
रविवारीय गपशप: जीप भर फाइलें, ACS विनोद चौधरी की तेज निगाहें और शिकायत नस्तीबद्ध
आनंद शर्मा
अधिकारियों के कामकाज़ से असंतुष्ट होकर जनता तो शिकायत करती ही है , पर कई बार सत्ता में बैठे महत्वपूर्ण व्यक्ति भी शिकायत कर बैठते हैं , तब उससे पार पाना बड़ा कठिन हो जाता है । इस विषय से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा मुझे याद आ रहा है । बात पुरानी है , उन दिनों मैं परिवहन विभाग में उपायुक्त परिवहन के पद पर कार्यरत था , और मेरा मुख्यालय ग्वालियर हुआ करता था । वैसे तो मेरा मूल काम विभाग के प्रशासन और स्थापना के कामकाज निपटाने का था , लेकिन राज्य परिवहन प्राधिकार का सचिव होने के नाते मैं अंतर्राज्यीय मार्गों पर अस्थायी परमिट भी जारी किया करता था । परमिट जारी करने के नियम बड़े स्पष्ट थे । दो राज्यों के बीच एक लिखित करार हुआ करता था , जिसमें यह तय था कि निश्चित किए हुए मार्गों पर दोनों राज्य कितनी बसों को कितने फेरे के परमिट जारी कर सकेंगे ।
यह वो दौर था , जब मध्यप्रदेश में राज्य परिवहन निगम को समाप्त कर दिया गया था , और निगम के लिए रिजर्व मार्ग पर निगम के द्वारा अनुबंधित की हुई निजी बसें चल रही थीं । अस्थायी परमिट उन्हीं मार्गों पर जारी हो सकते थे , जहाँ स्थायी परमिट जारी न हो रखे हों अर्थात मार्ग खाली हो । एक दिन मेरे कार्यालय में भोपाल से आगरा मार्ग हेतु राज्य परिवहन निगम मध्यप्रदेश की ओर से एक आवेदन अस्थायी परमिट जारी करने के लिए दाखिल हुआ । आवेदन पर कार्यालय की रिपोर्ट प्रस्तुत हुई तो मैंने पाया कि इस मार्ग पर उपलब्ध रिक्तियों पर पूर्व से ही परमिट जारी हैं , और कोई भी वैकेंसी नहीं है तो मैंने आवेदन निरस्त कर दिया । बेशक आवेदित मार्ग राज्य परिवहन निगम के लिए रिजर्व था पर तब की बदली हुई परिस्थिति में आवेदन के पीछे कोई निजी ऑपरेटर ही था जिसकी बस निगम से अनुबंधित हुई थी । आवेदन खारिज होने के बाद मुझे एक फोन आया और दूसरी ओर से सज्जन ने कहा कि वे परिवहन राज्य मंत्री जी के बेटे बोल रहे हैं , और ये आवेदन उनकी अनुबंधित बस के लिए ही था , जो मैंने अमान्य कर दिया था । मैंने उन्हें स्थिति बताई, पर वे सुनने को तैयार ही नहीं थे । अगले सप्ताह एक आवेदन उसी मार्ग के लिए परिवहन निगम की ओर से फिर आ गया । मैंने इस बार और अधिक सावधानी से रिकॉर्ड देखा भाला, पर परिवहन मुख्यालय की प्राधिकार शाखा इस मामले में कमाल थी , कोई गलती नहीं थी , सारी रिक्तियां भरी हुईं थी , लिहाजा सुनवाई के बाद मैंने पुनः आवेदन निरस्त कर दिया । इस बार दोपहर को ही फोन आ गया , मैंने आवेदक के प्रतिनिधि को समझाया कि रिक्ति नहीं है तो परमिट जारी नहीं हो सकता , आप निगम को बोल कर एक परमिट निरस्त करा लो , फिर आवेदन करो तो परमिट जारी हो सकेगा । ये तो नहीं हुआ अलबत्ता अगले हफ्ते एक शिकायत मेरे खिलाफ जरूर परिवहन विभाग के अपर मुख्य सचिव से आयुक्त तक आ गई । मैंने अपना पक्ष पूरे तथ्यों के साथ लिख कर आयुक्त के माध्यम से शासन को भेज दिया और परीक्षण उपरान्त शिकायत नस्तिबद्ध हो गयी ।
मैंने सोचा मामला समाप्त हो चुका है , पर कुछ दिनों बाद फिर इसी आशय की शिकायत और विस्तार से की गई जिसमें मुझ पर ये आक्षेप लगाये गए थे , कि अन्य रूट के आवेदकों को तो रिक्ति भरे होने पर परमिट जारी हुए हैं जबकि शिकायतकर्ता को परमिट देने से इनकार किया जा रहा है । आरोप गंभीर थे और शिकायत के पीछे मजबूत हाथ होने का मुझे इमक़ान था , इसलिए मैंने पूरा रिकॉर्ड खँगाला , पर स्थिति वही थी , सो अपना जवाब पुनः आयुक्त के माध्यम से शासन को भेज दिया , लेकिन इस बार शिकायत नस्तीबद्ध नहीं हुई और अगले सप्ताह मुझे एसीएस श्री विनोद चौधरी का फोन आ गया कि आपकी बार बार शिकायत हो रही है , आप अब तक प्राधिकार द्वारा अंतर्राज्यीय मार्गों पर जितने भी अस्थायी परमिट जारी हुए हैं , उनका पूरा रिकॉर्ड लेकर भोपाल उपस्थित होइये ।
विनोद चौधरी , अपनी ईमानदारी और ज़िद दोनों के लिए विख्यात थे । मैं उनसे क्या कहता , बस मुसीबत ये थी , कि सभी मार्गों में जारी पारमिटों का रिकॉर्ड इतना था कि उसे एक जीप में भर कर ही ले जाया जा सकता था । उनसे कुछ कहना बेकार था , लगता मैं कुछ छिपाने के लिए बहाने बना रहा हूँ , सो मैंने परिवहन आयुक्त को स्थिति बतायी और बताए गए दिन पर सुबह सारे रिकॉर्ड के साथ पहुँच गया । उस दिन शासकीय अवकाश था , सो आरटीओ भोपाल ऑफिस के भृत्य गणों ने मेहनत कर पूरा रिकॉर्ड ऊपर तक पहुँचा दिया । मैं अन्दर पहुँचा तो एसीएस बोले भाई आपकी बहुत शिकायत हो रही है , चलिये रिकॉर्ड दिखाइए । मैं चुप रहा , मौखिक प्रतिवाद से कुछ भी हासिल नहीं था । एक के बाद एक रिक्तियों के विरुद्ध जारी परमिटों के रिकॉर्ड मैं उन्हें दिखाता रहा और वे देखते रहे । उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र , राजस्थान आदि प्रदेशों के नम्बर आने लगे ।
विनोद चौधरी साहब की तेज निगाहें सब कुछ स्कैन कर रही थीं , एक एक फ़ाइल वे ध्यान से देख रहे थे , पर मामला तो सब कुछ नियमों के अनुरूप था । सुबह से दोपहर हो गई , लंच का वक्त हो चला था , एसीएस अचानक बोले “जब सब कुछ सही है तो मन्त्री जी के यहाँ से बार बार आपकी शिकायत क्यों आ रही है ? “
मैंने पहली बार अपना मुँह खोला और बोला “ सर यदि मैंने कुछ गड़बड़ की होती , तो मेरी हिम्मत थी कि मैं उनका आवेदन निरस्त कर देता ।
विनोद चौधरी साहब ने मेरे चेहरे की ओर अपनी तेज निगाहों से देखा , और अपनी सामने खुली शिकायत की फ़ाइल बंद करते हुए बोले , ठीक है , चलो जाओ । अगले सप्ताह ही डाक से मुझे शिकायत नस्तिबद्ध होने का पत्र प्राप्त हो गया ।





