Panchkoshi Yatra Ujjain: ऐसे भी हैं सेवाभावी संगठन, प्रचार-प्रसार के मोह से मुक्त होकर 3 दशक से कर रहे सेवा 

20 क्विंटल पेठा प्रसाद, साढ़े चार सौ किलो लस्सी का वितरण 

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Panchkoshi Yatra Ujjain: ऐसे भी हैं सेवाभावी संगठन, प्रचार-प्रसार के मोह से मुक्त होकर 3 दशक से कर रहे सेवा 

कीर्ति राणा की विशेष रिपोर्ट 

उज्जैन:हर साल होने वाली पंचकोशी यात्रा में शामिल होने वाले हजारों यात्रियों की सेवा में तीन दशक से पान बड़ोदिया में ऐसा सेवाभावी संगठन भी सेवा में जुटा हुआ है जो प्रचार प्रसार के मोब से मुक्त है। इस बार भी इस संगठन ने 118 किमी की इस पंचकोशी यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं में पान बड़ोदिया पड़ाव स्थल पर 20 क्विंटल पेठा प्रसाद का वितरण किया।इस 118 किमी लंबी यात्रा का समापन आज 16 अप्रैल गुरुवार को हो जाएगा।

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इस सेवाभावी संगठन से जुड़े करीब सौ सदस्यों में बड़े व्यापारी, शेयर कारोबारी से लेकर छोटे दुकानदार, किसान परिवार तक शामिल हैं। यात्रा शुरु होने के करीब एक महीने पहले से आपस में धन संग्रह शुरु कर देते हैं। जो आर्थिक सहयोग करना चाहे न्यूनतम 11 रु और अधिकतम जिसकी जितनी श्रद्धा हो। सेवा करने वालों का एक ही भाव रहता है देने वाले श्रीनाथ जी, पाने वाले श्रीनाथ जी-हम तो उनके सेवक के रूप में काम करते हैं। जितना पैसा इकट्ठा होता है उस हिसाब से तय करते हैं इस बार क्या सेवा करना है। इस बार तय किया था 15 क्विंटल पेठा प्रसाद बांटना है।एक परिचित के कारण आगरा से पेठा कुछ सस्ते भाव में मिल गया तो 20 क्विंटल पेठा मंगवा लिया बांटने के लिए। पहले दिन यह प्रसाद सेवा की, अगले दिन एक सेवाभावी ने करीब 450 किलो दही की व्यवस्था करा दी तो लस्सी का वितरण करा दिया। फिर एक सज्जन एक बोरा भर कर फरियाली मिक्चर ले आए तो उसका वितरण करा दिया।इससे पहले के वर्षों में कभी श्रीखंड, फरियाली और नमकीन खिचड़ी, पोहे, फल, ककड़ी आदि बांट चुके हैं।

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संगठन की प्रेरणा और सदस्यों का उत्साह बढ़ाने वाले वरिष्ठ सदस्य कहते हैं एक जमाना था जब पान बड़ोदिया में पानी की टंकी नहीं बनी थी, तब आसपास के गांवों से पानी के पच्चीस टैंकर जुटा कर जल सेवा करते थे।आसपास के गांवों के किसानों ने भी खूब मदद की। आज तक बिना सरकारी सहयोग के पंचकोशी यात्रियों की सेवा कर रहे हैं।

🔹भैया हमारा नाम मत छापना 

बिना किसी सरकारी मदद के पान बड़ोदिया में सतत तीन दशक से पंचकोशी यात्रियों की सेवा में जुटे एक वरिष्ठ सदस्य का अनुरोध था भैया हमारा नाम मत छापना।उनका कहना था दान का महत्व तब ही है कि दायां हाथ कुछ करे तो बाएं हाथ को भी पता नहीं चले। हम नाम के लिये तो कर ही नहीं रहे, महाकाल हम से यह सेवा कार्य करवा रहे हैं यह क्या कम है।फिर हम नाम छपवाने वाले कौन, बाकी लोगों का हम पर विश्वास है, वो सब आर्थिक सहयोग करते हैं, उनके बलबूते ही हम सेवा करने का साहस जुटा पाते हैं।