
Attack on Forest Staff in Khandwa, Burhanpur, Dewas, and Bhopal Districts: न बजट, न हथियार, न सुरक्षा कवच फिर कैसे न पिटे जंगल के पहरेदार
गणेश पांडे की विशेष रिपोर्ट
भोपाल: Attack on Forest Staff in Khandwa, Burhanpur, Dewas, and Bhopal Districts: मध्य प्रदेश में जंगलों की सुरक्षा के लिए तैनात वन कर्मियों के लिए न बजट है, न हथियार है,न सुरक्षा कवच, ऐसे में जंगल के पहरेदारों का पीटना तो तय है!
ताज्जुब की बात तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने वन विभाग को फोर्स घोषित करने का सुझाव दिया है लेकिन इस पर सरकार मौन है।
प्रदेश में कुल वन क्षेत्र (Forest Area) 77,073 वर्ग किलोमीटर है। वन भूमि पर अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है। यानि देश में सबसे अधिक अतिक्रमण मप्र के जंगलों में है। इतने बड़े इलाके के पहरेदार (फ्रंट लाइन फारेस्ट स्टॉफ ) आए दिन पिट रहें हैं। अफ़सोस सरकार मौन है। दुख की बात यह है कि पीसीसीएफ स्तर के वरिष्ठ अधिकारी टी क्लब और नाईट पार्टियों में व्यस्त हैं।
चिंताजनक पहलू यह है कि वन्य प्राणियों और जंगलों की सुरक्षा में लगे पहरेदारों के लिए न तो सरकार पर्याप्त बजट देती है। न ही उन्हें सुरक्षा उपकरण दिए जाते हैं। न ही सरकार ने उन्हें पुलिस की तरह स्वयं की सेफ्टी में गोली चालन के अधिकार दिए हैं। यहां तक कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर अभी तक वन को फोर्स घोषित नहीं किया है। यही वजह है कि पिछले वर्षो की तुलना मैं इस वर्ष फारेस्ट के पहरेदारों के साथ मारपीट की घटनाएं 30-40 प्रतिशत तक बढ़ रही है।
मप्र में अतिक्रमण की सबसे बड़ी समस्या खंडवा और बुरहानपुर वन मंडलों मैं है। अतिक्रमणकारियों द्वारा फारेस्ट के फ्रंट लाइन स्टॉफ पर हमले की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। केवल अतिक्रमण हटाने में प्रति वर्ष करीब 50 वन सुरक्षाकर्मी घायल होते हैं। गत दिनों खंडवा, देवास, भोपाल जिलों में बड़ी हिंसक झड़पें हुई हैं, जिनमें कई वनरक्षक गंभीर रूप से घायल हुए हैं। हालिया प्रमुख घटनाएं राज्य के अलग-अलग हिस्सों में वन कर्मियों की सुरक्षा को लेकर सामने आई। इनमें खंडवा के आमा खुजरी क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने गई वन विभाग की विशेष टीम पर करीब 150 लोगों (अधिकतर महिलाओं सहित) ने घात लगाकर गोफन, पत्थरों और लाठियों से जानलेवा हमला कर दिया। दुर्भाग्य से वन पहरेदारों के पास न तो पुलिस की तरह सुरक्षा कवच था और न ही उनका मुकाबला करने के कोई हथियार थे। लिहाजा इस हमले में 8 से 12 वनरक्षक बुरी तरह घायल हो गए। इसी तरह देवास के भील आमला गांव में अतिक्रमण हटाने गए वन अमले पर ग्रामीणों ने पथराव कर दिया। जान बचाने के लिए भागे वनकर्मियों के वाहनों और जेसीबी मशीन में तोड़फोड़ की गई तथा ड्रोन भी तोड़ दिया गया। राजधानी भोपाल के बैरसिया के कलारा बीट में अवैध जुताई रोककर पौधरोपण की जमीन बचाने गए वनकर्मियों पर हथियारों से हमला किया गया। इसके शहडोल में भी वन कर्मियों पर रेत माफिया ने हमला कर वन कर्मियों को घायल कर दिया। मुरैना (चंबल) में रेत माफियाओं की धरपकड़ के दौरान एक ट्रैक्टर-ट्रॉली द्वारा कुचले जाने से एक वनरक्षक हरिकेश गुर्जर की मौत को भुला नहीं पा रहा है।
*सुरक्षा पर खतरे और कर्मचारियों की मांग*
मप्र के जंगलों में असुरक्षा का माहौल है। जंगलों में गश्त करने वाले और विशेष फ्लाइंग स्क्वॉड (विशेष उड़नदस्ता) के रूप में तैनात नए वनरक्षक सबसे ज्यादा जोखिम में हैं। वनकर्मियों के पास आधुनिक हथियार या पर्याप्त सुरक्षा कवर नहीं होता, जबकि माफियाओं के पास घातक हथियार (जैसे गोफन, कुल्हाड़ी, बंदूकें) होते हैं। बार-बार हो रहे हमलों के बाद कर्मचारी संगठनों ने सरकार से स्थायी पुलिस सुरक्षा, हथियारों की उपलब्धता और एंटी-एनक्रोचमेंट अभियानों के दौरान पर्याप्त पुलिस बल तैनात करने की मांग की है। यही नहीं, सरकार ने वन विभाग के पहरेदारों के खंडवा और बुरहानपुर के लिए विशेष सशस्त्र बल दिए थे, उसे भी हटा दिया है।
*जंगलों के प्रोटेक्शन के लिए मात्र 27 करोड़*
प्रदेश की 77,073 वर्ग किलोमीटर वन भूमि और वन्य प्राणियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी संरक्षण शाखा को दिया गया है। इस शाखा की स्थिति बड़ी दयनीय है। एक तो फील्ड से लेकर मुख्यालय तक स्टॉफ की कमी और दूसरा यह कि इतने बड़े इलाके की रखवाली करने के लिए मात्र 27 करोड़ का बजट है। दिलचस्प पहलू यह है कि इससे ज्यादा बजट तो मानव संसाधन शाखा को 43 करोड़ का बजट दिया जाता है, जो कि ट्रेनिंग के नाम अनाप-शनाप खर्च किया जाता है। यही नहीं, संरक्षण शाखा से अधिक पर्यावरण वानिकी शाखा को 37 करोड रुपए का बजट दिया जाता है।
*नेता और माफियाओं का गठबंधन*
नेताओं और माफियाओं के बीच जंगल में अतिक्रमण, अवैध उत्खनन और कटाई जैसे संगीन अपराध बढ़ रहे हैं. स्थानीय नेताओं खासकर सत्ता से जुड़े जनप्रतिनिधियों का वरदहस्त प्राप्त होने के कारण वन माफिया के हौसले इतने बुलंद है कि उनके मार्ग में बाधा डालने वाले वनकर्मियों को मौत के घाट तक उतारने में कोई संकोच नहीं करते है। अलबत्ता महकमे के शीर्षस्थ अधिकारी अपने मैदानी अमले को प्रोटेक्ट करने में संकोच करते है। उनकी ‘की’ पोस्टिंग खोने के भय से वह माफिया के खिलाफ खुलकर न बोल पा रहे है और न ही कार्रवाई करने के लिए सरकार पर दबाव बना पा रहे है।
*टाइगर रिजर्व की भूमि भी सुरक्षित नहीं*
बांधकाढ़, पेंच, पन्ना, कान्हा और सतपुड़ा वइगर रिजर्व पार्कों के आसपास पावरफुल लोगों ने रिसोर्ट, होटल और पर्यटन स्थल की आड़ में धंधे खोल रखे हैं। कई रिसोर्ट संचालक तो टाइगर को अपने बाउँ तक में लाने का काम करते हैं? इन वइगर रिजर्व में बने रिसोर्ट संचालकों ने फॉरेस्ट की सरंक्षित वन भूमि पर भी कब्जा कर रखा है। भोपाल के वन विहार के आसपास बने होटल संचालकों ने भी फॉरेस्ट एरिया में कब्जा कर अपने क्षेत्र बढ़ा लिए हैं और इस अवैध अतिक्रमण, कब्जे की तरफ किसी भी अफसर का ध्यान नहीं जाता है। इस मामले में कई बार वन्यप्राणी विशेषज्ञों ने भी शिकायतें की, लेकिन आज तक अधिकारियों ने जांच कराना उचित नहीं समझा।
*वन अपराध के महत्वपूर्ण आंकड़े ( प्रतिवर्ष )*
– कर्मचारियों पर औसतन – 30
– घायल कर्मचारी औसतन – 29
– मृत कर्मचारी औसतन – 2-3
– राजसात वाहन औसतन – 2511
– जप्त वनोपज औसतन – 18-19 हजार
– जप्त वनोपज की कीमत औसतन- 45-48 करोड़
*किस सर्किल में कौन माफिया सक्रिय*
बालाघाट- टिम्बर माफिया
बैतूल- अतिक्रमण और टिम्बर माफिया
भोपाल- अतिक्रमण, खनिज और टिम्बर माफिया
छतरपुर- टिम्बर और खनिज माफिया
छिंदवाड़ा- वन माफिया
ग्वालियर- फर्शी-पटिया और खनिज माफिया
होशंगाबाद- टिम्बर माफिया और शिकारी
इंदौर- टिम्बर और अतिक्रमण माफिया
जबलपुर- टिम्बर माफिया
खंडवा- अतिक्रमण और खनिज माफिया
रीवा- खनिज माफिया
सागर- टिम्बर और खनिज माफिया
शहडोल- टिम्बर – रेत माफिया और शिकार माफिया
शिवपुरी-खनिज और अतिक्रमण माफिया
उज्जैन-वन माफिया
*सबसे अधिक मप्र में अतिक्रमण*
प्रदेश में वन भूमि 95 हजार वर्ग किलोमीटर है।
*टाप 5 राज्य — क्षेत्र वर्ग किमी में* ——
मप्र —5347———-
असम —-3172
उड़ीसा–785
महाराष्ट्र—-605
अरूणांचल प्रदेश– 586
*इनका कहना*
खंडवा मैं वन कर्मियों पर हमले की घटना की समीक्षा करने मंगलवार को खंडवा जा रहा हूं। मैंने सरकार को खंडवा और बुरहानपुर के लिए दो बटालियन और एक बटालियन राजगढ़ -विदिशा वन मंडल के लिए मांग की है।
*अमित दुबे, एपीसीसीएफ संरक्षण शाखा*





