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Dausa Bus Fire Tragedy: जनम जनम साथ निभाने की कसमें लपटों में जल रही थी!  

Dausa Bus Fire Tragedy: जनम जनम साथ निभाने की कसमें लपटों में जल रही थी!

दोसा के दर्दनाक हादसे पर कीर्ति राणा की विशेष रिपोर्ट (विशेष संदर्भ- इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार चंदू गुप्ता की पत्नी निर्मला की हृदयविदारक मौत की दास्तान!)

शायर हैरत इलाहाबादी का मशहूर शेर है-आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं/ सामान सौ बरस का है पल की ख़बर नहीं।

मेरे अपने किसी परिचित की यकायक हुई मौत की खबर जब चौंकाती है तो मुझे भी यही शेर याद आता है। ऋषिकेष से इंदौर आ रही निजी यात्री बस में पत्रकार-मित्र चंदू गुप्ता और उनकी पत्नी निर्मला देव दर्शन कर इंदौर आ रहे थे कि दोसा के समीप ट्रेलर में घुस गई तेज रफ्तार यह बस आग की भेंट चढ़ गई।

एक मौत ही है जो कभी कह कर आती नहीं और जब दबे पांव आती है तो पत्थर दिल भी पिघल जाते हैं। मैंने एकाधिक बस दुर्घटना की स्पॉट रिपोर्टिंग की है लेकिन दोसा से इंदौर आते हुए ट्राले को टक्कर मारे जाने के बाद जब यह बस आग की लपटों में घिरी होगी तो अंदर फंसे 22 यात्रियों की क्या हालत होगी यह कल्पना कर के ही सिहरन पैदा हो जाती है। ऐसी घटना होने पर क्या हालात रहते होंगे यह कल्पना की है इस रिपोर्ट में।

कुछ वर्षों पूर्व ऐसी ही घटना में मेरे मित्र-ज्योतिषी भगवती शर्मा भी परिवार सहित दिवंगत हो चुके हैं। वो, उनकी पत्नी और दोनों बेटिया कार में ही जिंदा जल गई थी और चारों के कंकाल हो चुके शव को पोटलियों में बांध कर पुणे से इंदौर लाए थे।

ऋषिकेश से तीर्थयात्रा कर इंदौर लौट रही हंस ट्रेवल्स की स्लीपर बस में चंदू गुप्ता, पत्नी निर्मला सहित 22 यात्री सवार थे। यह दर्दनाक वाकया बीते मंगलवार देर रात करीब 2:30 बजे एक्सप्रेसवे पर कोलवा थाना इलाके के तनावड़ जीरो पॉइंट के पास हुआ। पुलिस की प्राथमिक जांच के मुताबिक, आशंका है कि बस ड्राइवर को अचानक नींद की झपकी आ गई थी, जिसके कारण तेज रफ्तार बस सीधे ट्रेलर में जा घुसी। आग इतनी तेजी से फैली कि यात्रियों को संभलने तक का मौका नहीं मिला। पांच लोग आग में जिंदा जल गए, जबकि तीन की मौत गंभीर चोटों के कारण हुई।

पत्नी निर्मला के साथ निजी बस से इंदौर लौट रहे करीब पांच दशक पुराने पत्रकार-मित्र चंदू गुप्ता ने भी कहां सोचा था कि संतो-आचार्यों की सेवा का पुण्य प्रताप उनकी पत्नी को ही नहीं मिल पाएगा।

उस दृश्य की कल्पना करते हुए ही सिहरन पैदा हो जाती है- घड़ी के कांटे ब्रह्म मुहूर्त की तरफ बढ़ रहे थे….हंस ट्रेवल्स की ऋषिकेष से चली, दोसा से इंदौर की तरफ रफ्तार से बढ़ रही थी, सारे यात्री गहरी नींद में थे कि अचानक जोर का झटका लगा….यात्री समझ पाते कि बस आगे खड़े ट्रेलर से टकराई है, वो सब संभलें-संभले तब तक तो बस आग की लपटों में घिर गई थी। चीख-पुकार के बीच बदहवास ये यात्री समझ ही नहीं पाए कि करें तो क्या करें, अधिकांश का सामान तो नीचे डिक्की में था….जो सामान साथ में था उसे छोड़ सब अपनी जान बचाने की आपाधापी में लगे हुए थे….जोरदार धमाके की आवाज सुनकर आसपास के रहवासी भी बस में फंसे यात्रियों को बचाने दौड़ पड़े थे….लपटों में फंसे यात्रियों की दर्दीली चीखें गूंज रही थी लेकिन उन्हें बचाने के लिए सहायता करने वाले अपनी जान तो दांव पर लगा नहीं सकते फिर भी लोग जुटे थे भगवान का सहारा और अपनी हिम्मत से….रात के अंतिम प्रहर आग की लपटों में बस घिरी हुई है….यात्रियों की मदद की पुकार मची हुई है….सब अपनी और अपनों की जान बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं….आग की लपटों के साथ ही जहरीले धुएं से यात्रियों की सांस उखड़ रही है…चंदू भाई साथ बैठी पत्नी निर्मला का हाथ पकड़ कर बस से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं…बाकी यात्रियों को भी मौत के मुंह से बचना है….दोनों तरफ की सीटों के बीच वाले रास्ते में भगदड़ मची हुई है….गुप्ता जी की मशक्कत जारी है…. दोनों ने सप्तपदी के साथ जन्म जन्म तक साथ देने की कसमें खाई, जिसके साथ अग्नि के समक्ष फेरे लिए, अपनी जान बचाने के लिए उस सहधर्मिणी को कैसे अग्नि की लपटों का शिकार होने दूं।

वो पत्नी को बचाने, अपने साथ बाहर निकालने के लिए हाथ खींचने के संघर्ष में लगे हुए हैं…पत्नी भी साथ देने को प्रयासरत है कि उनका पैर सीट के नीचे लगे पाइप में फंस गया है….चंदू भैया के प्रयास में कोई कमी नहीं है…कह भी रहे हैं धीरे से पैर निकाल तो सही….बदहवास पत्नी के चेहरे के हावभाव बता रहे हैं कि अन्य यात्रियों की चीख पुकार…ऊंची उठती लपटों की तेज होती आंच में उनकी हिम्मत पस्त होती जा रही है….बस में फैलता जहरीला धुएं के कारण अन्य यात्रियों की तरह ये दोनों भी सांस नहीं ले पा रहे हैं….कुछ अन्य यात्री भी मदद करना चाहते थे लेकिन हालात के आगे मजबूर थे….मदद के लिए आसपास के ग्रामीण भी पानी आदि डाल कर लपटें कम होने के प्रयास में लगे हुए हैं…चंदू भाई पत्नी का हाथ अपनी तरफ खींचने में लगे थे कि जान बचाने के लिए बाहर आने के लिए निकल रहे….पत्नी हिम्मत हार गई….बेहोश हो गई। अन्य यात्रियों का झटका लगने से उनका भी हाथ छूट जाता है….जनम जनम साथ निभाने की कसमें लपटों में जल रही है….लोग चंदू गुप्ता को लगभग धकेलते हुए बाहर ला रहे हैं….अपनी जान बचने से ज्यादा उनकी आंखों के आंसुओं में पत्नी निर्मला बूंद बूंद टपक रही है….वो खुल कर रो भी नहीं पाते….कैसे रोएं एक रात पहले तक तो देव दर्शन करते हुए दोनों ने एक दूसरे की लंबी उम्र के साथ बच्चों की खुशहाली की कामना की थी।

चंदू गुप्ता भुला नहीं पाते वह दृश्य ….मैंने ही नहीं बाकी यात्रियों ने भी पुलिस और हाईवे पेट्रोलिंग को लगातार फोन करते रहे…एक घंटे तक कोई मदद नहीं पहुंची….अगर समय पर रेस्क्यू टीम आती, तो शायद कई और जानें बचाई जा सकती थीं।

आग की भयावहता का आलम यह कि बस अब अस्थिपंजर में बदल गई है….आग पर काबू तो पा लिया है लेकिन रह रह कर काला धुआं उठ रहा है…अब वहां एकत्र लोगों में कानाफूसी चल रही है ‘कितने मरे’ ? थाने का पुलिस बल लोगों को घटना स्थल से हटा रहा है….कितने मरे, रिपोर्टरों के इस प्रश्न का वो भी जवाब देने की स्थिति में नहीं है….जले हुए यात्री में कौन महिला, कौन पुरुष उन कंकाल में यह पता लगाना भी मुश्किल है….लोगों को पुलिस बता रही है डीएनए से ही पहचान होगी। जिस अस्पताल में आग से झुलसे यात्रियों को उपचार के लिये दाखिल कराया है उनके सहयात्री भी उन्हें खोज रहे हैं….अस्पताल में बिलखती एक महिला यात्री पुलिस जवान के पैरों में पड़ जाती है….उसे अपने गुम हुए बच्चे की जानकारी चाहिए। पुलिस की मजबूरी है कैसे कहे कि जो यात्री नहीं मिल रहे वो नहीं बचे हैं…रोते-कलपते यात्रियों को ढाढस बंधाते हुए झूठी तसल्ली दे रहे हैं उन लोगों का पता नहीं चल रहा है। जिन्हें समझा रहे हैं वो भी चंदू गुप्ता की तरह समझ चुके हैं कि हमारे हमसफर इस दुनिया में नहीं हैं पर उनका मन यह भी मानने को तैयार नहीं है। चंदू गुप्ता की पत्नी हादसे का शिकार हो गई हैं, यह खबर इंदौर पहुंचते ही गुप्ता जी से जुड़े लोग उन्हें फोन लगाते रहे लेकिन इन सब को कहा पता था कि पत्नी को बचाने की कोशिश के दौरान चंदू गुप्ता का फोन भी बस में गिर गया था। जिन्हें उनके बच्चों के नंबर पता थे उनसे घटना की जानकारी ले रहे थे।

बस-ट्राला भिड़ंत की खबर फैलते ही अखबारों के रिपोर्टर भी स्पॉट पर पहुंच गए हैं, जो यात्री बच गए हैं उनसे पूछ रहे हैं कैसे हुई घटना….कुछ यात्री बता रहे हैं जहां चाय-पानी के लिये बस रुकी थी वहां ड्रायवर-कंडक्टर ने दारू पी थी, हमने टोका भी था लेकिन हमारी नहीं सुनी…भीड़ में शामिल कुछ लोग कयास लगा रहे हैं ड्रायवर को झपकी लग गई होगी।

🔹चंदू गुप्ता तो भगवान से पूछ भी नहीं सकते

मेरे पुण्य कार्यों का अंश मात्र भी पत्नी को क्यों नहीं मिला

तीस-चालीस साल से धर्म-समाज-संतों संस्थाओं के कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के काम में लगे रहने वाले चंदू गुप्ता के लिये अब लोग कह रहे हैं भगवान ने उन्हें बचा लिया। चंदू गुप्ता तो भगवान से पूछ भी नहीं सकते कि समाज-धर्म-संत सेवा के मेरे पुण्य का कुछ अंश मेरी पत्नी को क्यों नहीं मिला। उनकी बड़ी बेटी ग्वालियर में डॉक्टर हैं, जबकि छोटी बेटी सागर में एडीएम के पद पर पदस्थ है। दामाद पुलिस अधीक्षक हैं। बेटा बेंगलुरु में होंडा कंपनी में है। यह समझते हुए कि गुमशुदा मम्मी अब जिंदा नहीं बची हैं, फिर भी हादसे के बाद से पूरा परिवार उनकी तलाश में जुटा रहा।

🔹पोटली में लाए थे भगवती शर्मा और पत्नी, बेटियों के जले हुए शव के कंकाल

दस साल पहले इंदौर निवासी मेरे मित्र-ज्योतिष भगवती शर्मा (कांग्रेस नेता श्रीकांत शर्मा के भाई) परिवार सहित वर्धा जाने के लिये निकले थे। उनकी गोल्ड मेडलिस्ट बेटी का वर्धा विवि के दीक्षांत समारोह में सम्मान होना था। एक रात पहले ही भगवती और बेटियों से सराफा चौपाटी पर हम मिले थे, साथ में कुल्फी खाई। उसने जब कार से वर्धा जाने का बताया तो उसे समझाया भी था गाड़ी थोड़ा सम्हल कर चलाना अजय जैन (बीएसएफ) का रिकार्ड तोड़ने की कोशिश मत करना।

महाराष्ट्र से पहले पांढुर्ना (छिंदवाड़ा) में एक स्थान पर आगे जा रहा ट्राला मोड़ पर अचानक धीमा हुआ और भगवती शर्मा कार कंट्रोल कर पाते उससे पहले कार ट्राले के नीचे जा घुसी। जोर के धमाके के साथ कार जल उठी। ऑटो लॉक होने से कार के गेट भी नहीं खुले। भगवती, उनकी पत्नी, दोनों बेटियां लपटों में घिरी रहीं, लोग मदद भी नहीं कर पाए। घटना की जानकारी मिल तो गई थी लेकिन श्रीकांत की चिंता थी कि कंफर्म नहीं हो रहा है । नागपुर लोकमत में संपादक-मित्र विकास मिश्र को मैंने फोन पर घटना बता कर मदद मांगी। उन्होंने अपने स्थानीय रिपोर्टर को भेजा, तब कंफर्म हुआ कि चारों मृतक इंदौर के भगवती शर्मा परिवार है। दूसरे दिन पुलिस ने कार की सीटों से चिपके चारों के कंकाल जैसे तैसे निकाले। चारों के शवों की पोटली अर्थियों पर रख कर श्मशानघाट ले गए थे। आज भी वो घटना याद करने पर सिहरन होती है।