
‘ऊधो मन न भए दस बीस’…
कौशल किशोर चतुर्वेदी
उद्धव-गोपी संवाद हिंदू पौराणिक कथाओं और हिंदी साहित्य का एक अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग है। इसमें श्रीकृष्ण अपने ज्ञानी मित्र उद्धव को मथुरा से ब्रज भेजते हैं, ताकि वे गोपियों को योग और निर्गुण ब्रह्म का उपदेश देकर उनके विरह (दुःख) को शांत कर सकें। श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद, ब्रजवासी (विशेषकर गोपियाँ और राधा) उनकी याद में तड़प रहे होते हैं। श्रीकृष्ण को लगता है कि गोपियाँ उनके प्रेम में अत्यधिक व्याकुल हैं, इसलिए वे उद्धव को अपना दूत बनाकर ब्रज भेजते हैं। उद्धव को अपने ज्ञान और योग विद्या पर बहुत अहंकार था, जिसे कृष्ण तोड़ना चाहते थे। ब्रज पहुँचकर उद्धव गोपियों को निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने और योग का अभ्यास करने का उपदेश देते हैं। गोपियाँ, जिनका मन पूरी तरह से कृष्ण के प्रेम में डूबा हुआ है, उद्धव के ज्ञान का उपहास उड़ाती हैं। वे कहती हैं: “ऊधो मन न भए दस बीस।” (अर्थात हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं, जो एक ईश्वर के जाने के बाद किसी और में लग सके, हमारे पास केवल एक ही मन था जो कृष्ण के साथ चला गया)। हिंदी साहित्य में इस प्रसंग का सबसे उत्कृष्ट और मार्मिक वर्णन रीतिकाल और आधुनिक काल के कवियों ने किया है। सूरदास द्वारा रचित ‘सूरसागर’ में गोपियों और उद्धव का संवाद अत्यंत लोकप्रिय है, जहाँ एक भ्रमर (भंवरे) को माध्यम बनाकर गोपियाँ उद्धव पर व्यंग्य करती हैं। कवि जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’ द्वारा रचित ‘उद्धव शतक’ हिंदी साहित्य की कालजयी रचना है, जिसमें ब्रजभाषा की मिठास के साथ गोपियों की विरह-वेदना और उनके तर्कों का सजीव चित्रण मिलता है। गोपियों के अनन्य, निस्वार्थ और अटूट प्रेम (भक्ति) को देखकर ज्ञानी उद्धव का अहंकार पिघल जाता है। वे योग और ज्ञान के मार्ग को छोड़कर स्वयं कृष्ण के प्रेम में लीन हो जाते हैं। उन्हें समझ आता है कि ईश्वर को पाने का सबसे सरल और श्रेष्ठ मार्ग ज्ञान नहीं, बल्कि शुद्ध प्रेम और भक्ति है।
अब हम मथुरा के उद्धव से सीधे मुंबई के उद्धव तक पहुंचते हैं। सभी महाराष्ट्र कि मराठी मानुष की धड़कनों में बसने वाली शिवसेना के सर्वेश्वर उद्धव ठाकरे का अहंकार इतना था कि महाराष्ट्र में
उनकी बिना सहमति के पत्ता भी नहीं हिल सकता है, आज वही उद्धव असली शिवसेना को खो चुके हैं। और अब शिवसेना यूबीटी के अपने सांसदों को भी नहीं बचा पा रहे हैं। 9 में से 6 सांसद बगावत पर उतारू हैं। एकनाथ शिंदे की असली शिवसेना में शामिल होकर राष्ट्रहित और स्वहित में उनका मन पूरी तरह से रमने को आतुर है। उद्धव का न ज्ञान काम में आ रहा है, इसका उपयोग कर वह अपने दल की सेहत को ठीक नहीं रख पा रहे हैं और कहीं योग करते भी नजर नहीं आ रहे हैं, ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बताए योग के लाभों से वह और उनका दल लाभान्वित हो सके। विडम्बना भी ऐसी है कि सांसद उद्धव का साथ छोड़कर जा भी रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि उन्हें उद्धव से कोई शिकायत नहीं है। उद्धव ने उन्हें भरपूर प्यार दिया है। और यह भी कबूल नहीं कर रहे हैं कि उन्हें खरीदा जा रहा है यानि कि वह बिकाऊ होकर अपनी कीमत वसूलकर दूसरे दल में जा जा रहे हैं। उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना यूबीटी में बगावत क्यों हुई, इसके बारे में पहली बार बागी सांसदों ने बात की है। नागेश अष्टीकर ने यूबीटी की इस हाल के लिए शिवसेना नेता संजय राउत को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने ये भी कहा कि उद्धव ठाकरे के लिए और मातोश्री के लिए उनके मन में कोई नाराजगी नहीं है। लेकिन संजय राउत की बातें बहुत ज्यादा हो गईं… हमने पार्टी इसलिए छोड़ी क्योंकि हम पर भरोसा नहीं किया गया। अरे भाई सांसदों भरोसा किया गया था, तभी तो पार्टी ने आपको टिकट दिया था। और जनता ने भी आपको तभी चुना था जब आप उद्धव के साथ नजर आ रहे थे। फिर बीच मझधार में उद्धव और मातोश्री से बिना किसी शिकायत के संजय का नाम लेकर आपको मतदाताओं के प्रेम पर डाका डालने का अधिकार किसने दिया? शायद ऐसे किसी सवाल से माननीय बागी सांसदों का कोई सरोकार नहीं है और सरोकार तो उनका उद्धव से भी नहीं है। मजाक की हद भी होती है क्योंकि नागेश अष्टीकर ही संजय को अपने पितातुल्य बता रहे हैं और कह रहे हैं कि संजय के बयानों से बाकी सांसदों को नाराजगी है। उनका कहना है कि संजय राउत के असंवैधानिक बयानों से मेरे लोग नाराज हैं, मैं नहीं। अगर पैसे लेकर गए हैं तो सबूत पेश करें। हम शिवसेना में इसीलिए जा रहे हैं कि क्षेत्र और अपने कार्यकर्ताओं के लिए कुछ कर सकें। एमपीलेड्स हमारे क्षेत्र के विकास के लिए कम है। शिवसेना यूबीटी में किसी से नाराजगी नहीं। संजय राउत मेरे पिता समान हैं, मेरी कोई नाराजगी नहीं…उन्होंने असंवैधानिक बातें की, जिससे हमारे लोग को बुरा लगा है। उद्धव ठाकरे से कोई नाराजगी नहीं है। किसी से नाराजगी नहीं बहुत प्यार दिया है। उन्होंने ये भी बताया कि शिवसेना में शामिल होने की आधिकारिक घोषणा कब होगी, शिंदे साहिब तय करेंगे।
उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से योगा की खासियत बताई है। मोदी ने कहा कि योग बैलेंस जीवन की कला सिखाता है। उन्होंने बताया कि उम्र बढ़ने के साथ सेहतमंद रहने के लिए योग की बात करते हैं,तो इसका मतलब है- उम्र बढ़ने से क्षमता कम न हो। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि 40 की उम्र में 20 जैसे लचीले हों। 50 की उम्र में 30 जैसे ऊर्जावान रहें। 70 की उम्र में 50 जैसा दिखें और स्वस्थ रहें। इसीलिए ‘हेल्दी एजिंग के लिए योग’ थीम को सिर्फ बुजुर्गों के लिए नहीं, बल्कि सभी उम्र के लोगों के लिए देखा जाना चाहिए। मोदी ने कहा कि विश्व के अलग-अलग हिस्सों से योग की एक से एक अद्भुत तस्वीर आ रही है। पूरा देश योग की उर्जा के चैत्नय से भरा हुआ नजर आ रहा है। पूरा विश्व एक-दूसरे से जुड़ा हुआ दिख रहा है। यही तो योग की ताकत है। योग सबको जोड़ता है। योग सबको साथ लाता है। योग जब स्वभाव में आता है तो मानवीय एकता का आधार पर बन जाता है। योग केवल शारीरिक श्रम का साधन नहीं है। यह किसी एक आयु वर्ग के लिए सीमित नहीं है। योग सबके लिए है। आज के आधुनिक समय में लोग जीवन के असतुंलन से जूझ रहे हैं। उन्हें मशक्कत करनी पड़ रही है। योग बैलेंस जीवन जीने की कला सिखाता है। जब हम हमारे शरीर को सही तरीके से चलाना सीख लेते हैं तो स्वास्थ्य हमारा स्वभाव बन जाता है। योग केवल शरीर के स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य का मार्ग भी दिखाता है।
लगते ऐसे रहा है जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने योग के फायदे अपने विरोधी राजनीतिक दलों को गिनाए हैं। लग ऐसा भी रहा है कि मथुराधीश कृष्ण ने अपने सखा उद्धव का ज्ञान और योग का अहंकार तोड़ने के लिए उन्हें ब्रज भेजा था। और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्धव ठाकरे का अहंकार तोड़ने के लिए उन्हें एनडीए से दूर कर यूपीए के पाले में जाने को मजबूर किया था। तो ब्रज जाने के बाद अहंकार टूटने पर भी मथुराधीश कृष्ण का प्रेम उद्धव के प्रति जस का तस रहा था। और हो सकता है कि योग के फायदे जानकर शिवसेना यूबीटी के मुखिया उद्धव अहंकार रहित होकर अगर मोदी प्रेम में रच-बस जाते हैं तो पूरी शिवसेना एक पाले में उद्धव के नेतृत्व में फिर से एनडीए के संग खड़ी नजर आ सकती है। गोपियों ने उद्धव से कहा था कि हे उद्धव! हमारे पास दस-बीस मन नहीं हैं, जो एक ईश्वर के जाने के बाद किसी और में लग सके, हमारे पास केवल एक ही मन था जो कृष्ण के साथ चला गया। तो अब अगर शिवसेना यूबीटी के उद्धव मोदी से यह कहने की हिम्मत जुटा सकें कि उनका एक ही मन है और वह मोदी संग है… तब महाराष्ट्र के उद्धव 65 साल की उम्र में 45 साल की तरह स्वस्थ नजर आ सकते हैं और उनका दल मूल शिवसेना के रूप में सेहतमंद हो सकता है… क्योंकि जिस तरह बागी सांसद नागेश अष्टीकर को उद्धव और मातोश्री से कोई शिकायत नहीं है, ठीक उसी तरह एकनाथ शिंदे को भी बाला साहब ठाकरे से प्रेम था, है और रहेगा। बात बस इतनी सी है कि तब गोपियों का कृष्ण के सखा उद्धव से कहने का भाव यही था कि ‘ऊधो मन न भए दस बीस’… और इसी तर्ज पर अब महाराष्ट्र के उद्धव, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कह दें कि ‘मोदी जी, मन न भए दस बीस’…।





