधिकार दिया गया। सेवाओं में घूस लेना निषिद्ध कर दिया गया और घूसखोरों को बहुत कड़ी सजाएँ दी गईं। पर्दा उठा दिया गया और पुरुष पुराने ढंग के परिच्छेद छोड़कर सूट पहनने लगे। इससे भी बड़ा सुधार यह था कि अरबी लिपि को हटाकर रोमन लिपि की स्थापना की गई। कमाल अतातुर्क स्वयं सड़कों पर जाकर रोमन वर्णमाला पढ़ाते रहे। इसके साथ ही कमाल अतातुर्क ने तुर्की सेना को अत्यंत आधुनिक ढंग से संगठित किया। इस प्रकार तुर्क जाति उनके कारण आधुनिक जाति बनी। 1938 ई. के 10 नवम्बर में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क की मृत्यु हुई तो आधुनिक तुर्की के निर्माता के रूप में उनका नाम संसार में चमक चुका था।

इस तरह 100 साल पहले अपने देश को रूढ़ियों और परंपराओं से मुक्त कर आधुनिक बनाने का जो काम कमाल पाशा ने किया, उसकी बदौलत ही तुर्की आज एक अलग पहचान रखता है।

आज कमाल पाशा तो भारत के सन्दर्भ में भी विशेष रूप से याद किया जा सकता है। भारत में भी स्थितियाँ लगातार बदल रही हैं और अब बात यूसीसी यानि समान नागरिक संहिता तक आ पहुँची है। ऐसे सुधारों के संदर्भ और राष्ट्रहित में सभी भारतवासियों को कमाल पाशा को एक बार अवश्य ही पढ़ना चाहिए। तब यूसीसी और वह सभी कानून तर्कसंगत नजर आने लगेंगे, जिनका विरोध फिलहाल अलग-अलग स्तर पर होता नजर आता है। और वास्तव में आधुनिक भारत का निर्माण तभी होगा जब पूरा देश एक ही नियम कानून से बंधकर राष्ट्रहित में सर्वस्व समर्पण करने को तैयार रहेगा…।

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीड।।या में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।