यथार्थवाद और मध्यवर्गीय जीवन का जीवंत चित्रण करती स्त्री जीवन की कहानियां
वरिष्ठ साहित्यकार गोवर्धन यादव समकालीन हिंदी साहित्य के एक बेहद प्रतिष्ठित, निष्ठावान और बहुआयामी रचनाकार हैं। भारतीय डाक-तार सेवा से सेवानिवृत्त (पोस्टमास्टर) होने के बाद भी वे साहित्य साधना में पूरी तरह समर्पित हैं और वर्तमान में छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) को अपनी साहित्यिक कर्मभूमि बनाए हुए हैं।गोवर्धन यादव का साहित्य किसी एक विधा में सिमटा हुआ नहीं है, बल्कि उन्होंने लगभग हर क्षेत्र में अपनी कलम चलाई है . इस क्रम में उनकी नयी पुस्तक बेपर आवाजें मेरे पास पुस्तक समीक्षा के लिए आई .यह पुस्तक उनका कहानी संग्रह हैं जो स्त्री विमर्श की दृष्टी से लिखा गया है .नारी प्रधान 15 कहानियों के इस संग्रह को पढ़ते हुए हम माध्यम वर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय समाज के अलग अलग तरह के संघर्षों से बावास्ता होते हैं .ये कहानियाँ समाज के मध्यमवर्गीय संघर्षों के केवल यथार्थ से ही रूबरू नहीं करवाती बल्कि एक नजरिया भी देती हैं उस यथार्थ को समझाने .परखने और विश्लेषित करने का ,जिसके चलते पाठक पढ़ते हुए परत दर परत उस यथार्थ महसूस करने लगता हैं .
ये कहानियां केवल कल्पना का लेखन ना होकर बहुत निकट से देखा और अनुभूत सामाज का आइना लगती हैं .साहित्यकार गोवर्धन यादव द्वारा रचित एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और यथार्थवादी कहानी है। यह कहानी ग्रामीण आदिवासी परिवेश, मानवीय संवेदनाओं और समाज के निचले तबके के संघर्ष को बेहद बारीकी से उजागर करती है।कहानी का केंद्रबिंदु धनिया नाम की एक गरीब ग्रामीण महिला है। प्रेमचंद के ‘गोदान’ की धनिया की तरह ही, गोवर्धन यादव की धनिया भी संघर्ष, त्याग और जिजीविषा (जीने की इच्छा) की प्रतिमूर्ति है। धनिया एक ऐसे परिवार से ताल्लुक रखती है जो घोर आर्थिक तंगी और सामाजिक असमानता से जूझ रहा है। उसके जीवन में सुख के पल कम और चुनौतियाँ ज़्यादा हैं।: कहानी में दिखाया गया है कि किस तरह ग्रामीण समाज का एक विशेष वर्ग (शोषक वर्ग) गरीब और सीधे-सादे लोगों की मजबूरी का फायदा उठाता है। धनिया और उसका परिवार दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं, लेकिन फिर भी उन्हें दो वक्त की रोटी के लिए तरसना पड़ता है। तमाम अभावों के बावजूद, धनिया अपने आत्मसम्मान से समझौता नहीं करती। वह परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने के बजाय अपनी नैतिकता और ईमानदारी को बचाए रखती है।गोवर्धन यादव की ‘धनिया’ सिर्फ एक महिला की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के उस हाशिए पर खड़े वर्ग की आवाज़ है जो हर रोज़ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। यह कहानी पाठकों के भीतर सहानुभूति जगाती है और सामाजिक विसंगतियों पर सोचने को मजबूर करती है।धनिया केवल एक पीड़ित पात्र नहीं है; वह एक सशक्त स्त्री भी है। वह अपने परिवार को जोड़े रखने के लिए हर संभव प्रयास करती है। लेखक ने उसके माध्यम से ग्रामीण महिलाओं के भीतर छिपी अदम्य साहस और सहिष्णुता को रेखांकित किया है।इस रचना में ग्रामीण जीवन के उस कड़वे सच को सामने रखा है, जिसे अक्सर मुख्यधारा की चकाचौंध में भुला दिया जाता है। टूटे हुए घर, कर्ज का बोझ, और मौसम की मार के बीच जीती ज़िंदगी का यहाँ सजीव चित्रण है।यह कहानी एक बड़े उपन्यास का फलक लिए हुए पाठक को देर तक सोचने पर मजबूर करती हैं .
रेत के घरोंदे’ वरिष्ठ साहित्यकार गोवर्धन यादव द्वारा रचित एक बेहद गहरी, सांकेतिक और यथार्थवादी कहानी है। इस कहानी का शीर्षक ही अपने आप में पूरी कथावस्तु को बयां कर देता है—जिस तरह नदी या समुद्र के किनारे रेत से बनाए गए महल या घर पानी की एक ही लहर में ढह जाते हैं, ठीक उसी तरह इंसान के बुने हुए कुछ सपने, रिश्ते और आकांक्षाएं भी वक़्त के थपेड़ों के आगे बिखर जाती हैं।यह कहानी मुख्य रूप से मानवीय रिश्तों की कशमकश, आधुनिक जीवन की असुरक्षा और बदलते सामाजिक मूल्यों के इर्द-गिर्द घूमती है।कहानी मध्यवर्गीय समाज की उन मजबूरियों और छटपटाहट को उजागर करती है, जहाँ इंसान अंदर से टूट रहा होता है, लेकिन बाहर से उसे सब कुछ सामान्य दिखाने का ढोंग करना पड़ता है।यह पात्रों के अंतर्मन में चलने वाले द्वंद्व को बखूबी पकड़ती है। पात्रों की निराशा, उनकी उम्मीदें और फिर उनका अकेलापन पाठक को अंदर तक झकझोर देता है।’रेत के घरोंदे’ प्रतीक है उस अस्थिरता का, जिससे हर इंसान किसी न किसी मोड़ पर गुजरता है।’रेत के घरोंदे’ ज़िंदगी की नश्वरता, रिश्तों की नाजुकता और इंसानी उम्मीदों के उतार-चढ़ाव को बयां करती संवेदनशील कहानी हैं.
एक और महत्त्व पूर्ण कहानी ‘भेड़िया’ सीधे तौर पर सामाजिक विसंगतियों, व्यवस्था के क्रूर चेहरे और इंसानी फितरत में छिपी दरिंदगी पर कड़ा प्रहार करती है।इस कहानी का शीर्षक ‘भेड़िया’ केवल एक जानवर का नाम नहीं है, बल्कि यह समाज में मौजूद शोषक, लालची और क्रूर मानसिकता का प्रतीक है।लेखक ने दिखाया है किसमाज में इंसान का मुखौटा पहने कई ऐसे लोग घूम रहे हैं, जिनकी हरकतें भेड़िये से भी अधिक हिंसक और डरावनी हैं।’भेड़िया’ कहानी आज के दौर में और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें सचेत करती है कि यदि समाज में नैतिक मूल्यों का पतन इसी तरह होता रहा, तो इंसानियत पूरी तरह इस ‘भेड़िया-संस्कृति’ की भेंट चढ़ जाएगी। यह कहानी केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि झकझोर कर जगाती है।कहानी का ताना-बाना और पृष्ठभूमि इस तरह तैयार की गई है कि पाठक के मन में एक निरंतर तनाव और जिज्ञासा बनी रहती है। जिसमें आम आदमी वह कमज़ोर और साधनहीन पात्र है , जो इन ‘भेड़िये’ रूपी इंसानों के चंगुल में फंसकर व्यवस्था का शिकार बनता है।
एकोर महत्वपूर्ण कहानी लगी जिसका जिक्र किया जाना जरुरी है .यादव जी ने ‘फांस’ कहानी को बहुत ही संवेदना के साथ बुना हैं. ‘फांस’ उनकी एक अत्यंत मार्मिक, संवेदनशील और यथार्थवादी कहानी है। जहाँ कथाकार संजीव का ‘फांस’ उपन्यास विदर्भ के किसान संकट पर केंद्रित है, वहीं वरिष्ठ साहित्यकार गोवर्धन यादव की कहानी ‘फांस’ ग्रामीण और अर्ध-शहरी जीवन की विसंगतियों, आर्थिक कशमकश और आंतरिक मानवीय पीड़ा को बयां करती है।यह कहानी इंसान के भीतर और बाहर चुभने वाली उस अदृश्य ‘फांस’ (काँटे या अंतहीन दर्द) के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो व्यवस्था और बदहाली के कारण पैदा होती है।कहानी के केंद्र में मध्यम या निम्न-मध्यम वर्ग का एक ऐसा परिवार या पात्र है, जो अपनी ईमानदारी और नैतिक मूल्यों के साथ जीना चाहता है। लेकिन रोज़मर्रा की ज़रूरतें और आर्थिक तंगी उसके जीवन में एक ऐसी ‘फांस’ बन जाती हैं, जो उसे हर पल कचोटती रहती है। इस कहानी में एक परिवार की कहानी है जिसमें बच्चे भी शामिल हैं .इस कहानी का प्रभावी पात्र एक माँ हैं .कहानी में ननद और भाभी के बीच का मतभेद दर्शाया गया हैं .लेखक ने पात्रों के अंतर्मन में चलने वाले द्वंद्व को बहुत ही सजीवता से उभारा है। बाहरी दुनिया की क्रूरता और भीतर की बेबसी का यह टकराव पाठक को गहराई से प्रभावित करता है।इस संग्रह में लगभग सभी कहानिया चाहे वह “रूपान्तर” हो “पुष्पा दी” हो चाहे “चन्द्रमुखी” कहानियों की यह विशेषता है कि उनके पात्र हमारे आसपास के समाज से ही लिए गए साधारण लोग होते हैं, जो अपनी परिस्थितियों से जूझ रहे होते हैं। इन कहानियों को रोचक शैली में लिखा गया है.
सगुन चिरैया एक स्वयम्भू बाबा के आसपास रची गई है .रूपान्तर एक स्त्री की कथा है जिसका पति बिना बताये चला जाता है और वह स्त्री अपनी बच्ची की परवरिश करती है औरअचानक बेटी के विवाह पर पति महाशय टपक आते हैं .तब वह स्त्री खुश नहीं हो पाती उसके संघर्ष विद्रोह कर देते हैं .और स्त्री आक्रोशित हो जाती है उसका रूपान्तर हो जाता हैं .एक स्त्री बिना सहारे समाज में अपना बच्चा पालती हैं पोस्ती हैं और कितने संघर्ष करती हैं और वही संघर्ष पति की वापसी पर क्रोध में बदल जाते हैं जो स्वाभाविक हैं इस तरह सभी कहानिया पठनीय हैं .गोवर्धन यादव जी की शैली की यह विशेषता है कि वे बहुत ही सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं। उनके संवाद छोटे परंतु बेहद असरदार होते हैं, जो कहानी के वातावरण को जीवंत बना देते हैं। साहिय जगत में ये कहानिया लम्बे समय तक याद रखी जायेंगी. और पाठक इसमें समाधान भी देख पायेंगे .
एक अच्छे संग्रह की शीर्षक कहानी ‘बेपर आवाजें ‘ कहानी का मख्य पात्र एक एसा व्यक्ति है जिसका पालन पोषण गाँव में हुआ है और अब वह शहर में नौकरी कर रहा ही एक मेहनती ,निष्ठावान कर्मचारी लेकिन वह शहरी वातावरण में घूल नहीं पा रहा हैओर अपने गाँव की स्मृतियों में खोया रहता है , उसके मन में गाँव की समस्याए और शहरी सुविधाओं की तुलना चलती रहती ही ,वह एक खाना बनानेवाली महिला को रखता है जो उसकी सहायता करती है वह उसे कामवाली बाई कहने में संकोच करता है .इस कहानी में उसके द्वन्द की पीड़ा बेपर आवाजें बन कर उसका पीछा करती है . इस तरह एक मार्मिक कहानी पाठक को भी उस पीड़ा की बेपर आवाजों से हिला कर रख देती है .





