World Poha Day: विश्व पोहा दिवस पर इंदौर लेखिका संघ ने सुनाये पोहे पर किस्से- भाग -2

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World Poha Day: विश्व पोहा दिवस पर इंदौर लेखिका संघ ने सुनाये पोहे पर किस्से- भाग -2

1.इंदौर का पोहा : हर उम्र का अपना स्वाद,अपना मज़ा हैं- संध्या पाण्डेय

मध्यप्रदेश की पहचान बन चुका इंदौर का पोहा केवल एक व्यंजन नहीं, बल्कि एक संस्कृति है। हल्के मसालों, सेव, अनार और नींबू के साथ परोसा जाने वाला यह नाश्ता हर वर्ग और हर उम्र के लोगों के दिल में अपनी अलग जगह रखता है। यही कारण है कि एक ही पोहे की प्लेट सबको एक जैसी दिखती है, लेकिन उसका स्वाद और महत्व हर व्यक्ति के लिए अलग होता है।

बच्चों के लिए पोहा–
बच्चों के लिए पोहा स्वाद और मस्ती का मेल है। सेव की कुरकुराहट और अनार के दाने इसे उनके लिए खास बना देते हैं।

युवाओं के लिए पोहा–
युवाओं के लिए पोहा दोस्तों की महफिल और शहर की लाइफस्टाइल का हिस्सा है। चाय और जलेबी के साथ इसका आनंद अलग ही होता है।

अधेड़ों के लिए पोहा–
अधेड़ उम्र के लोगों के लिए पोहा स्वाद और स्वास्थ्य का संतुलन है। यह हल्का भी है और दिनभर की ऊर्जा भी देता है।

बुजुर्गों के लिए पोहा–
बुजुर्गों के लिए पोहा पुरानी यादों का स्वाद है। हर निवाला उन्हें बीते दिनों की सैर करा देता है।

गृहिणी के लिए पोहा–
गृहिणी के लिए पोहा सुबह की रसोई का सबसे भरोसेमंद साथी है। कम समय में पूरे परिवार को संतुष्ट करने वाला व्यंजन।

कामकाजी महिलाओं के लिए पोहा–
सुविधा और पोषण का संगम है। व्यस्त दिनचर्या में यह जल्दी बनने वाला और ऊर्जा देने वाला नाश्ता है।

इंदौर का पोहा इस बात का सुंदर उदाहरण है कि एक साधारण-सा व्यंजन भी लोगों के जीवन में अलग-अलग अर्थ रख सकता है। बच्चों की खुशी, युवाओं की दोस्ती, अधेड़ों का संतुलन, बुजुर्गों की स्मृतियाँ, गृहिणी की सहजता और कामकाजी महिलाओं की सुविधा—सबको जोड़ने वाला यह पोहा वास्तव में इंदौर की आत्मा और अपनत्व का स्वाद है।

 

2.’ इंदौरी पोहे की असली जादूगरी उसकी सजावट और मसालों में छिपी है’–डॉ. रश्मि जोशी

आज पोहा खाने के बाद सबसे पहले मैंने गूगल पर शोध किया कि आखिर पोहे का इतिहास कितना पुराना है। निश्चित तिथि तो नहीं मिली, लेकिन यह जानकर अच्छा लगा कि पोहे की उत्पत्ति प्राचीन भारत में धान (चावल) को भिगोकर, दबाकर और सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित रखने की पारंपरिक तकनीक से मानी जाती है।

एक बात मैं हमेशा कहती हूँ कि आहार का गहरा रिश्ता मन से होता है। जो स्वाद मन को भा जाए, उसका पाचन और पोषण का अवशोषण भी बेहतर होता है। शायद यही कारण है कि मैं इंदौरी पोहे को दिन की शुरुआत के लिए संतुलित पोषण में अग्रणी स्थान देती हूँ।

इंदौरी पोहे की असली जादूगरी उसकी सजावट और मसालों में छिपी है। करारी सेव, जीरावण, मूंगफली, प्याज, हरा धनिया, ताज़ा नारियल, अनार दाना, नींबू और हल्की-सी बूंदी,ये केवल स्वाद नहीं बढ़ाते, बल्कि पोषण भी जोड़ते हैं।इसलिए एक आहार विशेषज्ञ के तौर पर जब मैं पोहे की प्लेट को देखती हूं तो पाती हूं कि मूंगफली से प्रोटीन और स्वस्थ वसा, नारियल से पोषक तत्व तथा प्याज, धनिया और अनार से फाइबर प्राप्त होता है। इनका संतुलित समावेश और अंकुरित मूंग की उसल का साथ इस व्यंजन के ग्लाइसेमिक प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकता है। इसलिए नियंत्रित मात्रा में और पर्याप्त टॉपिंग्स के साथ पोहा डायबिटीज रोगियों के लिए भी एक बेहतर नाश्ते का विकल्प बन सकता है।

बच्चों के लिए मैं इसमें छोटे-छोटे प्रयोग करती रहती हूँ, लेकिन कोशिश रहती है कि इसका मूल स्वरूप बना रहे। आज मैंने हरे धनिये की जगह ताज़े पुदीने के पत्तों के साथ पोहा परोसा, जिससे रंगत और स्वाद दोनों निखर गए।
बिटिया ने पोहे से जुड़ा मेरा एक पुराना किस्सा छेड़ दिया।जो यूं था कि शादी के बाद एक रविवार को पोहे बनाने की बात हुई तो मैंने पूरे उत्साह और आत्मविश्वास से यह जिम्मेदारी संभाल ली। मम्मी की एक सीख याद थी कि अच्छे पोहे बनने की शुरुआत उसके सही तरीके से भीगने से होती है। परिपूर्ण रूप से भीगे पोहे नर्म, स्वादिष्ट और सुपाच्य बनते हैं,जिन लोगों को पोहे खाने से गैस होती है उन्हें जाड़े पोहे को कम से कम आधे घंटे भिगोना चाहिए फिर पानी निथार कर दस मिनट रखकर फिर बघार लगाना चाहिए इस से पोहे गैस नहीं करते,हाँ तो जब पोहे तैयार हुए तो मैंने उन्हें हॉट केस में रखा और साथ में अलग-अलग कटोरियों में प्याज, सेव, हरा धनिया, नींबू, अनार दाने, बूंदी, नारियल, जीरावण और सिकी हुई मूंगफली सजाकर रख दी,फिर दादी माँ से लेकर चाचाजी के बच्चों तक, सबकी पसंद के अनुसार “कस्टम डिज़ाइन्ड पोहे” परोसे गए।
उस दिन पोहे के स्वाद से अधिक मेरी सर्विंग स्टाइल की प्रशंसा हुई। और सबसे प्यारी बात ससुर जी ने मेरा नाम “प्रशंसा” रख दिया। आज भी वे मुझे इसी नाम से बुलाते हैं।

तो आज का रविवार फिर पोहे की गर्माहट, नर्माहट, सुगंध, स्वाद और पोषण के साथ शुरू हुआ… और दिल ने कहा कि कुछ व्यंजन केवल खाए नहीं जाते, जीए भी जाते हैं।

 

3.अब हमारी बहू पोहा बनाना पसंद करती है -श्रीमती निहारिका सिंह 

मेरी बहू  बुन्देलखण्ड से है, और बुंदेलखंड में पोहे का इतना चलन नहीं है तो उसे पोहा पसंद नहीं था.  शादी के बाद जब नाश्ते में  में पोहे की प्लेट सामने आती तो उसके चेहरे का भाव बदल जाता .अनमने भाव से खा  लेती थी . और अब इंदौर   में रहते रहते वो भी पोहा खाना पसंद करने लगी है, अब जब वो पूछती है कि माँ नाश्ते में पोहा बना ले? तो  मैं मन मन  मुस्कुरा लेती हूँ ,यह है हमारा  इंदौर का असर.उसके बनाए पोहे देख कर मन के   कोने में ये तसल्ली का भाव आता है कि वो ना केवल पोहे पसंद करने लगी है इसका मतलब  वो अब परिवार  मे रमती जा रही है.

4“हमारा हर दिवस पोहा दिवस है ‘-  सपना उपाध्याय

सबसे पहले तो ये जान लीजिए की इन्दौरी  के लिए कोई पोहा दिवस जैसा दिवस मायने नहीं रखता है क्योंकिइन्दोरियों  लिए हर दिवस पोहा दिवस है ।
एक ग्रहणी होने के नाते ३५ वर्ष घर के रसोई की बागडोर संभाली है किंतु मजाल है की नाश्ते की बिनाका गीत माला में पोहा ने अपना प्रथम स्थान छोड़ा हो नीचे के स्थान परिवर्तित होते रहे किंतु नाश्ते का सरताज हमेशा पोहा ही रहा है और सदियों तक रहेगा ।बाकी नाश्ते जैसे इडली सांभर ,डोसा ,उपमा आदि का अस्तित्व पोहा के सामने आते ही नगण्य हो जाता है ।
हमारी स्वाद ग्रंथि ने इसे हमारी जिह्वा पर स्थायी रूप से निवास करने के लिए का वरदान जो दे दिया है ।जैसे ही घर में पोहा बनाने की खुशबू आती है तो बालगोपाल समेत सारे परिवार के सदस्य बिन बुलाए मेहमान की तरह हाज़िर हो जाते है,जो रोज़ कई बार बुलाने पर भी आने में देर करते है ।
इंदौर में सुबह सुबह आप कहीं से भी गुजरो हरे धनिए की चुनर ओढ़े जिसमे लाल अनारदाने के मोती जड़े हो पोहा के दर्शन हो ही जाते है ।
स्मार्ट पैकेजिंग तो मार्केट में अभी कुछ साल पहले ही आई है हमने तो इस तकनीक का आविष्कार कई साल पहले ही कर लिया था ,परिवार के कुछ बच्चे विदेश जा रहे थे तब उन्हें माँ पिता ,भाई बहन से बिछुड़ने का उतना ग़म नहीं था जितना पोहा ना मिलने का दुख था सो हमने तरकीब लगाई पोहा को लम्बा जीवन देने की ।
अभी फ़िलहाल आधा समय बच्चों के पास बंगलौर में व्यतीत हो रहा है सोसाइटी सभ्यता के अंतर्गत विभिन समूह बने हुए है जिसमे एक समूह है इंदौरियन ग्रुप जिसमे हर महीने चाय -पोहा पार्टी होती है उसमे मुझे भी पतिदेव के साथ शामिल होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ बात – बात में जान पड़ा की उनमे से कई परिवार ऐसे थे जो इंदौर से नहीं अपितु दिल्ली ,उत्तरप्रदेश ,राजस्थान इत्यादि जगह से थे किंतु पोहा प्रेम ने उन्हें झूट बोलने पर विवश कर रखा था ।
ऐसी है पोहे की महिमा जो सिर्फ़ इंदौर के लोगो के सर चड़ कर नहीं बोलता बल्कि दूसरे प्रांतों और विदेशों में भी इसकी प्रसिद्धि है ।
मैं तो अपने आप को धन्य समझती हूँ जो मैंने इंदौर की धरती पर जन्म लिया ।

5. “जब रेस्टोरेंट वाले ने पूछा इन्दोरी हो ?”–डॉ.स्वाति तिवारी 

बात उन दिनों की है जब मेरा  बर्लिन में अपनी थीसिस लिखने गया हुआ था .बर्लिन में पोहा बहुत मुश्किल था हां वो रेडीमेट पोहे के पैकेट ले गया था .लेकिन जिसे हर रविवार नाश्ते में सेंव वाला गर्म पोहा पसंद हो उसे रेडीमेड पोहा राहत दे सकता है पर आनंद नहीं .और इंदौर में रहनेवाले के लिए पोहा सिर्फ स्वाद नहीं है सन्डे का आनंद भी है .तो छ -सात माह बाद वह किसी काम से भारत आया .और दिल्ली एयर पोर्ट से उसे दूसरी फ्लाईट लेनी थी इस बीच उसके पास एक दिन  दिल्ली में रुकने का समय था .फ्लाईट रात दो बजे के आसपास आई थी बाहर निकल कर उसे एक रेस्टोरेंट खुला दिखा तो टैक्सी रोक कर वो वहां पूछ रहा था पोहा मिलेगा क्या ?  रेस्टोरेंट वाला उससे पूछता है कि आप इंदौरी हैं? क्या,उसने पूछा क्योँ मेरे चेहरे से लगा क्या/ रेस्टोरेंट वाला कहता है आधी रात को फ्लाइट से उतर कर कोई पोहा मांगे तो वो 100 💯 परसेंट इंदौरी ही होगा यह पक्का है .मेरे बेटे ने घर पंहुच कर पोहे की प्लेट पकड़ते हुए यह किस्सा सुनाया .और  हम सभी जैसे गर्व  से भर गए हाँ हम  इन्दौरी हैं .

6.जब पोहे ने बेटे को  पीटवा दिया, पोहा तो लिखा ही नहीं था उसने -कुसुम सौगानी 

आज इंदौर की शान खाद्य पदार्थ पोहे परसबने जम कर कलम चलाई है।कई तरह के पोहे का स्वाद मुंह में आ गया।मैं बाहर हूँ ।मेरा भी बहुत मन हो रहा था लिखने का .. समय ही नहीं मिला .. तब ही एक छोटा सा किस्सा याद आ गया है , पोहे को लेकर …बात चालीस साल पुरानी है… शायद और पहले भी तीसरी या चौथी क्लास में पढ़ रहे मेरे बेटे की हिंदी निबंध कॉपीटीचर ने जॉंच कर रिमार्क लिख कर दे दी और कहा कि इस पर सिग्नेचर करा के लाना मम्मी या पापा से!स्कूल में बेटे की हिंदी कमजोर थी व हिन्दी हैण्ड राइटिंग उससे भी बदतर.. जैसा कि प्रायः अंग्रेज़ी कॉन्वेंट स्कूल में पढ़े बच्चों की होती थी।दो तीन दिन छुपानेके बाद जब टीचर ने रिमाइंडर किया होगा , तब बेटे राम जी कॉपी ने बताईऔर साइन करने की रिक्वेस्ट की।मैंने रिमार्क पढ़कर ग़ुस्से से ,आव देखा न ताव और इसके पापा को फिजिकली फारवर्ड की।मोबाइल नहीं थे तब ..

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उन्होंने रिमार्क देखकर पहले तो एक तमाचा बेटे को लगाया (उस जमाने तो अच्छे -अच्छे पढ़े लिखे पिता या माता भी बच्चों की पिटाई या चाँटे मारने से नहींचूकते थे।)और पूछा कि ये क्या लिखा है ?बेटा खुद भी नहीं बता पाया कि उसने ऐसा क्या लिख दिया जो पापा की मार मम्मी की डॉंट और टीचर कीफ़ीडबैक पिटाईदार मिली।जबकि निबंध तो ठीक ही लिखा था।मुझे भी बहुत ज्ञान और ओलमामेरी सासु मॉसाब द्वारा दिया गयाकि वो छोरो कईं करे.. भूखा मरता आगी होगी याद पोया की..कल से माँग रियो थो ! खैर जीबहुत दिनों बाद बेटे की ट्यूब लाइट जली कि उसने पोहे देदोनहीं बल्कि पीछे देखो लिखाथा,जैसा कि पेज भर जाने पर PTO लिख दिया जाता है।और तबसे अभी तक पोहे का यह किस्सा हंसने पर मजबूर कर देता है और हाँ इससे पोहा कितना तलबदार है तबसे ही यह पता पड़ता है।