खरगोन में भूमि अधिकारों की मांग कर रहे आदिवासियों के दावों को प्रशासन ने किया खारिज, आदिवासियों का धरना और आंदोलन जारी

प्रशासन ने विस्तृत रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी 

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खरगोन में भूमि अधिकारों की मांग कर रहे आदिवासियों के दावों को प्रशासन ने किया खारिज, आदिवासियों का धरना और आंदोलन जारी

 

 

खरगोन : मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के भगवानपुरा तहसील के दगड़खेड़ी गांव की भूमि अभिलेख सुधार और भूमि अधिकारों की मांग को लेकर जारी आदिवासी किसानों के आंदोलन के बीच जिला प्रशासन ने शनिवार को अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए प्रदर्शनकारियों के दावों को खारिज कर दिया। प्रशासन का कहना है कि जिस भूमि को किसान अपने नाम दर्ज कराने की मांग कर रहे हैं, वह पिछले लगभग 100 वर्षों से शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है और राजस्व रिकॉर्ड में किसी प्रकार की त्रुटि नहीं पाई गई है।

प्रशासन द्वारा जारी स्पष्टीकरण के अनुसार ग्राम धूलकोट के खसरा नंबर 318, रकबा 232.318 हेक्टेयर भूमि को लेकर कुछ आवेदक, जिनमें बलिराम, सुभाष निगोले एवं अन्य शामिल हैं, मध्यप्रदेश पेसा नियम-2022 के तहत उक्त भूमि को अपने नाम दर्ज कराने और राजस्व अभिलेखों में संशोधन की मांग कर रहे हैं। इसी मांग को लेकर 8 जून से भगवानपुरा तहसील कार्यालय के सामने धरना-प्रदर्शन जारी है।

प्रशासन ने बताया कि कुछ माह पहले इसी क्षेत्र की खसरा नंबर 318/1 भूमि को उद्योग विभाग को आवंटित करने के प्रस्ताव का ग्रामीणों ने विरोध किया था। आपत्ति को स्वीकार करते हुए उद्योग विभाग का आवेदन निरस्त कर दिया गया था, जिससे ग्रामीण संतुष्ट हो गए थे। इसके बाद अब भूमि को निजी स्वामित्व में दर्ज कराने की मांग की जा रही है।

राजस्व अधिकारियों के अनुसार पुराने अभिलेखों की जांच में पाया गया कि वर्ष 1925-26 में यह भूमि पुराने खसरा नंबर 194 के रूप में “दीगर जंगल” मद में दर्ज थी। वर्ष 1968-69 के बंदोबस्त में इसका नया खसरा नंबर 318 दर्ज किया गया और वर्तमान 2025-26 के रिकॉर्ड में भी यह मध्यप्रदेश शासन की शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है। अधिकारियों का दावा है कि इस भूमि पर कभी भी पट्टा जारी नहीं किया गया और न ही किसी आवेदक का नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज पाया गया है।

प्रशासन का कहना है कि कुछ लोग इस भूमि पर अतिक्रमण कर खेती कर रहे हैं और अब उसी भूमि को निजी स्वामित्व में दर्ज कराने की मांग कर रहे हैं। साथ ही यह प्रचारित किया जा रहा है कि पेसा नियम-2022 के तहत ग्राम सभा की अनुशंसा पर ऐसा किया जा सकता है, जबकि कानून में अतिक्रमित शासकीय भूमि को निजी स्वामित्व में दर्ज करने का कोई प्रावधान नहीं है।

जिला प्रशासन ने यह भी कहा कि आंदोलन के बाद रिकॉर्ड की पुनः जांच कराई गई, लेकिन किसी प्रकार की विसंगति सामने नहीं आई। प्रदर्शनकारियों द्वारा अब तक अपने दावों के समर्थन में कोई वैधानिक दस्तावेज या प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया गया है। कलेक्टर भव्या मित्तल ने बताया कि मामले की विस्तृत रिपोर्ट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेज दी गई है।

वहीं दूसरी ओर आंदोलनरत आदिवासी किसानों का आरोप है कि गांव के भूमि अभिलेख गायब हैं या उनमें गंभीर त्रुटियां हैं, जिसके कारण उनकी कृषि भूमि शासकीय भूमि के रूप में दर्ज हो गई है। किसानों का कहना है कि इससे सैकड़ों परिवार सरकारी योजनाओं, कृषि ऋण, फसल बीमा और अन्य सुविधाओं से वंचित हो रहे हैं। उन्होंने ग्राम सभा की निगरानी में पुनः सर्वेक्षण और रिकॉर्ड सुधार की मांग दोहराते हुए आंदोलन जारी रखने की घोषणा की है।

उधर प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों से धरना समाप्त करने की अपील की है।

भगवानपुरा तहसील कार्यालय पर भूमि अभिलेख सुधार और भूमि अधिकारों की मांग को लेकर दगड़खेड़ी के आदिवासी किसानों का धरना-प्रदर्शन छठे दिन भी जारी रहा। आंदोलन के दौरान किसानों ने तहसीलदार को मध्य प्रदेश पेसा नियम, 2022 की प्रति भेंट कर आरोप लगाया कि प्रशासन कानून के प्रावधानों के बावजूद भूमि रिकॉर्ड सुधारने की दिशा में कार्रवाई नहीं कर रहा है। किसानों का दावा है कि उनकी जमीनें सरकारी रिकॉर्ड में शासकीय भूमि के रूप में दर्ज हैं, जबकि उनके पास दशकों पुराने दस्तावेज मौजूद हैं। किसानों ने कहा कि ग्राम सभा को रिकॉर्ड सुधार की अनुशंसा का अधिकार है और जब तक भूमि अभिलेखों का सुधार नहीं होगा, उनका आंदोलन जारी रहेगा।