विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों में शासन की स्वीकृति के बिना करोड़ों के भुगतान की जांच का उच्च शिक्षा मंत्री ने दिया आश्वासन

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विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों में शासन की स्वीकृति के बिना करोड़ों के भुगतान की जांच का उच्च शिक्षा मंत्री ने दिया आश्वासन

छतरपुर। छतरपुर विधायक ललिता यादव ने महाराजा छत्रसाल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय छतरपुर में शासन की बिना स्वीकृति के निर्माण कार्यो में की जा रही अनियमितताओ का मुद्दा मंगलवार को विधानसभा में उठाया। उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने मामले की जांच कराने का आश्वासन दिया है।

विधायक ने पूछा कि महाराजा छत्रसाल बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय छतरपुर में निर्मित कुलपति निवास, प्रशासनिक भवन, अकादमिक भवन एवं बाउंड्रीवॉल निर्माण पर आज तक कुलसचिव द्वारा कुल कितनी राशि का भुगतान किया गया है। साथ ही क्या निर्माण कार्य के भुगतान की कुलसचिव द्वारा उच्च शिक्षा विभाग से कितनी राशि की प्रशासकीय स्वीकृति प्राप्त की गई?

विधायक ने यह भी सवाल उठाया कि क्या कुलसचिव बिना प्रशासकीय स्वीकृत लिये 40 करोड का भुगतान कर सकता है? कुलसचिव क्या स्वयं प्रशासकीय स्वीकृति देकर स्वयं भुगतान कर सकता है तो आदेश प्रस्तुत करें।

विधायक ने बिना प्रशासकीय स्वीकृति के कुलसचिव द्वारा किये गये करोड़ों के भुगतान को वित्तीय अनियमितता बताते हुए शासन से कार्यवाही की मांग की।

उच्च शिक्षा मंत्री इन्दर सिंह परमार ने विधायक ललिता यादव के प्रश्न का लिखित उत्तर देते हुए बताया कि विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की स्वीकृति से विश्वविद्यालय के वार्षिक बजट में प्रावधानित की गई राशि के अनुसार विश्वविद्यालय के द्वारा कुलपति निवास एवं प्रशासनिक भवन के लिये 17 करोड़ एवं बाउंड्रीवाल, गेट निर्माण एवं गार्ड रूम निर्माण के लिये 10 करोड़ 50 लाख रुपए का भुगतान किया गया। इस प्रकार कुल 27 करोड़ 50 लाख का विश्वविद्यालय द्वारा लोक निर्माण विभाग पीआईयू छतरपुर को भुगतान किया गया है। अकादमिक भवन के लिये विश्वविद्यालय द्वारा किसी राशि का भुगतान नहीं किया गया है।

उन्होंने बताया कि मप्र विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 की धारा 24 की उपधारा 14 के अंतर्गत निर्माण कार्य की स्वीकृति विश्वविद्यालय की कार्य परिषद द्वारा दी गई है। जिसके आधार पर विश्वविद्यालय द्वारा बजट में प्रावधानित की गई राशि में से भुगतान की कार्यवाही की गई है।

उच्च शिक्षा मंत्री के लिखित उत्तर पर विधायक ललिता यादव ने कहा कि उनके मूल प्रश्न के उत्तर में उच्च शिक्षा मंत्री द्वारा जो जानकारी प्रस्तुत की गई है, वह तथ्यों के विपरीत है और सदन को गुमराह करने वाली है।

विधायक ने कहा कि मंत्री के उत्तर में बताया गया है कि उच्च शिक्षा विभाग से प्रशासकीय स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई। जबकि वास्तविकता यह है कि कुलसचिव के पत्र क्र. 428 (दिनांक 11/04/22) के संदर्भ में आयुक्त उच्च शिक्षा विभाग द्वारा पत्र क्रमांक 554/286/आ.उ.शि./शा.-नि/2021 (दिनांक 25/07/2022) जारी किया गया था। इस पत्र के माध्यम से 40 करोड़ के प्रस्ताव के विरुद्ध केवल 20 करोड़ रुपये की स्वीकृति स्पष्ट रूप से प्रदान की गई थी।

उन्होंने बताया कि उत्तर में मप्र विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 की धारा 24(14) का हवाला देकर कहा गया है कि कार्यपरिषद को स्वीकृति का अधिकार है। यदि कार्यपरिषद सर्वोच्च थी और उसे शासन की अनुमति की आवश्यकता नहीं थी, तो विश्वविद्यालय प्रशासन ने 11 अप्रैल 2022 को उच्च शिक्षा विभाग से 40 करोड़ की अनुमति क्यों मांगी?

 

*7.50 करोड़ रुपये की गंभीर वित्तीय अनियमितता:*

विधायक ने कहा कि मंत्री ने स्वयं स्वीकार किया है कि निर्माण कार्यों पर 27 करोड़ 50 लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका है। जब उच्च शिक्षा विभाग द्वारा मात्र 20 करोड़ रुपये खर्च करने की स्पष्ट सीमा तय की गई थी, तो अतिरिक्त 7 करोड़ 50 लाख रुपये बिना शासन की अनुमति के किसके आदेश पर खर्च किए गए? क्या विश्वविद्यालय शासन के आदेशों से मुक्त हो गया है?

विधायक ललिता यादव ने कहा कि शासन की स्पष्ट 20 करोड़ की सीमा का उल्लंघन कर 7.50 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान करना एक प्रमाणित वित्तीय अनियमितता है। साथ ही विधानसभा में इस 20 करोड़ की स्वीकृति के पत्र (दिनांक 25 जुलाई 2022) को छिपाकर सदन को गुमराह किया गया है।

उन्होंने कहा कि मंत्री इस 7.50 करोड़ के अवैध भुगतान और सदन को गुमराह करने वाले दोषी अधिकारियों (कुलसचिव एवं अन्य) पर उच्च स्तरीय जांच के आदेश देंगे और कब तक? बाद में विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर उच्च शिक्षा मंत्री ने जांच का आश्वासन दिया।