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LIFE LOGISTICS: : बात कड़वी, लेकिन सच्ची है

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LIFE LOGISTICS: : बात कड़वी, लेकिन सच्ची है

मैं चूंकि सिविल इंजीनियर, पर्यावरण पोस्ट ग्रेजुएट, लेखक ,पत्रकार और रचनाकार होने के नाते एक विशेष चिंतन रखता हूं। जो मैं आज के दौर में अनुभव करता हूं वही मैं यहां उल्लेखित करने की कोशिश कर रहा हूं।

मैं जानता हूं कि मैं बहुत कड़वी बात लेकिन बड़ी सच्चाई के साथ आप सभी के साथ सांझा करना चाहता हूं ताकि आप सभी मेरे साथ वही चिंतन रखें और कैसे इस दूषित वातावरण को दूर कर सके इस पर कुछ विचार करें।

मेरी बात से शासन-प्रशासन मुझसे नाराज न हो बल्कि एक जागृत नागरिक समझ कर उस पर विचार कर सुनिश्चित करें कि इसमें कैसे सुधार हो।

इस दौर में बहुत सारे नेता कहते कुछ हैं और कर कुछ और रहे हैं।उनकी मनोदशा बेहद स्वार्थी होती जा रही है। जन सेवा भावना से बिल्कुल विपरीत अपना वर्चस्व बनाने में लगे हुए हैं। इसी बात का लाभ लेते हुए शासन प्रशासन में नौकरशाही इस कदर भ्रष्टाचार में लिप्त हो गई है कि आम जनता भी यह समझ बैठे कि कुछ भी काम करना है तो रिश्वत देना है। बिना रिश्वत दिए कोई भी साधारण सा काम भी अत्यंत मुश्किल है।

यहां तक कि एक गरीब मजदूर यदि अपना राशन कार्ड बनवाने जाता है तो उसके लिए भी उसे रिश्वत देना पड़ती है। आप जमीन प्रॉपर्टी संबंधित कोई भी विभाग में बिना रिश्वत के आप कुछ काम नहीं करा सकते और शासन-प्रशासन नित्य नियम बनाकर हर आदमी को इस बात पर बांधे रखता है कि वह बार-बार सरकारी दफ्तर में चक्कर लगाए। पुलिस विभाग में अब तो एक साधारण सा कांस्टेबल भी बिना रिश्वत के कुछ काम नहीं कर रहा और थाने उगाई के अड्डे बनते जा रहे हैं। बिजली विभाग के अधिकारी बिना रिश्वत लिए आपका कोई भी काम करने को तैयार नहीं है l पैसा फेंको तुरंत काम करवा नहीं तो बरसो लटके रहो।

आम जनता में भी मिलावट खोरी और बेईमानी का संचार होते जा रहा है। अब वह व्यापार नहीं रहे जो किसी जमाने में बड़ी इज्जत और इमानदारी से होते थे। नवयुवक सिर्फ विज्ञापनों में देखकर ब्रांडेड कंपनी के नाम से महंगी से महंगी चीजें खरीदने में अपनी शान समझने लग गए। बड़े हॉस्पिटल्स की हालत एक विशाल कत्लखाने जैसी है जहां सिर्फ आप प्रवेश कर सकते हैं और बाहर निकलते वक्त कहां-कहां से आपकी जेब कटेगी आप सोच नहीं सकते। ईमानदारी से जीवन जीना अत्यंत मुश्किल हो गया है। हर व्यक्ति को झूठ का सहारा लेना पड़ता है ना तो वह अपनी इनकम सच्चाई से दिखा पाता है।आयकर विभाग को मजबूरन झूटे आंकड़े देने पड़ते हैं और वहां पर भी पैसे फेंको और अपने आप को क्लीन चिट साबित कर लो।

दबंग लोगों के जन्मदिन से लेकर किसी भी कार्यक्रम में बड़े-बड़े विज्ञापन लाखों के छपते हैं। आयकर विभाग उनसे कभी नहीं पूछता कि यह पैसा कहां से आया। राजनैतिक पार्टियों के और धार्मिक आयोजनों में बड़ी बड़ी रैलियां, भव्य टेंट और आयोजन साथ में भंडारे होते हैं। कोई उनसे यह नहीं पूछता है कि इतना रुपया कहां से आया। कोई भी व्यक्ति अपनी इमानदारी से कमाई हुई आय को इस कदर खर्च नहीं करता है। यह सब ऊपरी अघोषित आय के खर्च पर हो रहे हैं।

अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, पर्यावरणविद्)