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National Doctors Day 2026: कहानी -एक और जंग

National Doctors Day 2026: कहानी -एक और जंग
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डॉ स्वाति तिवारी

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एक डॉक्टर होने के नाते जीवन को बचाने की हर संभव कोशिश के बावजूद मुझे रोज ही न केवल पेशेंट के रिश्तेदारों से निपटना होता है, बल्कि स्वयं से भी भावनात्मक स्तर पर जूझना पड़ता है। कई बार जानते हुए भी कि पेशेंट को बचा पाना नामुमकिन है, पर रिश्तेदारों को यह साफ़ नहीं सकते इसलिए पेशेंट का पैरामीटर बताने लगता हूँ । जैसे कह देता हूँ कि क्लीनिकली तो दवाइयां रिस्पांस कर रही है। लेकिन,अभी पेशेंट प्रॉपर रिस्पांस नहीं कर रहा। मेरी तरह हर डॉक्टर को पता होता है,कि किसी भी पेशेंट के साथ इमोशनली इन्वॉल्व नहीं होना चाहिए!
उस दिन मेरी ड्यूटी क्रिटिकल केयर वार्ड में थी। यह कोरोना की दूसरी लहर थी, जो भयावह रुख चुकी थी। घर छोड़े हम दोनों को ही आज दस दिन हो गए थे। पत्नी भी ड्यूटी पर तैनात है ,हमलग अलग हॉस्पिटल में है ।इन दिनों दोनों ही घर नहीं जा रहे थे। घर जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था,वह भी एक बच्चा और एक बुजुर्ग वाला घर । दोनों डॉक्टर हों तो स्थितिएक सी ही होती है पत्नी के लिए नर्सिंग होस्टल में एक रूम हो गया था,जहाँ वह कुछ देर आराम कर सकती थी। लेकिन, मेरे लिए अभी मेरी कार ही मेरा घर था। वही मेरा बेड, , मेरा वार्डरोब बनी हुई थी।
कार लेकर मैं हॉस्पिटल के पीछे बने लम्बे घास के मैदान जैसे कैंपस में चला जाता था, जहां गार्डन के लिए एक नल और सिंचाई का एक पाइप लगा था। इस जगह का एक फायदा तो

से था, स्नान के लिए ताजे पानी की सुविधा का, कपड़े धोने और रात में गाड़ी धो लेने से कुछ ताजगी मिल जाती थी। एन-95 जैसे मास्क तो छोडिये,उन दिनों हमारे पास सामान्य मास्क तक पर्याप्त मात्रा में नहीं थे। हमें अपने गाउन 2-3 दिन तक दोबारा इस्तेमाल करने पड़ रहे थे।

थकान शरीर में और माहोल से मन में पसरी रहती ऐसे माहौल में सोना चाहते हुए भी कई बार सो नहीं पाता था.नींद आएगी कहाँ से!इस महामारी में,इन खतरनाक परिस्थिति में बिना हथियार जैसे हम एक युद्ध लड़ रहे थे।
कोरोना वायरस को लेकर हर रोज़ सरकार की तरफ से होने वाले संवाददाता सम्मेलन में स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों से पीपीई की उपलब्धता पर सवाल पूछे जाते!सच यह हैकि, उनको फिल्ड में जाकर हम डॉक्टरों से पूछना चाहिए! पर, इन तमाम बातों से ऊपर उस वक्त दुनिया भर में डॉक्टर जैसे विश्वयुद्ध के सैनिक हो गए थे, कोई बम गिरे या वायरस हर हाल में खुद को डॉक्टर सिद्ध करने का कोई जुनून सा सवार था। कभी अपनी स्थिति पर तरस आता तो कभी डॉक्टर बनने के जुनून पर पछतावा। लेकिन, ज्यादातर अपने पेशे पर गर्व ही हुआ.
जाने कितने विचार आते-जाते रहते सोते वक्त और फिर एक झपकी आ ही और सो जाता। दिनभर प्लास्टिक के कवच में उमस भरे मायूस भयावह रोते -तड़फते ,साँसों के लिए मरीजों को जीवन की जंग लड़ते देखकर थका शरीर मन को कमजोर करने लगा था .
आज जैसे ही अपने थर्मस से गर्म दूध और ब्रेड स्लाइस निकालकर खाना शुरू किया कि मोबाइल पर मैसेज !खाकर ही देखूंगा। दो स्लाइस भी पूरी नहीं खाई कि फिर मोबाइल बजा। इस बार मेरे वार्ड के जूनियर रेजिडेंट का फोन था ‘सर पेशेंट की कंडीशन क्रिटिकल हो रही है.
‘ओके,ऑक्सीजन अरेंज करो, आता हूँ!’थर्मस बंद कर फिर बास्केट में रखा. कार की डिक्की में उतारी हुई किट को झाड़ा,पहनने का मन नहीं था, लेकिन न पहनने का कोई विकल्प भी नहीं था. पेशेंट का चेहरा दिमाग में घूम गया। मासूम सा युवा चेहरा, अभी-अभी डॉक्टरी पूरी की है। डिग्री मिली भी कि नहीं यह भी नहीं पता, अगर चला गया तो एक प्यारा सा होनहार मेडिकल का कर्णधार डॉक्टर … कितनी बड़ी क्षति होगी!

क्या कहूँगा उसकी मंगेतर से जो उसे लेकर आई थी सर ये जिद्दी है, सुनता नहीं है, समझाया था ब्रेक लो ड्यूटी से, नहीं माना। बीस दिन से अस्पताल में ही रह रहा था। मैं भी इमरजेंसी वार्ड में ही हूँ। जाते-जाते वो अपना मोबाइल नंबर छोड़ गई थी। दराज में एक स्लिप पर लिखा हुआ, क्या करूँ उसे बताऊँ! मेडिकल कॉलेजों से निकले इन दोनों जैसे कितने ही जूनियर डॉक्टरों के लिए ये सीधे आग में कूदने जैसा अनुभव है। इन होनहार कर्णधारों को आगे की पढ़ाई के लिए मौके तलाशने के बजाए इस साल मेडिकल स्टूडेंट्स ट्रेनिंग की तरह कोविड ड्यूटी के फ्रंटलाइन पर तैनात कर दिया गया।जाओ दुश्मन से भीडो?न बचाव के साधन ना अनुभव ,जैसे किसी सैन्य प्रशिक्षण में बारूद की सुरंग बिछाकर उन्हें कहा जाता है इस पर चलो और बताओ कैसे बचोगे ?तैरना नहीं जानते तब भी पानी में फैंक दिए गये बच्चो जैसे ,मारो हाथ पैर तैर गए तो किनारे वरना गहरे समन्दर में .
फोन पर फिर से मैसेज था ‘सर जल्दी!’
पहले जाकर देख लेता हूँ,सात दिनों से मेरे पास भी न दूसरी फ्रेश किट है,न इसे धो पाया हूँ। एक हफ्ते तक वही सर्जिकल मास्क पहनने के बाद,अब जाकर दूसरे मास्क मिले हैं। मार्केट से भी सब गायब हो रहा था .पसीने से गीले होते शरीर पर जब पसीने के रेले उतरने लगते हैं तो हाथ धोने की याद बाद में आती, हाथ उसे पोंछने के लिए पहले ही चला जाता कभी चहरे पर, कभी गर्दन पर, और कभी नाक पर। जितना भी बचाव हो रहा है वह ईश्वर का ही चमत्कार है।
इन विषम परिस्थितियों में इस युवा डॉक्टर का वेंटिलेटर पर जाना मेरे अलावा वार्ड के दूसरे स्टाफ के भी मनोबल को तोड़ने लगा। दिमाग तेजी से कुछ इलाज खोज रहा है।क्या करूं ,कौन सी दवाई ? हाथ स्टेरिंग पर जैसे जाम हो गए थे।
मन अन्दर से पिघलने लगा था ,कोई रिश्ता नहीं होने के बावजूद यह लड़का मेरे मन में जैसे घर करता जा रहा था . अभी तो जानता ही कितना हूँ इसे! बस कुछ दिन कुछ बातें और उसकी लव स्टोरी वह भी केवल अंदाज से देखि समझी । कल ही तो उसके पिता से

फोन पर बात की थी भर्राए गले से भारी रुंधी आवाज से थोड़े घबराए हुए ही थे। बताया था इसने स्कूल के प्राचार्य हैं. एक शिक्षक ने किन हालातों में उन्होंने इसे डॉक्टर बनाया होगा! एक बार अपने गए हुए पिता का चेहरा सामने आया और फिर पेंशन से पाई पाई बचाने वाली माँ याद आई। घर फोन लगा लेता हूँ। गाड़ी चलाते चलाते फोन लगा ही लिया. माँ ने ही फोन उठाया,मान ने पूछा “क्या हुआ नकुल?”माँ जानती है ,जब मैं अन्दर से बैचेन होता हूँ तब माँ को फोन करता हूँ.बताना चाहता हूँ केस पर रुक जाता हूँ ,वह अकेले ही घर मैनेज कर रही है एक बच्ची के साथ ,यह समय भय से भरा है ,खास कर पेरेंट्स के लिए ,सोचकर बात बदल देता हूँ , हाल-चाल के साथ स्टीम लेते रहने की हिदायत भी देता हूँ।
अस्पताल की लिफ्ट बंद है, सीढ़ियों से वार्ड तक पहुँचता हूँ। लगभग भागते हुए ही वार्ड के दरवाजे से अंदर पहुँचता हूँ. दीवार से टिकी उसकी मंगेतर खड़ी दिखाई देती है। देख लेता हूँ, लेकिन कोई पहचान नहीं बताता। अंदर से हिम्मत नहीं है उससे नज़रें मिलाने की।
देखते ही समझ गया कि मरीज़ को आईसीयू ले जाना होगा। लेकिन, हमारे यहां आईसीयू की सुविधा सही मायने में आईसीयू नहीं थी। यह एक सेकेंडरी लेवल हॉस्पिटल है, यानी कि यह मात्र एक ज़िला अस्पताल जैसा ही है. जिसे फिलहाल 100 बेड कर दिया गया है,पलंग लगा कर. खासतौर पर कोविड के मरीजों के लिए रखे गए हैं।लेकिन, हमारी दिक्कत कोविड मरीज़ों की नहीं है, व्यवस्थों से थी जिनके कारण संसाधन जिला अस्पताल जैसे भी नहीं है। जो हैं वे सरकारी खरीदी के वे उपकरण हैं, जिन्हें सरकारी खजाने के सदुपयोग के लिए खरीद लिया जाता है।जिनके होने या न होने की वेल्यू पर बात करना इस महामारी में कोई मायने नहीं रखता!
मुझे लगा अब हम केवल धैर्य रखने और मन को स्थिर बनाए रखने के उपायों की स्थिति से बहुत दूर निकल आए हैं। सही मायनों में हमें मेडिकल दवाइयां और संसाधन चाहिए कब तक हम पेरासिटामोल टैबलेट, विटामिन सी और एजिथ्रोमाइसिन 500 से मरीजों को बचाने के प्रयास करेंगे! हमारे पास तो कोई सहीइलाज की जानकारी भी नहीं और दवाइयां

तो अब बैसिक भी उपलब्ध नहीं है! इसका साँसों का संकट शुरू हो चुका था और मैं अपने ही अंदर के डॉक्टर से भावनात्मक रूप से लड़ रहा था। स्टोर इंचार्ज को फोन लगाता हूँ दवाइयों के लिए,ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए। लेकिन, वह रटा रटाया जवाब देता है ‘बहुत सीमित स्टॉक था कब का ख़त्म हो गया। बाजार से मंगवा लीजिए पेशेंट के अटेंडेंट से!
मेरे अंदर वह दृश्य कौंध जाता है, जब स्टोर के अन्दर से बातचीत के अंश बाहर सुनाई दिए थे।और ऑक्सीजन के सिलेंडर की गाडी अस्पताल के पिछले गेट पर रुकी थी.इंजार्ज डॉक्टर के आवाज जस की तस सुनाई देती है, ” कुछ दवाईया जो मार्केट में भी कम हो रही हैं उन्हें सुरक्षित कर दीजिए। मंत्रीजी के निर्देश हैं,कुछ इंजेक्शन और दवाइयां उनके बंगले पर भी रखवानी है,चार सिलेंडर भी .किसी ख़ास परिस्थिति के लिए! कुछ अपने ही स्टाफ के वरिष्ठों को भी चाहिए।जरुरत पड़ेगी आगे ,जैसी स्थितियां बन रही है.मैं गुस्से से उबलने लगा ‘साले सब के सब —‘.
मुझे पता था स्टोर से हटाकर दवाइयां कहां रखी हो सकती हैं! मैं भागता हूँ बेसमेंट की तरफ, पुराने स्टोर तक जहां लोग मुश्किल से पहुंच पाते हैं। सीढ़ियों पर अँधेरा और शव गृह के कारण लोग कम ही जाते हैं। एक साथ चार-चार सीढ़ियाँ लांघ रहा हूं। स्टोर कीपर स्टोर की सांकल चढ़ा ही रहा था कि मैं उसे धक्का देकर स्टोर खोल लेता हूँ। सामने ही एक दवाइयों का नया बॉक्स दिखाई देता है। मैं गाली देते हुए बक्सा फाड़ देता हूँ। दवाइयों को अपनी जेब में भरकर फिर भागता हूँ। यह भूलकर कि इस हरकत के बाद मेरी नौकरी और इज्जत दांव पर लग जाएगी। ऑक्सीजन के कुछ सिलेंडर भी स्टोर में छुपाये गए देख लेता हूँ,वो लड़की सिलेंडर अपने वार्ड से उठा लायी थी । थोड़ी राहत लगीमुझे अपनी हिम्मत के कारण इंजेक्शन देता हूँ हल्का सा सुधार दिखा उसकी साँसों की आवाजाही में। मैं आँसुओं की धार से धुँधलाते हुए चहरे देख रहा था, लेकिन सब एक दसरे से नजरें बचाकर नाम आँखों को झपका रहे थे .मैं एक विजयी भाव से भरने लगा जैसे कोई गढ़ जीतकर लौटा हूँ।
जेब में भरी दवाई जूनियर रेजिडेंट के हाथ में देता हूँ।दूसरा इंजेक्शन लगाते लगाते हालत हाथ से बेकाबू होने लगे. उसकी उखड़ी साँसों को मीलों की दूरी तय करते देख रहा हूँ। हे

भगवान! अगर तुम्हारा अस्तित्व है,तो इस बच्चे को बचा लो!मन ही मन एक प्रार्थना करता हूँ .
लड़की मेरे पास आकर खड़ी हो गई,” सर इसकी मम्मी पूछ रही है,क्या बताऊँ!”
मैं गर्दन घूमकर सिर्फ देखता हूँ .
“वे वीडियो कॉल पर हैं।”
इशारे से समझाता हूँ ,”उन्हें कहो कि दवाइयां मिल गई और दे दी हैं बस!”
‘लेकिन सर …’
‘इस वक्त हमयही बता सकते हैं ….’
पहली बार अपनी विवशता ने झकझोर दिया .हम सब लगे थे बीमारों का भगवान बनने में। पर, बेबस, असहाय, अपने ही एक साथी को साँसों के युद्ध में जूझते देख रहे थे। जीवन देने का भ्रम आज टूट रहा था। मनुष्य सर्वशक्तिमान होने का केवल दंभ भरता है, पर है कुछ नहीं। एक अदृश्य वायरस के आगे घुटने के बल खड़े हैं आज सब। विकास की केवल बातें करते हैं,जबकि सच यह है कि डॉक्टरों तक के पास पीपीई किट्स और एन-95 मास्क की अवेयरनेस तो छोड़िए उपलब्धता भी एक खामोश प्रश्न था।जिस पर इस वक्त बोलना भी गुनाह था। मैं अपने अन्दर के तूफ़ान में घिरा था वो साँसों की झंझावातों में और वो लड़की उसकी मंगेतर अपने सपनों से,प्यार के वादों से, अन्धकार भरे भविष्य से लड़ रही थी। उसकी आखरी हिचकी ने सब शांत कर दिया। अब नए संकट थे। रिपोर्ट पॉजिटिव थी तो …!

लड़की खिसकते खिसकते फिर दीवार से चिपक गई बेजान सी । . फिरअचानक एक रुलाई के साथ जैसे दीवार तोड़कर बाहर निकलती है और उससे लिपट जाती है, रोकता हूँ उसे! “यह पोजेटिव पेशेंट था,” एक पल में वह था हो गया?

“मर तो गई हूं सर इसी के साथ।इसके बगैर जी कर भी क्या करुँगी, एक बार गले लगाकर उसे छू तो लेने दीजिए!’ वह द्दहादे मार कर रोने लगती है . उसका फोन विडिओ काल पर खुला है,सामने उसके बूढ़े पिता हैं ,जो स्तब्ध है ,जैसे काठ मार गया हो उन्हें .
मैं पहली बार किसी पेशेंट के लिए रोना चाहता हूँ,पर मैं तो डॉक्टर हूँ ड्यूटीपर हूँ रो नहीं सकता. लड़की रो रही है,जूनियर भी इधर उधर होकर रोक रहे है अन्दर के बहाव को । लड़की उसके परिवार से भी अटेच है इमोश्नली, उसे एक बार उसके घर ले जाना चाहती है उसी घर जहाँ वह दुल्हन बनकर जाने के सपने बुनती रही होगी। बुदबुदाती है ‘इसकी माँ ने चार महीने से इसको देखा नहीं। यह पी जी की तैयारी में लगा था,बार बार माँ फोन कराती थी.आ जा एक बार घर ,और अब बिना देखे कैसे जियेगी !”
मैं सांस रोक लेता हूँ, क्या जवाब दूँ।निशब्द हूँ ,यह कैसी कठिनघडी ? कैसा कठोर व्यवहार का समय है भी और नहीं भी। एक जीवन चला गया अपने साथ जाने कितनों को जीवन जीते जी मारकर ! यह शोक का समय है, यह रोने का समय है, इस लड़की को गले लगाकर सांत्वना का समय है, यह ढाँढस देने का समय है। यही तो मनुष्य के मनुष्य होने का समय है।यह अंतर्मन के मरहम का समय है. यह उसकेसपनो के कांच की तरह टूटने का समय है .
समझ रहा हूँ .उसका प्यार, उसका जीवन, उसकी दुनिया अंधे कुंए में खो गई। वह मेरे से कठोर व्यवहार की अपेक्षा नहीं करेगी, पर मैं कठोर हो जाता हूँ। एक पल की भी देर किए बिना डेड बॉडी को वहां से काले प्लास्टिक बैग में शिफ्ट करने के आदेश देता हूँ। जल्दी करो! एक डॉक्टर के लिए यह अगले पेशेंट का समय है जिसे गँवाना नहीं चाहिए।
जानता हूँ लड़की उसे देखना, छूना, लिपटना सब चाहती है। वह उसका आखिरी स्पर्श याद रखना चाहती है आगे जीने के लिए। पर मैं एक डॉक्टर हूँ। यह अनुमति नहीं दे सकता।
‘नहीं! तुम एक समझदार डॉक्टर हो, जानती हो न पॉजिटिव केस में पार्थिव शरीर को केवल महानगरपालिका को ही सुपुर्द किए जाने के आदेश हैं। घर ले जाने के नहीं, सूचना दे दो, उसके घर!’यह घर जायगा तो और मुश्किलें होंगी .
मैं बाहर निकलकर रोना चाहता हूँ। लेकिन, दरवाजे पर एक और क्रिटिकल पेशेंट के आते ही कठोर होकर उसकी जगह खाली करवाता हूँ। तब तक पेशेंट को दूसरे पलंग पर लेता हूँ, लड़की के अन्दर की डॉक्टर अचानक जाग जाती है वह मेरी सहायता करने लगती है। जानता हूँ इस समय हम सब रोना चाहते हैं। लेकिन, जिंदगी सामने आ गई और रोने का समय चला गया। एक जंग ख़त्म होते-होते एक और जंग हमारे सामने थी। हमारे ही अस्पताल की हेड नर्स सिस्टर डिसूजा जिन्हें अक्सर मैं मदर डिसूजा बुलाता रहा हूँ! सिलेंडर एक तरफ करते हुए उन्हें आवाज देता हूँ उत्तर की अपेक्षा किए बिना।
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फोटो गूगल से