Law and Constitution ! कानून और संविधान: गंभीर विधिक सवाल है पुलिस एनकाउंटर में होने वाली मौतें!

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Law and Constitution ! कानून और संविधान: गंभीर विधिक सवाल है पुलिस एनकाउंटर में होने वाली मौतें!
उज्जैन से उत्तरप्रदेश ले जाने के दौरान मुठभेड़ में मारे गए कानपुर के गैंगस्टर विकास दुबे को लेकर अनेक कानूनी सवाल खड़े हुए थे। उसकी मुठभेड़ सही थी या नहीं, उसे ले जाने के दौरान हथकड़ी पहनाई गई थी या नहीं जैसे कई सवाल उठाए गए थे। हथकड़ी अगर नहीं पहनाई, तो क्यों नहीं पहनाई गई!
अगर पहनाई गई तो फिर वह भागा कैसे? इस संदर्भ में विधिक स्थिति तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय क्या है, यह जानना दिलचस्प एवं महत्वपूर्ण दोनों है। केवल यही एक मात्र घटना नहीं है। इस प्रकार की घटनाएं घटित होती रहती है। इसी प्रकार के यक्ष प्रश्न हमारे सामने भी उपस्थित होते हैं।
इसी से मानव अधिकारों का प्रश्न भी जुड़ा है। कौटिल्य ने एक जगह कहा है कि ‘यदि दंड को नियोजित नहीं किया जाता है, तो यह मत्स्य न्याय की स्थिति को जन्म देता है। राजा की अनुपस्थिति में अथवा जब सजा का कोई भय नहीं होता, तो मत्स्य न्याय की स्थिति उत्पन्न होती है। इसी चीज को अनेक तरह से शास्त्रों में भी कहा गया है। जैसे रामायण, महाभारत का शांतिपर्व, कमण्डक, मत्स्यपुराण, मानसोलास आदि। महाभारत के शांतिपर्व में भी यह बताया गया है कि :
राजा चेन् न भवेलो परमं पृथिव्यां दण्डधारं
शूलं मत्स्यानिवपक्षं दुराबलं बलवताराहः
इस श्लोक का अर्थ है कि जब दंड की छड़ी ले जाने वाला राजा पृथ्वी की रक्षा नहीं करता, जब मजबूत व्यक्ति कमजोर लोगों को नष्ट कर देते हैं, जैसे कि पानी में बड़ी मछली छोटी मछली खा जाती है। महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं कि दुनिया में अधर्म के अलावा और कुछ भी बुरा नहीं है।
मत्स्य न्याय की अवस्था में कोई भी, दुष्टकर्ता भी सुरक्षित नहीं हैं। क्योंकि, बुरे कर्ता भी जल्द ही या बाद में अन्य बुरे कर्ताओं द्वारा निगल लिए जाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने भी मुठभेड़ के एक न्याय निर्णय में भी इसे उद्धरत कर इस प्रकार की मुठभेड़ों की निंदा की गई है।
 सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एके पटनायक की राय इस ताजा घटनाक्रम पर यह है कि विकास दुबे कानून के शासन के लिए खतरा था। पुलिस कार्यवाही न्यायसंगत है। पटनायक का मानना है कि वे यह नहीं मानते कि पुलिस कार्यवाही गलत है। दुबे को उस समय गोली मारी गई, जब वह भागने का प्रयास कर रहा था। न्यायमूर्ति पटनायक ने पुलिसकर्मियों को मारने सहित इस घटना की पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया। इसके विपरीत दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएस सोढ़ी ने इसे कानून का शासन समाप्त होने वाली घटना बताया।
विकास दुबे वाले मामले में भी जैसी आशंका थी इनकाउन्टर को सीबीआई से जांच करवाने वाली याचिकाएं पहले इलाहबाद हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की गई, जिसे न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया।
याचिकाकर्ता एक अभिभाषक थे, उन्होंने इस याचिका को यह कहते हुए वापस लेने की गुजारिश की कि उन्हें नई याचिका प्रस्तुत करने की इजाजत दी जाए। न्यायालय ने उनकी इस मांग को स्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर भविष्य में जरूरत पड़ने पर नई लोकहित याचिका प्रस्तुत करने का अधिकार दिया।
लेकिन, सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष ‘पीपुल्स यूनियन फाॅर सिविल लिबर्टिज’ ने भी एक याचिका इस इंकाउन्टर के खिलाफ प्रस्तुत की, जो विचाराधीन है। इस याचिका में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विचार किया जाना है। इस याचिका में विशेष जांच दल अथवा सीबीआई द्वारा इस मुठभेड़ की जांच किए जाने के साथ ही न्यायिक जांच एवं राजनीतिक गठजोड़ के संबंध में भी जांच की मांग की गई है।
     जहां तक हथकड़ी लगाने का सवाल है, इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर वैधानिक एवं मानवीय पहलुओं को स्पष्ट किया है। सर्वोच्च न्यायालय ने मूलतः कैदियों को हथकड़ी लगाने को अमानवीय माना है। लेकिन, कुछ मामलों में इसे लगाने को उचित भी माना है।
सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार न्यायालय के आदेश के बगैर कैदियों को हथकड़ी लगाना विधिक नहीं माना जा सकता। पुलिस द्वारा यह कहते हुए हथकड़ी लगाने का बचाव किया जाता है कि इससे कैदी पुलिस अभिरक्षा से आसानी से भाग नहीं सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक प्रकरण का निराकरण करते हुए यह ठहराया था कि हथकड़ी व्यक्ति के स्वतंत्रतापूर्वक आने-जाने के अधिकार में कटौती करती है।
इस अधिकार को छीना नहीं जा सकता। एक अन्य प्रकरण प्रेमशंकर विरूद्ध दिल्ली स्टेट वाले मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह ठहराया था कि प्रथम दृष्टया हथकड़ी लगाना एक अमानवीय कृत्य है। इसे न्यायालय ने बेहद कठोर, अतार्किक, मनमाना तथा अमानवीय बताया। लेकिन, साथ ही यह भी कहा कि अपरिहार्य परिस्थितियों में कारणों को बताते हुए बंदी को हथकड़ी लगाई जा सकती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में हथकड़ी को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, 14 तथा अनुच्छेद 19 के खिलाफ माना है। ये अनुच्छेद समानता तथा अभिव्यक्ति की आजादी से संबंधित है। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार हथकड़ी लगाना बंदी को प्रताड़ित करने के समान है।
रोहित कुमार विरूद्ध स्टेट ऑफ़ हरियाणा प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक व्यक्ति को पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने वाले प्रकरण में प्रकरण की जांच और प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज किया जाना संभव न होने के कारण याचिकाकर्ता को 20 लाख का मुआवजा राज्य शासन को देने के आदेश दिए। याचिकाकर्ता रोहित कुमार के पुत्र को पुलिस मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया था।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मृतक आक्रामक था, इसे उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर उचित नहीं माना जा सकता है। इस घटना में कोई भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे नकली मुठभेड़ का मामला माना। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21, 14, 226, 32 एवं 136 का उल्लेख करते हुए कहा था कि जांच में उन परिस्थितियों पर ध्यान देना चाहिए जिनमें मृत्यु हुई है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि मृतक का क्रूर अपराधी होना पुलिस को इस बात के अधिकार नहीं देता कि उसे नकली मुठभेड़ में इस प्रकार मार दिया जाए। पुलिस को केवल उस दषा में ही मारने का अधिकार है जब उस (पुलिस) पर प्राणघातक हमला किया गया हो। राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने भी इस संबंध में सन् 2003 में एक मार्गनिर्देशिका जारी की है।
आयोग के अनुसार मुठभेड़ में मारे गए व्यक्ति के मामले में जांच स्वतंत्र एजेंसी से करवाई जाना जरुरी है। साथ ही इस संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने पर पुलिस के विरूद्ध आपराधिक मानव वध करने का प्रकरण भी दर्ज किया जाना चाहिए।
इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वर्ष 2014 में  पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज विरूद्ध महाराष्ट्र राज्य में दिया गया फैसला सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसमें यह कहा गया है कि पुलिस एनकाउंटर जिसमें व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है अथवा गंभीर रूप से घायल हो जाता है उसमें जांच जरूरी है।
साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने इसमें दिशा निर्देश भी दिए गए हैं। न्यायालय ने अपने दिशा निर्देशों में कहा कि अगर मुठभेड़ में गोलीबारी होती है, जिसमें किसी की मृत्यु होती है तो उस दशा में प्रकरण दर्ज कर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के अंतर्गत कार्यवाही की जाना जरुरी है।
यह जांच सीआईडी अथवा पुलिस थाने के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए। समस्त तथ्यों का दस्तावेजीकरण किया जाकर गवाहों की साक्ष्य ली जाना आवश्यक है। पोस्टमार्टम करवाना तथा अन्य उपलब्ध साक्ष्य जैसे बंदूक, गोलियां, खाली कारतूस आदि को संग्रहित कर सुरक्षित रखना भी आवश्यक है। इस दिशा-निर्देश में मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट तैयार की जानी भी जरूरी है।
    उक्त समस्त जांच रिपोर्ट, साक्ष्य संबंधित न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाना चाहिए। मृत्यु की दशा में व्यक्ति के निकटतम को इसकी जानकारी दी जाना चाहिए। जांच में अगर यह साबित होता है कि हथियारों का उपयोग भारतीय दंड संहिता के किसी प्रावधान का उल्लंघन किया गया, तो दोषी अधिकारी के विरूद्ध मामला दर्ज कर उसे निलंबित किया जाना चाहिए।
जांच में संबंधित पुलिस अधिकारी द्वारा अपने हथियार फॉरेंसिक एवं बैलिस्टिक जांच के लिए देना जरूरी है। पीड़ित के परिवार को यदि लगता है कि जांच स्वतंत्र एवं दिशा-निर्देश के अनुरूप नहीं हो रही है, तो वह इसके लिए शिकायत संबंधित अतिरिक्त जिला न्यायाधीश द्वारा गुण-दोषों के आधार पर किया जाएगा।
घटना की जानकारी पुलिस द्वारा मृतक के परिवार को दी जाना भी जरुरी है। इन दिशा-निर्देशों में यह भी कहा गया है कि घटना के तुरन्त बाद आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन तथा गेलेन्ट्री अवॉर्ड नहीं दिए जाना चाहिए।
अपने एक अन्य फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा है कि बंदी के साथ किसी भी रूप में प्रताड़ना, क्रूर और अमानवीय व्यवहार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्राप्त संरक्षण के खिलाफ माना जाएगा। भले ही वह जांच, पूछताछ अथवा अन्य किसी दशा में दिया गया हो।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस फैसले में यह स्पष्ट किया गया है कि व्यक्ति की गिरफ्तारी के दौरान उसे जो भी वैधानिक एवं कानूनी अधिकार प्राप्त हैं, उनका पालन किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 बंदियों, विचाराधीन व्यक्ति, अन्य कैदियों जो पुलिस हिरासत में हैं, के साथ कोई भेदभाव नहीं करता।
केवल कानून में जो प्रावधान है उन्हीं के अनुरूप उन्हें इससे वंचित किया जा सकता है। न्यायालय ने इसका भी नकारात्मक उत्तर दिया कि यदि व्यक्ति पुलिस हिरासत में है तो उसे संविधान में प्रदत जीवन का अधिकार निलंबित हो जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि पुलिस का यह काम नहीं है कि वे अभियुक्त को इस आधार पर मार दे कि वह एक दुर्दांत अपराधी है। पुलिस का यह दायित्व है कि वे अभियुक्त को गिरफ्तार करें और उसे ट्रायल के लिए प्रस्तुत करें। नकली मुठभेड़ में मारना राज्य द्वारा समर्पित आतंकवाद माना जाएगा।
इस प्रकार के कृत्य अनुच्छेद 21 से वर्जित माने जाएंगे। अपने एक अन्य फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस को चेतावनी भी दी है कि एनकाउंटर के नाम पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों अथवा राजनेताओं के कहने पर हत्या का अपराध न करें। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘एनकाउंटर की अवधारणा एक आपराधिक अवधारणा है।
सन् 2019 में अपने एक फैसले में पुनः इस बात को दोहराया है कि उसके द्वारा पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज वाले प्रकरण में दिए गए दिशा-निर्देशों का पुलिस एनकाउंटर के मामलों में पालन होना ही चाहिए तथा उसे अनुच्छेद 141 के अंतर्गत कानून माना जाना चाहिए।’
विकास दुबे एनकाउंटर वाले इस ताजा प्रकरण की गूंज, सही और गलत तथा एक अपराधी के साथ किए जाने वाले व्यवहार पर चर्चा-परिचर्चा अभी कुछ दिनों तक चलती रहेगी। इस समस्त घटना क्रम में पुलिस की भूमिका भी कटघरे में रहेगी। इसी संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति गोवर्धनलाल ओझा द्वारा अपने एक साक्षात्कार में फांसी की सजा पर व्यक्त किए गए विचार मुझे याद आ रहे हैं।
उन्होंने कहा था ‘क्रूर अपराध की सजा क्रूर नहीं हो सकती है।’ इसी प्रकार एक दुर्दान्त एवं क्रूर अपराधी का अंत भी क्रूर नहीं हो सकता है। यदि इसे सही माना जाए तो फिर देश की जनता के एक बड़े वर्ग में इस मुठभेड़ के बाद संतोष क्यों देखा जा रहा है! शायद हमारी संवेदना में कमी एवं न्याय में देरी की अवधारणा तो इसका कारण नहीं है। हमें इन प्रश्नों के उत्तर खोजने ही होंगे। न्याय व्यवस्था के लिए भी यह समय आत्मविश्लेषण का तो है ही।