
डॉ.विम्मी मनोज की कविता-
“रिश्ते”
रिश्तों की ये विडम्बना,
ज्यों कड़ियों की बागडोर,
सुलझाते-सुलझाते
और ज़्यादा उलझती जाएँ।
दूर होते रिश्ते कुछ ऐसे,
अकेलेपन की उहापोह में,
तिनके से बिखर जाएँ।
सवालों में लिपटे,
कड़ियों की बागडोर सुलझाते-सुलझाते,
और ज़्यादा उलझते जाएँ।
मुझसे दूर होते रिश्ते,
छिटके काँच के इन टुकड़ों-से,
संभलकर जितना समेटूँ,
चुभ ही जाते हर बार।

सवालों के जवाब खोजते,
हर मोड़ पर ठिठकते और
परस्पर खुद में सिमट जाएँ।
ओह, मेरी चेष्टा!
अतृप्त इच्छा को सुलाने,
हर बार फन उठा फुफकारते,
मन-सारथी अधीर, अश्रु बहाए।
कैसे संभले,
मंद सांसों में बसी,
धीरज से गुथी,
नाज़ुक रिश्तों की मेरी डोर,
छिन्न-भिन्न छिटक ही जाती हर ओर?
मुझसे ही छलाए,
अपने-पराए का भेद मिटाएँ,
माने ना मेरा मन,
ना ही उन्हें बिसराए।
निष्ठुर हृदय मेरा,
मेरी ही अग्नि-परीक्षा ले,
मुझे ही बार-बार ठग जाए।
—विम्मी मनोज
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