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कविता: सफर

कविता: सफर 

डॉ.मिनल डोंगरे (स्याही}

सफ़र बीता नहीं,हर पल नया मोड़ लिख रहा है,
वक़्त खामोशी में भी कुछ जोड़ लिख रहा है,
कुछ अरमान धुंधले पड़े हैं राहों की गर्द में,
पर दिल अब भी उजले कल का कोई भोर लिख रहा है।

रात ने चाहे कितनी ही परछाइयाँ दी हों,
हौसलों ने फिर भी रोशन दिशाएँ दी हों,
टूटे पन्नों से भी कहानी बन जाती है,
जब उम्मीदों ने नई परिभाषाएँ दी हों।

ये राहें ठहरना नहीं,बस चलना सिखाती हैं,
हर ठोकर में छुपी कुछ वजह बताती हैं,
अधूरे ख्वाब भी ताक़त बन जाते हैं,
जब ज़िंदगी मुस्कुराकर आगे बढ़ना सिखाती है।

Betul Collector’s Bungalow: घर की डेहरी से खूब आशीष मिला,इस डेहरी को नमन.