
हमारी अम्मा किताब से–
“मां आज चार साल हो गए, एक दिन संख्या भी फिर याद रहेगी या नहीं किसे पता है!
स्वाति तिवारी
विगत कुछ माह से एक दीवार बना ली थी मैंने अपने और अपनी स्मृतियों के बीच .जीवन मुश्किल ही नहीं असंभव लगने लगा था .कई रातें बिना सोये बीत जाती थी .स्वास्थ बिगड़ रहा था परिणाम घर की दिनचर्या को भी बिगाड़ रहा था .फिर एक दिन किसीने सलाह दी देखो उन्हें याद मत करो वे रुकी रहेंगी तुन्हें दर्द में देख कर .उन्हें शान्ति से जाने दो .तुम अपना कर्तव्य कर चुकी हो पीड़ा का कोई कारण नहीं है अब ,वे अपनी भरपूर आयुष जी कर गयी हैं ,आपके साथ रही हैं और आपके विश्वास और हिम्मत पर ही उन्होंने इतने साल निकाले .इस सलाह ने विचार दिया माँ को बंधन में रखने से मुक्ति नहीं मिलेगी मुझे उनका मार्ग खोल देना चाहिए और मैं बच्चों के पास चली गई थी उनके और मेरे बीच एक दिवार बनाकर .याद नहीं करुँगी और जीवन की तरफ देखने के विचार के साथ .अपनी व्यस्तताएं बड़ा ली .बच्चों के घर में .खाना बनाने .मिठाई बनाने .कम्यूटर पर नयी चीजें सिखने में .और धीरे धीरे नींद ने आना शुरू कर दिया था .घर में कोई फोटो नहीं लगाई .हां प्रार्थना अब भी सबसे पहले आत्मा की शान्ति की ही करती हूँ .प्रार्थनाएं भी आदत बन जाती हैं .पर कल शाम से वो दीवार अपने आप ढह गयी ,और रुका सैलाब मुझे बहा ले गया है एक बार फिर सारी रात भारी मन और दुखती आँखों से कटी .एक वर्ष यूँ ही गुजर गया जल्दी गुजर गया बस अभी वो समय है जब दस दिन की मौन समधी के बाद एक क्षण को आँखें खोली थी मुझे देखा था उन आँखों से दो बूंद बही थी और सांसों का मॉनिटर ब्लॉक हो गया था ..शाम की ६ बजी थी शायद .वो पल आकर निकल गया था जिससे मैं ताउम्र डरती रही थी ,वे चली गई थी .अनंत यात्रा पर .”मां आज चार साल हो गए, एक दिन संख्या भी फिर याद रहेगी या नहीं किसे पता है, समय को किसने बांधा है.

हर बार जिस एक भय से डरती थी , जाने कितनी मुश्किलों से अनजाने ही लड़ती रही ,हर बार जरा सी गले की खराश भी होती तो अस्पताल और घर एक कर देती थी .अपनी नौकरी में ,अपनी फेमेली लाइफ में ,मित्रों में ,लेखन में जाने कहाँ कहाँ कैसे मैनेज करती थी ,कितने उलाहने ,समझोते सब कभी बुरे नहीं लगे थे क्योंकि मैं अपने बेटी होने के दायित्व पथ पर इमानदारी से चल रही थी,सिर्फ एक ही विश्वास पर टिक कर की अभी नहीं जाने दे सकती उनको ,अभी इन्होने जीवन का सुख देखा ही नहीं है. वे हिम्मतवाली थी पर मैं कमजोर थी वे डरती नहीं थी पर मैं वो चली ना जाये इस डर से सदा डरी रहती .प्रार्थनाएं शायद अपने लिए भूल गई थी ,बस एक ही प्रार्थना होती थी उनको कुछ मत होने देना भगवान . सब सोचती हूँ तो लगता है ,अब तो रिटायर हो गई थी ना ,अब मैं उसके साथ वैसे जी सकती थी जैसे वह चाहती थी .जैसे नदी के निर्मल जल में एक छोटी सी कश्ती दूर तक और देर तक तैरती रहे कभी जल कश्ती पर गिरे और कभी कश्ती लहरों में हिचकोले खाये. पर अलग ना हो.मुझे नहीं पता उसकी सबसे बड़ी आलोचक होकर भी मैं किसी और का उसके खिलाफ एक शब्द भी क्यूँ बर्दाश नहीं कर पाती थी .मुझे यह भी नहीं पता कि दुनिया में हर बेटी का अपनी माँ से क्या एसा ही कोई बंधन होता है ?अगर हाँ तो मेरा अपनी बेटियों से उतना क्यों नहीं हैं ?और उनकी ही बेटियों का उनके साथ क्यों नहीं लगा मुझे .

पिछले १८ सालों में उनको सर्दी भी हुई होगी तो मैं बेवजह रेल के डिब्बों की तरह एक के बाद एक सारे नुस्के करने लगती ,भाप दिलाती ,मशीन हाथ में पकड ख़ड़ी हो जाती ,ये लें हल्दी अदरक का रस ,ये ले गुड अजवाइन का काड़ा,गर्म पानी की थैली .लाओ विक्स लगवा ले .ये एंटी एलर्जी . आधी रात को हल्दी अदरक का दूध ,वो सब जो माँ से ही सिखा और सुना था.

सच बताऊँ तो मैं उनकी माँ में बदल गयी थी और वो एक आज्ञाकारी बेटी में .शायद यही बदलाव मेरे भय का कारण बना रहता था भय हावी हो जाता था कहीं कुछ चूक ना जाऊं .माँ से लडूँ झगडूं कुछ भी पर वो किसी कष्ट में ना रहे ,इस दुनिया में मेरे साथ बनी रहे ,छाया भी साथ छोड़ देती है पर मैं जैसे माँ की छाया बनाना चाहती थी कि धूप का कोई टुकडा भी माँ को परेशान न करे .पर यह जानते हुए भी कि कोई अम्रर जड़ी खा कर नहीं आता ,मेरे मन में माँ के जाने की कल्पना भी जैसे डरावना सपना होती थी ,और यही वजह थी कि मैं माँ को हर बात पर टोकती ,डांटती बल्कि कई बार तो बेवजह भी उन पर बरस पड़ती ये क्यों खाया ,सारा दिन यहाँ क्यों बैठना है .मिठाई क्यों खा ली ,बस बेमतलब के भय से भयभीत ,माँ शायद यह सब समझती ही होंगी तभी तो इतना होने पर भी वो मुझे थोड़ी देर में नोर्मल लगाने लगती थी. मेरे सारे भय और बचाव के बाद माँ की जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर वे तकलीफ में रही और लकवे के अटैक के बाद बोलने से भी –.

शादी ,फंक्शन पूरी कौशिश होती जाना टल जाय ,और अगर जाना भी पड़ता तो बस गली पार भी नहीं होती और फोन पर हिदायतें देने लगती , वो भी कहती रुक जा तू इनको जाने दे. अपन गीला बेसन बना कर खा लेंगे जैसे गीला बेसन 56 भोग हो और लालच दिया जा रहा है. पापड़ का झोल बना ले बढ़िया .अब कौन और कैसे समझाय पति के परिवार साथ क्यों जाना जरुरी होता है ,लेकिन माँ को अकेले छोड़कर कहीं जाने से पहले रास्ता निकालती किसी को उनके पास घर के अंदर छोडती .किसी को उन्ही देखने को बोलकर जाती थी पर शायद सही अर्थों में जाकर भी नहीं जा पाती थी थोड़ी घर में छूट जाती थी .एक ग्लानी भाव के साथ वो अकेली है.किसी पार्टी में जैसे काम निपटाना है चलो लिफाफा दो और वापस चलो .
घर में वापसी में किसी दूकान से कुछ लेती हुई घर लौटती लो जलेबी गर्म गर्म .लेकिन देती एक छोटा सा टुकड़ा भय फिर हावी हो जाता था ,खांसी ना चलने लगे देर रात हो गयी है . अनगिनत भय के साथ स्नेह भरे किस्से हैं जो उसके होने के अहसास से भरे होते थे.इतना प्यार मैंने अपने बच्चों से भी नहीं किया पर उन्हें स्नेह नहीं उलाहन दे देती तेरे कारण कहीं जा नहीं पाती मैं .पर सच ये था कि उन्हें छोड़ कर जाना भी नहीं चाहती थी मैं .

एक दिन जब वो अचानक साल भर की मौन समाधि लेकर चली गई .तो मैं घर की चौखट लांघ बाहर भी जाना नहीं चाहती अब .तब समय नहीं होता था ,अब समय ही समय है .देर रात तक जागती थी तो वो चार बार उठ कर कह जाती बंद कर कम्प्यूटर सो अब ,थोड़ा आराम कर ,अब कोई नहीं कहता सोती क्यों नहीं ?बाहर इत्ती कच्ची केरी गिरी हैं उठवा ले अमोले बना ले .आचार डाल ले. भूट्टे मिले तो लेती आना .दाल में थोड़ी गुलाबी खटाई डाल दें खट्मीटी बनाले .कितनी भी शक्कर डाली हो चाय और दूध हमेशा फीका ही रहता .वो मुझसे वो सब करावा लेती थी जो खुद करना चाहती थी .
उम्र उसकी भी और मेरी भी बढ़ रही थी ,पर 60 की उम्र तक अपने बड़े होते का कोई अहसास नहीं था ,होता भी कैसे हर जगह तो वे बिना मांगे भी सलाह दे देती थी. समय के अभाव में सोचती तीज त्यौहार अब कम कर दूंगी ,लेकिन आप भूलेंगे कैसे? थोडा सा आटा सेंक ले आज पूनम है सत्यनारायण की पोथी ना भी पढ़ पाय तो आरती तो कर ही देना सत्यनारायण की उसमें सब अध्याय का सार है,दबे स्वर में आपके कानों तक एक सन्देश आजाता ,फिर हलवा भी बनता और पोथी भी पढ़ी जाती .शीतला माता से लेकर होली तक ,और बसंत पंचमी के केसरिया भात से लेकर शरद पूर्णिमा की खीर तक सब कर ही लेती थी मैं .इच्छा अनिच्छा के बावजूद ऊर्जा का कोई तो झरना उससे निकलता था ,जो मुझे चलायमान रखता रहा .मेरी वही ऊर्जा चली गई और मैं चलने की दवाई खाती रहती हूँ .वो ऊर्जा कभी दिखी नहीं मुझे पर अब महसूस होती है ,थी कोई दैवीय शक्ति जो मुझे जीवंत कर देती थी.

मेरी माँ पुष्पावती का जन्म धार जिले के एक छोटे से गाँव खिलेड़ी-फुलेड़ी के पटेल श्री -नारायण राव जोशी पटेल की सबसे छोटी और पांच संतानों में से एक मात्र पुत्री के रूप में नवम्बर 1933 में हुआ था .माँ से ही पता चला था उस दिन भैरव अष्टमी थी और संयोग देखिये उनका विवाह काल भैरव के पुजारी परिवार में हुआ . माँ के चार बड़े भाई थे .माँ की यह विडम्बना ही रही कि उनके माता -पिता उनके बचपन में ही चले गए थे और अपने पिताजी की लाडली मेरी बेटी का बचपन माता पिता के बिना ही बिता .लेकिन उनके लिए यह सुखद था कि वे अपने भाइयों की भी लाडली बहन रही ,घर में सबसे छोटी होने से सभी भाई उन्हें नानी बुलाते थे.यह एक तरह से उनका घरेलू नाम ही हो गया था . जिसका अर्थ था नन्ही .
माँ का बचपन मध्यप्रदेश के राजा भोज के सांस्कृतिक नगर धार में ही बिता और उनकी शिक्षा भी धार में ही हुई क्योंकि धार स्टेट में उनके पिताजी की नौकरी थी. वे लोग गाँव से धार आकर रहने लगे थे .14 साल की उम्र में माँ का विवाह धार स्टेट में आबकारी इंस्पेक्टर के तीसरे पुत्र मेरे पिताजी श्री दीनानाथ व्यास से हो गया था .उनका विवाह उनकी भाभी ने अपने मायके के घर के सामने रहने वाले सजातीय परिवार के होनहार ,स्मार्ट और सुदर्शन मेरे पिता से तय करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .चार भाइयों की बहन मेरी माँ जब ससुराल आई तो यहाँ भी चार भाइयों का परिवार था .
मेरी दादाजी के घर के पास ही मेरी माँ के एक शिक्षक जिन्हें माँ डबराल सर बताती थी वे रहते थे .उन्होंने मेरी दादी से कहा था कि उनकी यह बहू बहुत होनहार और तेजस्वी है ,इसकी पढ़ाई मत रोकना .मेरे पिता स्त्री शिक्षा के पक्षधर थे ,उन्होंने माँ को रेग्युलर स्कूल जाकर पढ़ने के लिए ना केवल प्रोत्साहित किया ,बल्कि स्वयम उन्हें ट्यूशन भी देते थे और इस तरह सातवी क्लास में पढ़नेवाली एक विवाहित लड़की ने संयुक्त परिवार में रहते हुए घर संसार के साथ अपनी शिक्षा भी पूरी की .वे हमारे ब्राह्मण समाज की पहली स्नातक महिला बनी .
पिता ने माँ को उनकी इच्छा अनुसार उन्हें स्वतंत्रता दी. वे बताती थी कि उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महिला शाखा में भी उन दिनों भागीदारी की थी और लेजियम व डम्बल के अलावा लाठी भाजना भी वहीँ सिखा था .मुझे ठीक से याद नहीं लेकिन माँ ने एक बार बताया था कि जिस समिति में जाती थी उसे संघ का महिला फ्रंट समझा जाता है, हालांकि समिति एक समानांतर संगठन थी जो राष्ट्र निर्माण का वही काम कर रहा है जैसा कि संघ शुरुआत से करता आ रहा था .यह उन दिनों की बात है जब देश आजाद नहीं हुआ था .
हमारे शहर धार के रास मंडल के पैतृक निवास पर मेरे पिताजी का एक बैठक कक्ष था जो उनका स्टडी रूम था .जो हमारे उस निवास के रसोई घर के ठीक ऊपर मेरे पिताजी द्वारा बनवाया गया था .मैंने वहीँ पिताजी की एक विशाल समृद्ध लाइब्रेरी देखी थी उसी में कुछ गांधी पर पुस्तकें देखी थी जिन पर लिखा था श्रीमती पुष्पावती व्यास को वाद विवाद प्रतियोगिता में प्रथम आने पर पुरस्कार स्वरूप .संगीत के विशारद में प्रथम आने पर पुरस्कार स्वरूप भेंट . माँ कई बार अपने उन दिनों को याद किया करती थी ,और बताते हुए उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक और प्रसन्नता देखी थी मैंने ,लेकिन उनके बताये किस्सों को तब हम मजाक में उड़ा दिया करते थे .लाठी उठाती भी कैसे होंगी ?चलाना तो दूर की बात .लेकिन वे कहती मानो ना मानो .लेकिन वह सच था क्योंकि एक पुस्तक में एक सर्टिफिकेट मैंने इसी विषयक रखा देखा था .
सुबह का खाना बनाकर स्कूल जानेवाली वे जब शाम को घर आती तो बताती थी कि उनकी जेठानी जो शाम का खाना बनाती थी वे सारे दिन के बर्तन आँगन में बनी बर्तन धोने की मोरी में ढेर लगा कर रखती ,आएगी तो वह मान्जेगी . उन दिनों वायल की साड़ियाँ चलन में थी .माँ अपनी वायल की साडी उतार कर घर की साडी बदलती और सबसे पहले उन बर्तनों के ढेर को निपटाती .इस तरह एक स्त्री कैसे संघर्षों के बाद भी अपना पढ़ाई का रास्ता बना लेती है .
स्वतंत्रता आन्दोलन के चलते मेरे दादाजी ने अपनी नौकरी छोड़ दी थी .और जिस घर में कभी राजा का दान दिया हुआ हाथी पलता था हमारा परिवार “हथ्थीवाला” कहलाता था . एक समय मेरी दादी के केश विन्यास उनकी सेविका बनाती थी वहां आर्थिक तंगी आ गई थी .इसीलिए बहुत कम उम्र में पिताजी को भी नौकरी और ट्यूशन करनी पड़ी थी ,अब घर खर्च में माँ भी हिस्सेदार बन गई थी ,उन दिनों हाई स्कूल के बाद ही माँ को सरकारी शिक्षिका की नौकरी लग गई थी . माँ ने नौकरी ,बच्चे ,संयुक्त परिवार का दायित्व निभाते हुए अपनी आगे की शिक्षा भी पूर्ण की .यह सब घटनाक्रम मेरे जन्म से पहले के हैं .मैंने अपने पिताजी जैसा विद्वान .बहादुर ,हिम्मती ,स्नेही और आदर्श व्यक्तित्व बहुत कम लोगों में देखा .वे जितने तेज तर्रार और ओजस्वी थे .माँ उतनी ही शांत धैर्यवान और सहनशील थी , दादी- दादाजी और मेरे पिता उग्र और गर्म मिजाज स्वाभिमानी थे,लेकिन उनके स्वभाव के ठीक विपरीत माँ सहनशील ,शांत और धीर गंभीर थी .
पिताजी अत्यंत संवेशनशील और भावुक भी थे ,अक्सर वे अपना वेतन किसी ट्यूशन पढ़नेवाले की परीक्षा फीस भरने में खर्च कर आते और माँ उन्हें एक शब्द भी नहीं कहती कि अब घर कैसे चलेगा .वो अपनी हिकमत अमली से सब चला लेती थी .चार बेटियों और एक बेटे की माँ बनी मेरी माँ के हिस्से में तकलीफों का दौर भी कम नहीं रहा .अपनी दूसरी पुत्री के जन्म के बाद वे स्वास्थ्य की गंभीर समस्या से उलझ गई और जीवन को बचाने के तमाम प्रयासों में एक प्रयास था उनके एक लंग्स को काट कर अलग कर देना . कंधे की पुरी हड्डी के साथ उनका एक लंग्स भी निकाल दिया गया था .फिर उन्हें सेनिटोरियम में रखा गया अच्छी आबोहवा के लिए . आज कल्पना करती हूँ तो मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं .दो बेटियों की माँ अपने बच्चों से दूर कैसे रही होगी .बच्चे दादी और पिताजी ने मिल कर संभाले .पिताजी हर पन्द्रह दिन में बस से उस शहर जाते बड़ी बेटी की उंगली पकड कर फिर जाने कितने किलोमीटर पैदल चलते दूर एक पहाड़ी पर बने उस सैनिटोरियम तक अपनी पत्नी से मिलने और बेटी को माँ से मिलवाने .कई साल पहले माँ की पेटी में पिताजी के ख़त मुझे मिले थे .जो वे हर हफ्ते अपनी पत्नी को लिखा करते थे .उनमें घर का बच्चों का वर्णन था .वे माँ को छोटी बेटी के बारे में लिखते थी . मुन्ना चलने लगी है अब .आज मुन्ना ने माँ बोला जैसी बातें होती थी . माँ इतनी अनुशासित और संस्कारी थी कि वे अपने डॉक्टर की बेटी ही हो गई थी .और वहां भी उनकी बुद्धिमानी का परचम लहराने लगा था . डॉक्टर बोर्दिया का वे कई बार जिक्र भी करती थी. पिता विहीन एक स्त्री शायद उन डॉक्टर साहब में वही छबी देखती थी .
वे स्वस्थ हुई घर आई और उसके कुछ साल बाद मेरा जन्म हुआ .माँ ही बताती थी कि मैं हुई तो तीसरी कन्या थी पर मेरी दादी ने मुझे गोद में लेते हुए कहा था छोरी हुई तो क्या ,देखों कैसी मलाई में गुथी मैदे की पिंडी जैसी हैं .पिताजी ने मेरा नाम बहुत पहले ही सोच रखा था ,मेरी बेटी नक्षत्र होगी और स्वाति नाम एक से नामों से अलग हो गया .माँ कहती थी तेरा चेहरा देख कर दादी इतनी खुश थी कि गोद से दे ही नहीं रही थी वापस . हर माँ की तरह मेरी माँ को भी अपनी बच्चों पर बड़ा गर्व था .माँ नौकरी करती कामकाजी महिला थी लेकिन कभी हमारे घर खाना किसी और ने नहीं बनाया माँ ही बनाती थी जब तक हम बेटियां बड़ी नहीं हो गई . माँ का खाना अद्भुत होता था ,ना कही तेल ज्यादा हुआ ना नमक .मुझे जो कुछ आता है लगभग सभी माँ से ही सिखा है चाहे फिर वे अचार मसाले हों चाहे मिठाई .आज सोचती हूँ तो लगता है वो केवल माँ ही होती है जो हर त्यौहार ,हर व्रत ,हर पर्व पर अपनी व्यंजन कला से कैसे घर के बजट अनुसार सब कुछ मैनेज कर लेती है .माँ कुछ खाना तो इतना स्वादिष्ट बनाती थी जैसे अरबी के पत्ते ,थाली पीठ ,चीले,बेसन बर्फी .सादा फीका दाल चावल .मेरे बच्चे आज तक नानी वाले दाल चावल बनाओ बोलते हैं .
माँ ने हमें अनजाने में ही सब कुछ बनाना सिखाया .घर के मसाले ,पापड़ .हर तरह का अचार .खाना सब कुछ .दर असल एक माँ जब खुद बनाती है तो बच्चे अपने आप वो सब सिख लेते हैं .माँ को कुछ अलग से नहीं सिखाना पड़ता .तब नहीं जानते थे लेकिन अब जब माँ चली गई तब समझ में आया माँ ईश्वर की सबसे अनुपम रचना है .उसका स्थान भगवान भी नहीं ले सकते .
भगवान ने मेरी माँ को बीमारी के बाद नया जन्म दिया था .एक बहुत ही केयरिंग पति .चार योग्य बेटियां और एक बहुत ही इंटेलिजेंट बेटा.मायेक में चार भाई और ससुराल में भी देवर जेठ का परिवार .सरकारी नौकरी सब कुछ .माँ ने ससुराल में रह कर स्नातक की डिग्री ली .फिर साहित्य रत्न किया था .माँ साहित्य रत्न की परीक्षा का एक किस्सा सुनाती थी . साहित्य रत्न माँ और पिताजी ने साथ में किया .पिताजी माँ को पढ़ाते थे और पिताजी को सब कुछ आता था .लेकिन जब दोनों परीक्षा हाल में आगे पीछे परीक्षा दे रहे थे ,तब माँ बताती थी तेरे पापा को खूब जमा जमा कर सुन्दर हेंडराइटिंग में लिखते रहे टाइम पूरा हो गया पेपर पूरा नहीं लिख पाए तो मेरे से कम नम्बर आये और मैंने फटा फट सारे प्रश्न हल कर लिए .
माँ बहुत इंटेलिजेंट थी ,हमेशा शांत और चुपचाप रहने वाली माँ बहुत अच्छी वक्ता भी थी यह मुझे बहुत बाद में पता चला जब एक कार्यक्रम में मेरी सखियों ने उन्हें मुख्य अतिथि बनाया तो उन्होंने अचानक आये इस दायित्व को इतनी सुन्दर तरीके से संपन्न किया और जो उद्बोधन दिया वो इतना विद्वान भरा उद्बोधन था कि मुझे लगा मेरे अन्दर जो वक्ता का गुण आया है वह पिता से तो आया ही लेकिन शायद माँ से भी आया होगा .माँ स्कूल की प्रधान अध्यापक थी एक संस्था की प्रमुख लेकिन हमने उनकी इस बात को कभी प्राथमिकता नहीं दी ,बाद में लगा उनमे बहुत कुछ था जो अवसरों के अभाव में रुका रहा . उन्हें मेरे साथ हमारी किटी में जाना बहुत पसंद था ,सूचना मिलने के साथ ही वे यह चाहती थी कि बस मैं एक बार भी पूछ लूँ आप को चलाना हैं और बस मेरे बोलने के साथ ही वे मन ही मन गीत गुनगुनाती थी शायद .और किटी में वे गीत सुनाने का पूछ कर इतना सुमधुर गाती कई गीत सुनाती .मुझे आज भी आश्चर्य है कि उन्हें इतने गीत कैसे याद हैं ,कहाँ से याद है .कब याद किये .और उम्र के इस पड़ाव पर जब लोगों को नाम तक याद नहीं रहते उन्हें इतने क्लासिकल गीत पूरे याद हैं लय ,ताल ,सुर सहित . 90 वर्ष की उम्र में भी उन्हें कितना याद था .कितने किस्से ,रिश्ते ,गीत सब कुछ . सोचती हूँ मुझे उनका यह टैलेंट बहुत बाद में पता चला काश उन्हें अवसर मिले होते वे शायद आकाशवाणी या मंच पर भी गाती .उन्हें भजन , गीता दत्त के गाने इत्यादि वे गाती थी .संस्कृत पर भी उनका गजब का कमांड था वे मन्त्र ,गणेश अथर्वशीर्ष मुखाग्र याद था .हमारे घर में पिताजी थे तब वे ही पूजा करते थे लेकिन सारी तैयारी माँ करती थी .पिताजी के जाने के बाद माँ पूजा करती थी और उन्हें भगवान् को ताजे फूल चढाने और फूलों से मंदिर को खूब सजाने में अच्छा लगता अक्सर हमारी बगीचे के फूल तोड़ने को लेकर बहस हो जाती थी .पर अब जब मैं नए घर में कई बार पुष्पों के अभाव में पूजा करती हूँ तब मुझे लगता है माँ कितना सही थी ,मंदिर और भगवान् इन्फेक्ट पूजा भी अधूरी लगती है .हमारे संस्कारों में और विधान में यह कितना सुन्दर और पवित्र भाव है .माँ को पूजा पाठ के बाद किसी आध्यात्मिक चेनल में कोई रूचि थी वे यंग जनरेशन के कार्यक्रम जैसे इंडिया टेलेंट ,नाच बलिये ,कौन बनेगा करोड़पति ,भाभीजी घर पर हैं ,अहिल्या .आंबेडकर जैसे धारावाहिक देखना पसंद करती थी.देर रात लगभग ११ बजे तक देखती थी .कई बार मैं चिढ जाती थी सोना नहीं है क्या . लेकिन अब जब मैं देर तक सीरियल देखती हूँ तब पता चला क्यों देखती थी ,मेरे पास अपना घर है ,पति साथ हैं लिखने पढ़ने और पचासों काम होने के बाद भी बच्चे बाहर हैं ,रिटायरमेंट है तो एक अनकहा खालीपन है घर में जिससे बचने के लिए मैं लिखना पढना छोड़ टीवी सीरियल या फिल्म देखती रहती हूँ ,ना भी देखूँ तो चलाये रखती हूँ ,अचानक यह बदलाव मुझे भी अचम्भित करता है सोचने पर समझ में आया कि आवाजें जो आती रहती है अलग अलग पात्रों की वे घर में लोगों की उपस्थिति और मन में भी लोगो की उपस्थिति बनाए रखते हैं ,तो मम्मी तो जीवन में कितनी अकेली हो गयी थी ,उनके जीवन से केवल रिटायरमेंट से या पापा के जाने के बाद का ही खालीपन नहीं आया था ,वे अपना बसाबसाया घर भी एक ताले से बंद कर केवल एक बेग कपडे लेकर मेरे साथ मेरे घर मेरे कहने से आ गयी थी क्या यह खालीपन उन्हें नहीं सालता होगा .पांच बच्चों में से अचानक एक दिन उनका इकलोता 11 बेटा चला गया था क्या जीवन भर का वो सन्नाटा उन्हें नहीं सालता होगा .कैसा भांय भायं करता होगा दिलो दिमाग में .क्या वे अपनी सबसे ज्यादा होनहार बेटी के केवल तीस वर्ष की उम्र में चले जाने के बाद एक माँ अपने ही जीवन में कितनी अनकही तकलीफ से गुजरती होंगी ,जब बेटियां अपनी अपनी गृहस्थी में व्यस्त थी ,माँ टीवी के साथ उन सीरियल के चक्करों में अपने वो तनाव वो सन्नाटे भूल जाती होंगी जो नींद उड़ा देते हैं . थक कर नींद आ जाती होगी .माँ कहीं गलत नहीं थी .वे इतनी शांत स्वभाव की और इतनी सहनशील कैसे थी ,उन्हें कभी किसी के व्यवहार से ,कभी किसी की उपेक्षा से कोई शिकायत नहीं होती थी ,कितनी भी बीमार हो डॉ.तक के पूछने पर मुस्कुरा कर कह देती थी एक दम अच्छी हूँ कहना भी मेरे लिए अचम्भित करनेवाला होता था .सांस ले नहीं पा रही होती और कहती थी अच्छी हू ,कहाँ से लाती थी वो इतनी सहनशक्ति .इतनी सकारात्मकता इतनी की उन्होंने कभी भी ये तो कहा ही नहीं की ये नहीं हो सकता या ये नहीं करना है .या कैसे होगा .हमेशा सब अच्छा ही होगा शब्द ही उनकी डिक्शनरी में था .अपने दो दो बच्चे खो देने के बाद भी वे कभी ये नहीं दर्शाती थी की जीवन की इस मार से अन्दर से टूट गई हैं ,उन्होंने अपनी बेटियों के जीवन में सकारात्मकता भरने के लिए अपने दुःख अपने अन्दर ही कहीं दबा कर रख दिए थे .उन्हें मेरी दोस्त ,मेरी सहेलिया सब बहुत पसंद थी ,वे जब भी मिलती माँ को लगता था जैसे उनकी ही सखियाँ मिलने आई हैं .उन्हें देख कर लगता था शादी के बाद उम्र के एक पड़ाव पर जब बच्चे अपने अपने परिवार में व्यस्त हो जाते हैं ,घर भी छूट जाता है ,तब भी कुछ मित्र होने चाहिए. जो जीवन को सकारात्मक बनाए रखते हैं .
माँ ने अपनी नौकरी में भी बहुत संघर्ष किया,,सरकारी नौकरी में मेरे पिताजी और माँ अलग अलग स्थानों पर ट्रांसवर होते रहने से अलग अलग रहते रहे .मम्मी बच्चों के साथ छोटे छोटे शहर में रहीं और मेरे पिताजी ने जीवन का जो संघर्ष देखा है वह तो आज कल्पना में भी नहीं हो सकते लेकिन उन्होंने दोनों ने ही अपने बच्चों को हमेशा बड़े सपने दिए ,सपनों के साकार करने के होसले और उड़ान दी ,मेरे पिताजी ने माँ को सातवीं क्लास से लेकर स्नातक और साहित्य रत्न तक शिक्षा के लिए सपोर्ट किया .और माँ ने अपनी बेटियों के लिए उच्चतम शिक्षा दी .माँ को अपनी काबिल बेटियों पर बहुत गर्व था .जब भी कभी उन्हें किसी को बताना होता तो उनके चहरे पर एक गर्व भरी चमक आ जाती है बड़ी चमकदार आँखों से कहती मेरी बेटी और उसकी बेटी राष्ट्रपति सम्मान प्राप्त है .माँ को अपने दामाद पर भी बड़ा गर्व था .और अपने नाती अपनी नातिन सभी को वे कहती थी कि ये सब मेरे मुकुट में लगे चाँद सितारे हैं .माँ जो एक दम सरल सीधी और शांत स्वभाव की थी लेकिन उनके अन्दर हमेशा एक जिज्ञासू लड़की को बैठे देखा है मैंने जो कभी कभी अचानक बाहर आ जाती थी उन्हें सब जगह चलना होता था जहाँ हम घूमने जाते .उन्हें गाडी में बैठ कर बाजार जाना और गाडी में ही बैठ कर बाजार की रौनक देखना .आइसक्रीम की छोटी कटोरी खाना सब पसंद था लेकिन वही संकोच बना रहता तुम लेलो मैं थोडा सा चख खा लूंगी .प्फोतो खिंचवाने का भी और तुरंत देखने भी बहुत पसंद था ,लेकिन अब एल्बम देखती हूँ तो याद आता है ये तो हमने उन्हें दिखाई भी नहीं थी .कभी कभी हम बेवजह कुछ इसी अनकही गलतियाँ कर देते हैं जिनकी भरपाई नहीं हो सकती .माँ जिन्हें फोटो देखना पसंद था,कई बार उन्हें हम फोटो तक नहीं दिखा पाए .माँ अक्सर कहती थी देख मेरे वीडियो बना ले बाद में तू रोएगी मेरी याद में .सच में आज वही हो रहा है याद और बात सब जैसे किसी फिल्म की रील जैसी चलती है और दिल चाहता है माँ फिर से आ जाए कहीं से .और वो सब जो हमसे छूट गया वो फिर से जी लें . गुजरा समय वापस कहाँ आता है .माँ का अचानक चले जाना जीवन में देर तक और दूर तक फैला केवल एक सन्नाटा भर रह जाता है .गुन्जंती है माँ की वह भोलीभाली बच्चों सी हंसी ,वो दूध रोटी में ज्यादा शक्कर की बच्चों सी जिद ,मीठा खाने की उनकी नन्ही सी इच्छा .सब्जीमार्केट तक गाडी में चलने की चाह सब कुछ मेरे चारो तरफ याद बनकर मन की हूक बन जाता है .माँ उस समय में जब लड़कियां तेरह साल की उम्र में ब्याह दी जाती थी ,माँ ने वावजूद इसके पिता के सपोर्ट और सहयोग से स्नातक और स्नातकोत्तर के समकक्ष डिग्री हासिल की .हेड मिस्ट्रेस के पद पर ४० साल नौकरी की .अपनी बेटियों को उच्चतम शिक्षा दी ,संस्कार दिए .वो माँ मेरा गर्व थी .अगर मुझे अगले सात जन्म लेना पड़े तो ईश्वर मुझे यही माँ मिले .
डॉ .स्वाति तिवारी
इंदौर लेखिका संघ का जोरदार आगाज,30 वर्ष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति को लेकर खुला स्त्री का अभिनव आँगन





