
पुस्तकचर्चा-Today Marks 25 Years of ‘Lagaan’: सत्यजित भटकल की किताब ‘ऐसे बनी लगान ‘
डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

आज ‘लगान’ को 25 साल हो गए।
ठीक 25 साल पहले 15 जून 2001 को लगान फिल्म रिलीज हुई थी. पिछली मुंबई यात्रा के दौरान अजय ब्रह्मात्मज जी से इस बारे में बात हुई थी। मुलाकात के दौरान उन्होंने सत्यजित भटकल की किताब ‘ऐसे बनी लगान ‘ भेंट की थी, इसका अनुवाद अजय जी ने ही किया था। यह किताब एक क्लासिक के सर्जकों की असाधारण किताब है।
यह कोई साधारण ‘मेकिंग ऑफ’ पुस्तक नहीं, बल्कि एक फिल्म के जन्म, संघर्ष और निर्माण की जीवंत डायरी जैसी है।
यह बताती है कि कैसे अशुतोष गोवारिकर कई निर्माताओं के पास पटकथा लेकर गए, लेकिन अधिकांश ने इसे अस्वीकार कर दिया। तर्क था कि पीरियड फिल्म + क्रिकेट + लंबी अवधि = जोखिम।
आमिर खान शुरुआत में केवल अभिनेता थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगा कि यह कहानी बननी चाहिए। उन्होंने निर्माता बनने का जोखिम लिया। किताब दिखाती है कि निर्माता बनना केवल पैसे लगाना नहीं, बल्कि पूरी रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा बनना था।
लगान की शूटिंग गुजरात के भुज इलाके में हुई। भीषण गर्मी, धूल, सीमित संसाधन और बड़ी यूनिट इन सबके बीच काम हुआ। कलाकारों को क्रिकेट सीखना पड़ा, विदेशी कलाकारों और भारतीय कलाकारों को साथ लेकर काम करना पड़ा।
किताब का एक बड़ा विचार यह है कि लगान किसी एक स्टार की नहीं, एक सामूहिक निर्माण प्रक्रिया की जीत थी।कॉस्ट्यूम, कला निर्देशन, लोक वातावरण, भाषा, संगीत—सबने मिलकर फिल्म बनाई।
रिलीज़ से पहले आशंकाएँ थीं कि इतनी लंबी फिल्म चलेगी या नहीं। लेकिन रिलीज़ के बाद दर्शकों ने इसे एक सिनेमाई अनुभव बना दिया। इसी दिन सनी देओल की फिल्म एक ग़दर : एक प्रेम कथा भी लगी थी। दोनों ही फिल्मे सुपर – डुपर हिट हुई थी।
किताब पढ़ते हुए महसूस होता है कि ‘लगान’ सिर्फ़ एक फिल्म नहीं बनी—उसे लगभग एक अभियान की तरह गढ़ा गया।
लगान हिन्दी सिनेमा के इतिहास की उन फिल्मों में गिनी जाती है जिन्होंने मनोरंजन, इतिहास, खेल और जनभावना को एक साथ जोड़ दिया। फिल्म 1893 के औपनिवेशिक भारत की पृष्ठभूमि में बनी थी, जहाँ सूखे से परेशान किसान अंग्रेज़ हुकूमत के ‘लगान’ से राहत पाने के लिए क्रिकेट मैच खेलने की चुनौती स्वीकार करते हैं।
फिल्म लगभग साढ़े तीन घंटे लंबी थी, फिर भी दर्शकों को बाँधे रखने में सफल रही। इसका संगीत ए आर रहमान ने दिया था, गाने जावेद अख़्तर ने और संवाद हिन्दी के नामचीन व्यंग्यकार के. पी. सक्सेना ने लिखे थे।
यह फिल्म सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी के लिए ऑस्कर नामांकन तक पहुँची। यह उपलब्धि हासिल करने वाली चुनिंदा भारतीय फिल्मों में से एक रही।





