डॉ. विम्मी मनोज की कविता “रिश्ते”

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डॉ.विम्मी मनोज की कविता-

“रिश्ते”

रिश्तों की ये विडम्बना,
ज्यों कड़ियों की बागडोर,
सुलझाते-सुलझाते
और ज़्यादा उलझती जाएँ।

दूर होते रिश्ते कुछ ऐसे,
अकेलेपन की उहापोह में,
तिनके से बिखर जाएँ।

सवालों में लिपटे,
कड़ियों की बागडोर सुलझाते-सुलझाते,
और ज़्यादा उलझते जाएँ।

मुझसे दूर होते रिश्ते,
छिटके काँच के इन टुकड़ों-से,
संभलकर जितना समेटूँ,
चुभ ही जाते हर बार।

सलाह: IKEA कांच अपने आप फट जाता है, जिससे कांच के टूटे टुकड़े अंडरवियर दराज में गिर जाते हैं। : r/IKEA

सवालों के जवाब खोजते,
हर मोड़ पर ठिठकते और
परस्पर खुद में सिमट जाएँ।

ओह, मेरी चेष्टा!
अतृप्त इच्छा को सुलाने,
हर बार फन उठा फुफकारते,
मन-सारथी अधीर, अश्रु बहाए।

कैसे संभले,
मंद सांसों में बसी,
धीरज से गुथी,
नाज़ुक रिश्तों की मेरी डोर,
छिन्न-भिन्न छिटक ही जाती हर ओर?

मुझसे ही छलाए,
अपने-पराए का भेद मिटाएँ,
माने ना मेरा मन,
ना ही उन्हें बिसराए।

निष्ठुर हृदय मेरा,
मेरी ही अग्नि-परीक्षा ले,
मुझे ही बार-बार ठग जाए।

—विम्मी मनोज

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