
जिस बगावत से बनी थी TMC, क्या वही बगावत उसे तोड़ देगी?
राजकुमार सिन्हा की विशेष रिपोर्ट
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से तेज राजनीतिक संघर्ष और नाटकीय घटनाक्रमों के लिए जानी जाती रही है। 1998 में ममता बनर्जी ने खुद कांग्रेस से बगावत कर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाई थी। ठीक वैसे ही आज टीएमसी में विभाजन हो रहा है और विद्रोही गुट खुद को ‘असली टीएमसी’ बता रहा है। टीएमसी अपने 28 साल के इतिहास के सबसे बड़े आंतरिक संकट से जूझ रही है।
विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के 58 विधायकों ने बगावत कर दी है। बागी गुट ने ममता बनर्जी के बजाय ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल का नया नेता चुन लिया है और पार्टी में टूट का दौर जारी है। संकट उस समय और गहरा गया जब ममता बनर्जी दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल होने आई थी और उसी दौरान टीएमसी के कई असंतुष्ट सांसद बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर बैठक करते नजर आए। संकट अब संसद तक पहुंच चुका है। राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है।
खबर आई कि कम से कम 20 असंतुष्ट सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर एनडीए में शामिल होने की इच्छा जताई है। हालांकि इस पर अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है लेकिन इस घटनाक्रम ने पार्टी नेतृत्व की चिंता कई गुना बढ़ा दी है।
TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी अपनी पार्टी को बिखरने से बचाने के लिए बागी विधायकों व सांसदों से व्यक्तिगत संपर्क साध रही हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल रही है। पार्टी को टूटने से बचाने के लिए ममता ने संगठन में व्यापक बदलाव करते हुए अभिषेक बनर्जी के प्रभाव को सीमित किया है और पुराने, भरोसेमंद नेताओं को वापस कमान सौंपी है।
तृणमूल कांग्रेस में पिछले कुछ वर्षों के दौरान अभिषेक बनर्जी का राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ा है। पार्टी के भीतर कई फैसलों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती रही है।
पार्टी के भीतर लंबे समय से दो अलग-अलग धाराओं की चर्चा होती रही है। एक ओर वे नेता हैं जो पार्टी के शुरुआती संघर्ष के दिनों से जुड़े रहे हैं, जबकि दूसरी ओर नई पीढ़ी के नेता हैं जो हाल के वर्षों में प्रभावशाली बने हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन दोनों समूहों के बीच बढ़ती दूरी ने संगठनात्मक संकट को और गहरा किया है। कई वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि पार्टी में उनकी भूमिका पहले जैसी नहीं रही, जबकि नई पीढ़ी संगठन में अधिक प्रभाव चाहती है। इस गंभीर राजनीतिक उथल-पुथल के बीच राष्ट्रीय स्तर पर ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को कांग्रेस में विलय करने का प्रस्ताव भी दिए जाने की चर्चाएं जोरों पर है।
इधर मौजूदा TMC बागी गुट का इरादा अलग पार्टी बनाने का नहीं है, वे खुद को असली तृणमूल करार दे रहे हैं। उनकी कोशिश पार्टी के संगठन चुनाव चिह्न और टीएमसी की पूरी राजनीतिक विरासत पर कब्जा करने की है। बागी गुट सीधे तौर पर ममता बनर्जी पर हमला नहीं कर रहा है। बागी नेताओं का कहना है कि वे अभी भी ममता बनर्जी का सम्मान करते हैं और पार्टी बनाने में उनके योगदान को मानते हैं। ऋतब्रत बनर्जी ने तो यहां तक कहा कि वे ममता बनर्जी से इस विपक्षी मोर्चे की मुख्य सलाहकार बनने का अनुरोध करेंगे। उनकी असली लड़ाई अभिषेक बनर्जी और उनके करीबी सलाहकारों के बढ़ते प्रभाव से है।
बागी गुट बंगाल में एक ऐसा नया राजनीतिक स्पेस बनाना चाहता है जो न तो मौजूदा टीएमसी का ढांचा हो और न ही भाजपा हो। इस गुट ने खुद की अलग छवि बनाने का एलान किया है।
पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ है उसने पश्चिम बंगाल की राजनीति की दशा और दिशा बदल दी है। कभी बंगाल की राजनीति का सबसे मजबूत किला मानी जाने वाली तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी अपने अस्तित्व की सबसे कठिन परीक्षा से गुजर रही है। फिर भी टीएमसी के भीतर अभी भी एक बड़ा वर्ग ममता बनर्जी के साथ खड़ा दिखाई देता है लेकिन लगातार बढ़ती बगावत ने पार्टी के भविष्य को अनिश्चित बना दिया है।एक समय विरोधी दलों को चुनौती देने वाली तृणमूल कांग्रेस अब अपने ही संगठन को एकजुट रखने की चुनौती से जूझ रही है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। जिस तृणमूल कांग्रेस ने तीन दशकों तक ममता बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल की राजनीति को दिशा दी, आज वही पार्टी अपने इतिहास के सबसे गंभीर आंतरिक संकट का सामना कर रही है। यह संघर्ष केवल कुछ विधायकों और सांसदों की नाराजगी का मामला नहीं है, बल्कि नेतृत्व, संगठनात्मक संरचना, राजनीतिक विरासत और भविष्य की दिशा को लेकर गहरे मतभेदों का परिणाम है। बागी गुट द्वारा स्वयं को ‘असली टीएमसी’ घोषित करना इस संकट को और जटिल बना देता है, क्योंकि लड़ाई केवल सत्ता की नहीं बल्कि पार्टी की पहचान और विरासत की भी है। ममता बनर्जी अब उस दौर से गुजर रही हैं जहां उनकी राजनीतिक कुशलता, संगठन पर पकड़ और जनाधार की वास्तविक शक्ति की परीक्षा हो रही है। यदि वे असंतुष्ट नेताओं को साथ लाने और संगठन में विश्वास बहाल करने में सफल होती हैं तो टीएमसी इस संकट से उबर सकती है। लेकिन यदि बगावत का दायरा और बढ़ता है, तो यह केवल तृणमूल कांग्रेस ही नहीं बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल के राजनीतिक समीकरणों को बदल सकता है।
आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि टीएमसी इस चुनौती को अवसर में बदल पाती है या बंगाल की राजनीति किसी नए अध्याय की ओर बढ़ती है।आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व इस संकट से कैसे बाहर निकलता है और क्या संगठन दोबारा पहले जैसी मजबूती हासिल कर पाता है?





