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Economic Survey 2025–26: वैश्विक संकट की आशंका के बीच क्यों मजबूत खड़ी है भारतीय अर्थव्यवस्था!

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Economic Survey 2025–26: वैश्विक संकट की आशंका के बीच क्यों मजबूत खड़ी है भारतीय अर्थव्यवस्था!

के के झा की विशेष रिपोर्ट

दुनिया की अर्थव्यवस्था इस समय अनिश्चितताओं के घने बादलों से घिरी है। भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा हथियारीकरण, आपूर्ति शृंखला व्यवधान, संरक्षणवादी व्यापार नीतियां और तकनीकी प्रतिस्पर्धा — ये सभी मिलकर वैश्विक विकास की रफ्तार को धीमा कर रहे हैं। ऐसे दौर में भारत की अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन अलग दिखाई देता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 इस बात का संकेत देता है कि भारत न केवल तेज़ी से बढ़ रहा है, बल्कि उसकी विकास संरचना पहले से अधिक लचीली और संतुलित होती जा रही है।

सर्वेक्षण का मूल संदेश स्पष्ट है — भारत की वृद्धि केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि नीति अनुशासन, घरेलू मांग, पूंजी निवेश और संस्थागत सुधारों के संयुक्त प्रभाव का परिणाम है। फिर भी, यह दस्तावेज अति-आशावादी नहीं है; इसमें वैश्विक संकट की 10–20% संभावना का स्पष्ट उल्लेख भी है।

विकास दर: गति भी, आधार भी

वित्त वर्ष 2025–26 में 7.4% की वास्तविक GDP वृद्धि का अनुमान भारत को प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे आगे रखता है। महत्वपूर्ण यह है कि यह वृद्धि केवल एक क्षेत्र आधारित नहीं, बल्कि बहु-चालित (multi-engine) है। निजी उपभोग GDP का लगभग 61.5% बना हुआ है, जबकि सकल स्थिर पूंजी निर्माण लगभग 30% के आसपास है।
इसका अर्थ है कि विकास में मांग और निवेश — दोनों की भूमिका है। यह संतुलन टिकाऊ विकास की पहचान माना जाता है। FY27 के लिए 6.8–7.2% का अनुमान बताता है कि नीति निर्माताओं को भी मध्यम अवधि में स्थिर वृद्धि की उम्मीद है, न कि अस्थायी उछाल की।

मुद्रास्फीति पर काबू: राहत, पर सतर्कता जरूरी

अप्रैल से दिसंबर 2025 के दौरान हेडलाइन मुद्रास्फीति 1.7% के निचले स्तर पर रही। खाद्य और ईंधन कीमतों में नरमी इसका प्रमुख कारण रही। RBI द्वारा FY26 का मुद्रास्फीति अनुमान घटाकर 2% करना मैक्रो स्थिरता के प्रति विश्वास दर्शाता है।

फिर भी यह याद रखना होगा कि भारत ऊर्जा और कमोडिटी आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था है। किसी बड़े वैश्विक झटके से मूल्य स्थिरता पर दबाव लौट सकता है। इसलिए मुद्रास्फीति पर नियंत्रण को स्थायी उपलब्धि मानने के बजाय “प्रबंधित उपलब्धि” माना जाना चाहिए।

राजकोषीय अनुशासन: खर्च की गुणवत्ता पर जोर

राजकोषीय घाटे को FY21 के 9% से अधिक स्तर से घटाकर FY26 में 4.4% के लक्ष्य तक लाना महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार विकास और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रही है।
और अधिक उल्लेखनीय है पूंजी व्यय में तेज़ वृद्धि — ₹3.4 लाख करोड़ से बढ़कर ₹10.5 लाख करोड़। यह खर्च राजमार्ग, रेल, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी उत्पादक परिसंपत्तियों पर केंद्रित है। दीर्घकाल में यही निवेश निजी निवेश को भी आकर्षित करता है।

सुधार के संकेत, गुणवत्ता की चुनौती

बेरोजगारी दर का 4.9% तक आना और औपचारिक रोजगार का विस्तार सकारात्मक संकेत हैं। सामाजिक सुरक्षा कवरेज बढ़ना भी संरचनात्मक बदलाव का संकेत देता है।

गरीबी के स्तर में भी गिरावट दर्ज की गई है। लेकिन अब चुनौती केवल रोजगार सृजन नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और कौशल-संगत रोजगार की है। आय वृद्धि, उत्पादकता और रोजगार स्थिरता — ये अगले चरण के संकेतक होंगे।

कृषि से AI तक: परिवर्तन का विस्तृत दायरा

सर्वेक्षण का दायरा व्यापक है — कृषि उत्पादकता, औद्योगिक संरचना, सेवा व्यापार, हरित विकास और डिजिटल अर्थव्यवस्था तक। सेवा क्षेत्र अभी भी व्यापार प्रदर्शन का प्रमुख चालक बना हुआ है।

AI, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और रणनीतिक खनिजों के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को भविष्य का निर्णायक क्षेत्र बताया गया है। यह सही दिशा है, पर इसके लिए निवेश, कौशल और नीति समर्थन की गति और तेज करनी होगी।

सबसे बड़ी चेतावनी: वैश्विक संकट की संभावना

सर्वेक्षण का सबसे गंभीर बिंदु यह है कि वैश्विक आर्थिक संकट की 10–20% संभावना जताई गई है — जो 2008 से भी गंभीर हो सकता है। निर्यात नियंत्रण, भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण और संसाधन प्रतिस्पर्धा नए जोखिम कारक हैं।

भारत की आंतरिक मजबूती वास्तविक है, लेकिन वह बाहरी झटकों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। इसलिए रणनीतिक लचीलापन, आयात विविधीकरण और घरेलू क्षमता निर्माण अनिवार्य होंगे।

निष्कर्ष: मजबूती है, पर गति बनाए रखना असली परीक्षा

आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 एक संतुलित दस्तावेज है — यह उपलब्धियों को रेखांकित करता है, पर चुनौतियों को भी नहीं छुपाता। भारत आज अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है। कम मुद्रास्फीति, नियंत्रित घाटा, उच्च निवेश और डिजिटल ढांचा — ये सभी सकारात्मक स्तंभ हैं।

लेकिन अगली छलांग स्वतः नहीं लगेगी। सुधारों की निरंतरता, संस्थागत क्षमता और तकनीकी निवेश ही तय करेंगे कि भारत केवल तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था रहेगा या वास्तव में विकसित अर्थव्यवस्था की श्रेणी में पहुंचेगा।

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