असंवेदनशील समाज और ‘सुल्ली’ और ‘बुल्ली’ का दुष्चक्र

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इंटरनेट के विस्तार के साथ-साथ इसकी उपयोगिता से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके समांतर साइबर दुरुपयोग के जितने स्तर सामने आ रहे हैं, वे अपराधों का एक नया संजाल खड़ा कर रहे हैं। विज्ञान ने तरक़्क़ी तो बहुत कर ली है पर विज्ञान वरदान साबितLl होगा या अभिशाप! यह हमें ही तय करना है। विडंबना देखिए जिस तकनीकी का इजात मानव की भलाई के लिए किया गया था आज वही नफ़रत का ज़रिया बन गया है। बाजारवाद के इस दौर में हर चीज़ बिकाऊ हो गई है और शायद इसी मानसिकता ने ‘बुल्ली बाई’ और ‘सुल्ली डील’ जैसे ऐप को इज़ाद कर लिया। लेकिन, हमारी सहनशीलता देखिए कि इस अनैतिक अपराध पर भी हम खामोश बैठे है। हमारी सारी संवेदनाएं मर गई है। हमे तो बस धर्म के नाम पर राजनीति करनी है।

कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम कहा था। वर्तमान दौर में सोशल मीडिया ‘अफ़ीम’ का काम कर रही है। ऐसे में आज भले हमारे सम्पर्क का दायरा बढ़ गया है, लेकिन दिलों में नफ़रत की खाई पनपती जा रही है और कहीं न कहीं सोशल मीडिया नफ़रत फैलाने का जरिया बनता जा रहा हैं। इतना ही नहीं यहां कई बार किसी अपराध की प्रकृति ऐसी होती है, जिसके जिम्मेदार लोगों को तो कानून के कठघरे में लाया जा सकता है, लेकिन उससे सामाजिकता की व्यापक छवि को जो नुकसान पहुंचता है, उसकी भरपाई आसान नहीं होती। वर्तमान दौर में इंसानियत को भी धर्म के आधार पर बांटने का राजनीतिक खेल खेला जा रहा है। पर हमें इससे भला कहाँ फर्क पड़ने वाला है? हमें तो धर्म के नाम पर राजनीति करने की आदत सी हो गई है। इसीलिए तो अब विरोध भी धर्म देखकर किया जाने लगा है। पर क्या इंसानियत धर्म से बढ़कर हो गई है? हम तो वसुधैव कुटुम्बकम की परंपरा को मानने वाले लोग है जहां हर जीव पर दया की जाती है। फिर कैसे किसी धर्म विशेष की महिलाओं पर अन्याय होता देख हमारा सभ्य समाज अंधा हो गया है। कहां गई वे महिलाएं जो आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने की बड़ी बड़ी ढींगे हांकती है। जो विपक्ष बिना मुद्दे के भी शोर मचाते नहीं थकता था वह क्यों खामश हो गया है! हर छोटी बड़ी बात में जो न्यायालय स्वयं संज्ञान ले लेता है आज वह भी मानो अपनी आंखों पर पट्टी बांध रहा हो। सवाल कई है पर सभी की जुबां मौन है और कई बार इसी मौन को ‘स्वीकृति’ का प्रतीक मान लिया जाता है। ऐसे में इन मुद्दों पर मुखर होने की जरूरत है और यह समझने की आवश्यकता कि आख़िर क्यों पढ़े-लिखें युवा भी ऐसे कामों में संलिप्त हो रहें हैं। वैसे देखा जाए तो यह खामोशी महिलाओं के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन गई है। जुर्म करना अपराध है लेकिन जुर्म होते देख कर खामोश हो जाना भी बड़ा अपराध है।

कल्पना कीजिए, एक महिला पर क्या बीती होगी जब नए वर्ष की सुबह में उस महिला ने खुद को नीलामी की वस्तु के रूप में देखा होगा। जहां उसकी बोली लगाई जा रही है, उस पर गंदे गंदे कमेंट किये जा रहे है। सोशल मीडिया पर उसकी क़ीमत तय की जा रही है। यह कोई कल्पना नहीं बल्कि वर्तमान दौर की सच्चाई है। जिसमें ‘बुल्ली बाई’ और ‘सुल्ली डील’ नामक ऐप के द्वारा 100 से अधिक मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरों को नीलामी के लिए डाल दिया गया। उनकी बोली लगाई जा रही थी। इस ऐप में अभिनेत्री शबाना आज़मी से लेकर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की पत्नी के साथ ही कई जानी मानी पत्रकार और राजनेता की तस्वीर भी शामिल थी। ताज्जुब की बात है कि पिछले छह महीने में यह दूसरी बार है जब इस तरह की घटना को अंजाम दिया गया है। इससे पहले ‘सुल्ली डील’ में भी इसी तरह महिलाओ को टारगेट किया गया था। वहीं अब इसे महज संयोग कहें या साज़िश सवाल तो यह उठता है कि यह ऐप तब लाया गया जब पंजाब, उत्तरप्रदेश व उत्तराखंड जैसे राज्यों में चुनाव का माहौल है। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कहीं चुनाव का माहौल बिगाड़ने की यह साज़िश तो नहीं? क्योंकि सुल्ली डील को भी तभी लांच किया गया था जब पश्चिम बंगाल में चुनाव चरम पर था।

वहीं आंकड़ों के दृष्टिकोण से जब हम सोशल मीडिया यानी इंटरनेट और महिलाओं को देखते हैं। फिर भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के मुताबिक मार्च 2021 के अंत तक भारत में लगभग 82.5 करोड़ इंटरनेट यूजर थे। उनमें से अधिकांश वास्तविक हैं, जिनमें शरारती तत्वों की संख्या बहुत कम है। लेकिन ऐसे शरारती तत्वों में राष्ट्र, उसकी राजनीति, अर्थव्यवस्था और नागरिकों के व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में तबाही मचाने की घातक क्षमता होती है। इतना ही नहीं ये सामाजिक ताने-बाने को ध्वस्त करने के लिए दबाव डाल सकते हैं और ऐसा ही कुछ ओपन-सोर्स ऐप बुल्ली बाई में भी देखा जा सकता है, जिसे “मुस्लिम महिलाओं की नीलामी” के लिए वेब प्लेटफॉर्म गिटहब पर होस्ट किया गया।

इतना ही नहीं यह हमारे समाज और व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है कि साइबर ब्लैकमेलिंग, इंटरनेट पर परेशान करना और डराना-धमकाना एक बहुत बड़ा मुद्दा है, जिससे महिलाओं और उनके परिवारों को काफी तनाव होता है और अब ये बातें सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं है या किसी विशेष जाति या समुदाय के लिए विशिष्ट भी नहीं। एनसीआरबी के आंकड़ों की ही बात करें तो 2020 के दौरान भारत में कुल साइबर अपराध की संख्या 50,035 थी और विशेष रूप से महिलाओं के खिलाफ अपराध केवल 10,405 थे। मालूम हो कि ये आंकड़े जमीनी हकीकत का एक अंश मात्र हैं और कई बार महिलाएं समाज में बदनामी के डर से भी शिकायत नहीं करती हैं, क्योंकि मर्दवादी भारतीय समाज में पीड़ित महिलाओं पर ही इल्जाम मढ़ दिया जाता है।

इसके अलावा देखें तो इस बार के ‘बुल्ली बाई’ ऐप ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि अपराध की कोई उम्र नहीं होती और अपराध करने वाले की कोई जाति नहीं। इस ऐप में भी जिस तरह से 18-21 साल के युवा विद्यार्थियों के नाम सामने आ रहें हैं। वह यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि आख़िर हमारे देश के नौजवान किस राह पर बढ़ रहे हैं और इसके पीछे कारण क्या? इसकी तह तक जाना आज के वक्त की जरूरत है। आख़िर कोई पढा-लिखा युवा दिमागी रूप से जहरीला बन रहा तो उसके लिए जिम्मेदार धर्म है या व्यवस्था! इसकी स्पष्ट रूपरेखा भी अब तय होनी चाहिए। क्योंकि, यूं ही कोई रास्ता तो भटकता नहीं और अगर हम यह मानकर इस बार भी बैठ गए कि अभी बोली तो मुस्लिम महिलाओं की लगी है हमें क्या! तो यह एक जिम्मेदार समाज का सबसे बड़ा नकारापन होगा। क्योंकि, ऐसी परिस्थियां धर्म और मजहब नहीं देखती। वहीं इस मामले में एक पहलू यह है कि किसी ऐप के जरिए महिलाओं को अपमानित करने जैसे अपराधों के पीछे जो प्रवृत्ति काम करती है, वह एक जटिल समस्या है और यह समझना मुश्किल नहीं है कि समुदाय विशेष की महिलाओं को निशाना बना कर उन्हें अपमानित करने, उनका भयादोहन करने के पीछे मुख्य रूप से सांप्रदायिक नफरत की भावना काम करती है।

इससे एक पूरे समुदाय और खासकर महिलाओं के भीतर अपनी स्थिति को लेकर कैसी भावना पैदा होती होगी, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसी हरकतों से चौतरफा नुकसान के सिवा और क्या हासिल होगा? यह हम और आप सभी समझ सकते हैं और ऐसे अपराध में सच यह भी है कि इस तरह का अपराध करने वाले लोग न्यूनतम मानवीय संवेदनाओं से भी दूर होते हैं और प्रथम दृष्टया इनके निशाने पर किसी खास समुदाय की महिलाएं हो सकती हैं, लेकिन आखिरकार ये सभी महिलाओं के खिलाफ कुंठा से भरे होते हैं। साइबर संसार के विस्तृत होते दायरे में ऐसे अपराधियों की गतिविधियों पर तत्काल लगाम नहीं लगाई गई तो आने वाले वक्त में डिजिटल दुनिया को लेकर एक खास तरह का असुरक्षाबोध जोर पकड़ेगा।

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सोनम लववंशी

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर होने के साथ महिलाओं और सामाजिक मुद्दों की बेबाक लेखिका है। उन्होंने पत्रकारिता के कई संस्थानों में कार्य किया है।