
कठघरे में परीक्षा: दो में से कोई एक ही बात हो सकती है या तो सख्त नियम या लचीलापन
अगर दोनों नहीं तो फिर नियमों में संशोधन हो।
डॉ.शोभा जैन

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समय प्रबंधन में रास्ते की रैली भी आती है ,और सरकारी यात्राओं के रूट -बदल भी , समय प्रबंधन में गाड़ी का पंचर होना भी आता है ,अचानक बारिश का आ जाना भी। समय प्रबंधन में ट्रैफिक जाम भी सम्मिलित है। अचानक से तबियत बिगड़ जाना भी। इनमें से कुछ समस्याएं हमारी व्यवस्था की विसंगतियों का स्थायी भाव हैं । बच्चों आपको रोकर नहीं समय साधकर ही इस पर विजय पाना होगा। कुछ समस्याओं से हम बेखबर नहीं होते लेकिन सचेत भी नहीं होना चाहते । हम परीक्षा के दिनों में दो पेन अतिरक्त साथ रखते थे अगर एक बंद हो जाये तो दूसरे का उपयोग कर लें ये हमारा समय प्रबंधन ही तो था ।
हमें परीक्षार्थियों को परीक्षा के साथ आने वाली अयाचित चुनौतियों के लिए भी तैयार करना होगा क्योकि दो मिनट देर से पहुँचने पर परीक्षा न दे पाने वाला उदाहरण न तो पहला है न आखरी।
एक तरफ आप कहते हैं नियमों का लचीलापन सबसे ख़राब व्यवस्था का सूचक दूसरी तरफ कहते हैं नियम -धरम नाम की कोई चीज है कि नहीं थोड़ा लचीला होना चाहिए समय देखकर । बच्चों यह सच है हमारा देश कुछ चीजों के लिए अभिशप्त हैं जिसके लिए जितने सरकारी पदाधिकारी जिम्मेदार है उतने हम स्वयं भी। ट्रेफिक जाम सरकार नहीं करती हम ही करते हैं पूरी तरह पढ़े लिखे शिक्षक –अधिकारी होकर भी बराबर इस कृत्य में भागीदार होते हैं ,रांग साइड से गाड़ी हम फंसाते हैं , नो पार्किंग में हम पार्किंग रखते हैं ,सारे धार्मिक कार्यक्रमों की रैली परीक्षा के दिनों में हाई वॉल्यूम डीजे के साथ हम निकालते हैं।
नेताओं की रैली की वजह से आप परीक्षा देने देर पहुँचते हैं , बारिश होने की वजह से आप देर से पहुंचते हैं। मंत्री संत्री के शहर आगमन पर क्या ही कहूं खुद ही भुगत भोगी हूँ मार्ग बदल दिए जाते हैं। जो लोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर ही पूरी तरह निर्भर हैं उनके लिए समय प्रबंधन जैसा कोई शब्द बना ही नहीं है क्योकि सिटी बसों के रूट बदल जाते हैं जहाँ से बदलते हैं उसकी जानकारी बहुत हद तक सामान्य जनता को नहीं होती जाम में फंसने पर यथा स्थिति पता चलती है।
अब ये समस्याएं बरसों से हैं सरकार किसी की भी हो. सिस्टम की कमान कोई भी संभाले। कुछ अनुभव मेरे अपने निजी भी रहे.बीच सड़क में खूब बहस भी की। कुछ सिटी बसों के चालान भी बनवा दिये अंत में कोई नतीजा नहीं निकला। सिटी बस में बच्चे खुद लटकर बस के मेन गेट पर खड़े होकर जाना पसंद करते हैं वे स्वयं नियम तोड़ते हैं (हम स्वयं नियम, तोड़ते हैं )फिर हम नियमों के लचीलेपन में संवेदनशील होने की बात भी करते हैं। दो में से कोई एक ही बात हो सकती है। या तो नियम या लचीलापन या फिर नियमों में संशोधन हो।
रही बात परीक्षाकेंद्र पर दो मिनट देरी से पहुँचने की तो एडमिट कार्ड में बहुत सारे महत्वपूर्ण नियम लिखे होते हैं जो सभी के लिए समान हैं।
—— अब आप ये नहीं कह सकते कि सरकार ने नियम तोड़े तो हमकों भी नियम तोड़ने की छूट मिलनी चाहिए। जब परीक्षाओं में घोटाले हो रहे हों तो (पेपर लीक ) परीक्षार्थियों को दो मिनट विलम्ब से आने की छूट मिलनी चाहिए , परीक्षा के कुछ देर पूर्व सेंटर बदलने वाली बात वास्तव में गलत ही है ऐसे सरकारी ट्विस्ट में कोई विकल्प होना चाहिए आप उसे परीक्षा देने से वंचित तो नहीं कर सकते अचानक सेंटर बदलने की वजह से देरी से पहुँचने पर। दरअसल सरकार की गैर जिम्मेदारी और परीक्षार्थी की चूक दोनों भिन्न श्रेणी के अपराध हैं। एक अपराध के बदले दूसरे को नियम तोड़ने की छूट मिल जाये यह भी न्याय सम्मत नहीं।
आप गाँव में रहकर परीक्षा की तैयारी करते हैं जहाँ कोई सुविधा नहीं होती जिस कोचिंग से नीट की तैयारी करते हैं वहां बहुत पैसा खर्च करते हैं (अपनी हैसियत से ज्यादा ) तब यह भी पढ़ते ही होंगे कि अब तक रास्ते में कौन –कौन सी बाधाओं से गुजरना होगा समय उसी अनुरूप साथ लेकर चलें। मुझे याद हैं 1990 -95 में भोपाल जाना था पीपीटी के एग्जाम देने तब एक दिन पहले भोपाल जाकर रहना था ऐसा कोई रिश्तेदार भोपाल में नहीं था जिनके घर जाकर रहा जा सके (किसी को तकलीफ नहीं देनी थी ) ऐसे में व्यवस्था कैसे जुटाई होगी हम दोनों बहनों ने जिससे परीक्षा देने समय पर पहुँच सकें ये हम ही जानते हैं। नीमच जितने छोटे से कस्बे की ही कहानी है ये।
दरअसल चूक हमारी भी है बच्चे बहुत परिश्रम करते हैं ।माता -पिता का संघर्ष भी बराबर सम्मिलित। लेकिन बच्चों को उनको उन चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करना होगा जो हमारी ही अव्यवस्था से जन्मी है। बल्कि कुछ अयाचित भी होंगी जो हमारी चूक से जन्मी होंगी । उन्हें गाँव का कहकर हम केवल उसे दया का पात्र बना देंगे जिससे वे उस दया का एक कोना सदा साथ लेकर चलेंगे। लेकिन जहाँ नियम लचीला नहीं है वहां नहीं होगा मेरे बच्चों। छात्रा के देरी से पहुँचने वाला यह उदाहरण पहला नहीं है आखरी भी नहीं आखरी हम क्या सीख रहें हैं ऐसे झटकों से ?
यह योग्य युवाओं का देश है योग्यता का आशय यही कि अचानक से आयी अयाचित किसी भी स्थिति का वे सामना कर सकते हैं। समय प्रबंधन सबसे ऊपर हो उसमें यह परीक्षा के लिए ही नहीं जीवन के हर क्षेत्र में कारगर होगा। परीक्षा प्रक्रिया में शुचिता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होना ही एकमात्र विकल्प है। ऐसी परीक्षाओं के लिए एक नई नीति की आवश्यकता है जो न सरकार के लिए लचीली होगी न परीक्षार्थी के लिए। या फिर सबके लिए सिर्फ लचीली ही होगी सख्ती से सबको राहत।
अंतिम बात —
आप गांव से आते हैं उसकी अपनी अलग चुनौतियां होंगी इसे पूर्व से समझने में क्या समस्या है परीक्षा का आशय ही — पर – इच्छा इसलिए तमाम संवेदनाओं के साथ रहकर भी हम दया शब्द का उपयोग कर नियमों को दरकिनार नहीं कर सकते। सबके पास निजी साधन नहीं होते लेकिन आपके पास साधन नहीं हैं यह बात परीक्षा के दिन आपको पता नहीं चलती पहले से ही मालूम होती है फिर भी इतनी पक्षपात संवेदनशील भावुकता की दृष्टि से ठीक है लेकिन परीक्षा के लिए उचित नहीं।
मैंने ऐसे विद्यार्थी भी देखें हैं जो प्रवेश पत्र लाना भूल जाते थे.{डॉ. शोभा जैन की फेसबुक वाल से}





