
सत्ता का नया सामाजिक समीकरण: सत्ता में क्यों सिमट रहा सवर्ण प्रतिनिधित्व?
वरिष्ठ पत्रकार के के झा की विशेष रिपोर्ट
पटना। बिहार की नवगठित मंत्रिपरिषद का विस्तार एक बार फिर यह साबित करता है कि राज्य की राजनीति का केंद्रीय अक्ष अब पूरी तरह जातीय सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमता है। मुख्यमंत्री के नेतृत्व में हुए इस विस्तार में कुल 31 मंत्रियों को शामिल किया गया है, जिनमें भाजपा, जदयू, लोजपा(रामविलास), हम और आरएलएम के प्रतिनिधियों को स्थान मिला है।
यदि जातिगत आधार पर इस मंत्रिमंडल का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि सत्ता संतुलन साधने के लिए पिछड़ा, अति पिछड़ा और अनुसूचित जाति वर्गों को प्राथमिकता दी गई है, जबकि ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियों की संख्या दिखने में सम्मानजनक होने के बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित दिखाई देता है।
जातिगत प्रतिनिधित्व का गणित
31 सदस्यीय मंत्रिमंडल में जातिवार स्थिति इस प्रकार है—
ब्राह्मण: 2 (मिथलेश तिवारी, नीतीश मिश्रा)
राजपूत: 4 (संजय टाइगर, श्रेयसी सिंह, लेसी सिंह, संजय सिंह)
भूमिहार: 2 (विजय कुमार सिन्हा, ई कुमार शैलेन्द्र)
अन्य सवर्ण (कायस्थ आदि): 0
कुल सवर्ण: 8
पिछड़ा वर्ग (OBC): 8 (यादव, कुर्मी, कुशवाहा, कलवार, सूड़ी आदि)
अति पिछड़ा वर्ग (EBC): 7 (मल्लाह, कानू, चंद्रवंशी, तेली, धानुक, गंगोता आदि)
अनुसूचित जाति (SC): 7 (पासवान, रविदास, मुसहर, पासी)
मुस्लिम:1 (जमा खान)
अनुसूचित जनजाति (ST): 0
यह आंकड़ा साफ दर्शाता है कि बिहार की राजनीति में आज भी ओबीसी, अति पिछड़ा और दलित वोट बैंक सत्ता निर्माण की धुरी बने हुए हैं।

ब्राह्मण और सवर्ण क्यों दिख रहे हैं हाशिए पर?
यह प्रश्न अक्सर उठता है कि शिक्षा, प्रशासनिक दक्षता, वैचारिक नेतृत्व और सामाजिक प्रभाव में अग्रणी माने जाने वाले ब्राह्मण एवं अन्य सवर्ण वर्ग राजनीतिक प्रतिनिधित्व में अपेक्षाकृत सीमित क्यों होते जा रहे हैं।
इसके पीछे कई तथ्यात्मक कारण हैं— पहला, बिहार की चुनावी राजनीति अब पूरी तरह जनसंख्या आधारित सामाजिक इंजीनियरिंग पर टिकी है। जिन जातीय समूहों की संख्या अधिक है, राजनीतिक दल उन्हें अधिक प्रतिनिधित्व देकर चुनावी लाभ साधना चाहते हैं।
दूसरा, सवर्ण मतदाता अपेक्षाकृत बिखरे हुए हैं और अधिकांशतः वैचारिक या दल आधारित मतदान करते हैं, जबकि पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग अधिक संगठित जातीय लामबंदी दिखाता है।
तीसरा, मंडल राजनीति के बाद से बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति ने पिछड़े वर्गों को सत्ता संरचना के केंद्र में ला दिया। इसका असर आज भी कायम है।
चौथा, ब्राह्मण समाज बौद्धिक नेतृत्व तो देता है, लेकिन जमीनी स्तर पर सामूहिक राजनीतिक दबाव समूह के रूप में उतना सक्रिय नहीं दिखता।
यही कारण है कि देश के सबसे प्रबुद्ध वर्गों में गिने जाने के बावजूद ब्राह्मण और अन्य सवर्ण आज सत्ता समीकरण में संख्या के हिसाब से सीमित हिस्सेदारी पाते हैं।
क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व: मिथिलांचल, कोशी और सीमांचल को कितना मिला स्थान?
मिथिलांचल: नीतीश मिश्रा, मिथलेश तिवारी, रत्नेश सदा जैसे चेहरों के माध्यम से मिथिलांचल को संतुलित प्रतिनिधित्व मिला है।
कोशी क्षेत्र: लेसी सिंह, बुलो मंडल और शीला मंडल जैसे नेताओं की मौजूदगी से कोशी क्षेत्र की भागीदारी मजबूत दिखती है।
सीमांचल: जमा खान और कुछ अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों से आने वाले नेताओं को स्थान देकर सीमांचल को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व दिया गया है।
मगध एवं शाहाबाद: विजय सिन्हा, रामकृपाल यादव, संतोष सुमन जैसे नाम इस क्षेत्र की मजबूत उपस्थिति दर्शाते हैं।
तिरहुत और सारण क्षेत्र: यहां से भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया है, जिससे उत्तर बिहार की राजनीतिक हिस्सेदारी सुनिश्चित हुई है।
कुल मिलाकर मंत्रिमंडल में क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश दिखती है, हालांकि राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि मिथिलांचल को उसकी जनसंख्या और राजनीतिक प्रभाव के अनुपात में अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए था।
साफ संदेश
बिहार कैबिनेट विस्तार का यह स्वरूप स्पष्ट संकेत देता है कि 2026 विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए ने जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की व्यापक रणनीति अपनाई है।
सवर्णों को सम्मानजनक उपस्थिति देकर संदेश देने की कोशिश हुई है, लेकिन असली राजनीतिक केंद्र अब भी पिछड़ा, अति पिछड़ा और दलित वर्ग ही हैं।
बिहार की राजनीति का यह नया सामाजिक समीकरण बताता है कि अब सत्ता का रास्ता बौद्धिक प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि जनसंख्या आधारित सामाजिक गणित से होकर गुजरता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं।)





