अन्नामलाई का भाजपा छोड़ना: क्या यह पार्टी के इतिहास का एक दु:खद दिन होगा?

राजनीति में ईमानदार व्यक्तियों के अकाल की स्थिति में भाजपा इस जल स्रोत को क्यों सुखा रही है?

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अन्नामलाई का भाजपा छोड़ना: क्या यह पार्टी के इतिहास का एक दु:खद दिन होगा?

वेद माथुर की खास राजनीतिक रिपोर्ट

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए तमिलनाडु की राजनीतिक जमीन हमेशा से एक कठिन पहेली रही है। द्रविड़ उपमहाद्वीप का वैचारिक वर्चस्व, क्षेत्रीय अस्मिता की जटिलताएं और सांस्कृतिक दूरी के कारण भाजपा यहां लंबे समय तक हाशिए पर रही। ऐसे में के. अन्नामलाई जैसे कड़क, युवा और पूर्व-नौकरशाह नेता का उदय पार्टी के लिए ‘संजीवनी’ जैसा था। लेकिन हालिया घटनाक्रमों और उनके भाजपा छोड़ने की अटकलों ने समर्थकों को झकझोर कर रख दिया है। सवाल यह है कि क्या चुनावी तात्कालिकता के चक्कर में भाजपा तमिलनाडु में अपने सबसे बड़े निवेश को खोने जा रही है?

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सिंघम’ से ‘सारथी’ तक: अन्नामलाई का सफर:

के. अन्नामलाई (जन्म: 4 जून 1984) केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि तमिलनाडु में भाजपा का चेहरा बन चुके हैं। 2011 बैच के कर्नाटक कैडर के इस पूर्व आईपीएस अधिकारी ने जब अपनी वर्दी छोड़ी, तो उनके पास कई रास्ते थे। 2020 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें जुलाई 2021 में सबसे कम उम्र में प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी गई।

अन्नामलाई जब आईपीएस ऑफिसर थे तो आम जनता में इतने लोकप्रिय थे कि जब कभी उनका ट्रांसफर हुआ तो पूरे शहर में ट्रांसफर के खिलाफ हड़ताल हो गई।

उनकी सबसे बड़ी कामयाबी रही “एन मन्न, एन मक्कल” (मेरी भूमि, मेरे लोग) पदयात्रा। अमित शाह द्वारा हरी झंडी दिखाई गई और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में समाप्त हुई इस 200+ दिनों की यात्रा ने तमिलनाडु की सभी 234 विधानसभा सीटों को मथ डाला।

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बदलाव के आंकड़े:

2019 के लोकसभा चुनाव में जहां भाजपा का वोट शेयर महज 3.62% था, वहीं 2024 के चुनाव में अन्नामलाई के नेतृत्व में यह बढ़कर 11.38% हो गया। भले ही सीटें नहीं मिलीं, लेकिन अन्नामलाई ने भाजपा को तमिलनाडु के हर घर में चर्चा का विषय बना दिया।

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वैचारिक कड़ापन बनाम चुनावी अंकगणित:

तमिलनाडु में भाजपा की बुनियादी कमजोरी यह रही है कि वह द्रविड़ राजनीति के विकल्प के रूप में खुद को स्थापित नहीं कर पा रही थी। अन्नामलाई ने आक्रामक शैली अपनाई और AIADMK जैसी क्षेत्रीय पार्टियों पर निर्भर रहने के बजाय “एकला चलो रे” की नीति की वकालत की।

हालांकि, हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और गठबंधन को प्राथमिकता देने की केंद्रीय रणनीति ने जमीनी कार्यकर्ताओं को निराश किया है।

एक ऐसे नेता को दरकिनार करना जो ईमानदारी, भ्रष्टाचार-विरोधी छवि और ग्रासरूट कनेक्ट के लिए जाना जाता है, आत्मघाती कदम प्रतीत होता है।

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आरएसएस (RSS) का रुख:

संघ के आंतरिक सूत्र भी इस स्थिति से असहज हैं। आरएसएस हमेशा से तमिलनाडु में दीर्घकालिक वैचारिक विस्तार का पक्षधर रहा है, जिसके लिए अन्नामलाई एकदम उपयुक्त चेहरे थे। तात्कालिक चुनावी फायदों के लिए उन्हें किनारे किए जाने की खबरों से संगठन के भीतर भी असंतोष की सुगबुगाहट है।

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केंद्रीय नेतृत्व का हस्तक्षेप: शाह का आश्वासन:

इस डैमेज कंट्रोल के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कमान संभाली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अन्नामलाई द्वारा इस्तीफे की पेशकश के बाद शाह के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। अमित शाह ने उन्हें आश्वस्त किया है कि तमिलनाडु में स्वतंत्र रूप से काम करने और जन-आंदोलन (जैसे पदयात्राएं) जारी रखने की उनकी मांगों पर पार्टी सकारात्मक रुख अपनाएगी। केंद्रीय नेतृत्व भी जानता है कि अन्नामलाई का विकल्प ढूंढना फिलहाल असंभव है।

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सिद्धांतों की राजनीति और भाजपा की परीक्षा

अन्नामलाई का भाजपा में रहना या न रहना केवल एक व्यक्ति का फैसला नहीं होगा, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट होगा कि भाजपा क्षेत्रीय राज्यों में दीर्घकालिक वैचारिक जमीन तैयार करना चाहती है या केवल चुनावी सौदेबाजी में विश्वास रखती है।

तमिलनाडु जैसे राज्य में, जहाँ राष्ट्रवाद को एक नई परिभाषा की जरूरत थी, अन्नामलाई ने युवाओं में एक नई अलख जगाई है। यदि वे अलग राह चुनते हैं, तो नुकसान अन्नामलाई का नहीं, बल्कि भाजपा के उस सपने का होगा जो वह कन्याकुमारी से कश्मीर तक देखना चाहती है।

वेद माथुर