
विशेष सम्पादकीय
Bargi Dam Mishap: कुछ सवाल अपनों से और कुछ सरकार से ?
डॉ स्वाति तिवारी

बरगी डैम हादसे से उपजे कुछ सवाल सरकारी महकमो से और कुछ अपने आप से पूछे जाना चाहिए। हालांकि सवाल हर दुर्घटना के बाद अपना फन फैला कर खड़े होते है। ये वे सवाल होते हैं जो सिर्फ मेरे ही दिमाग में नहीं, सबके दिमाग में उठते है, व्यवस्थाओं में भी उठते है ,पर ये डसते नहीं हैं हमको,सरकारों को और व्यवस्थाओं को,इनमें से किसी को भी नहीं .ये डसते रहते हैं केवल पीड़ितों के परिवारों को। बाकी के लिए ये फन नहीं फैन होते हैं। झाग बुदबुदे जो थोड़े दिन में ही बैठ जाते है। बिलकुल श्मशान वैराग्य की तरह जो मरघट से बाहर आते आते और नहा लेने के बाद चला जाता है। हम फिर सांसारिकता में उलझ जाते है। एक के दो करने में लग जाते है। 99 का फेर शुरू हो जाता है।


पर, फिर भी सवाल तो सवाल है इसलिए पूछ ही लेना चाहिए। तो पहला सवाल सरकारी खरीदियों के मानदंड क्या होते है ? और सरकारी खरीदी कमेटी में कोई जनता का उस विधा का विशेषज्ञ व्यक्ति (जन प्रतिनिधि नहीं, नहीं तो खरीदी महंगी और ज्यादा होने की संभावना हो जायगी) क्यों नहीं होता है ? सामान्यत; नहीं ,सरकार ने लाइफ जैकेट ख़रीदे ,क्या उनके लाइफ बचाने के कोई प्रमाण पत्र भी कम्पनी से खरीदने वाले ने लिए ?क्या कोई मार्क जो सुरक्षा की ग्यारंटी दे – जैसे ISI मार्क, भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा भारत में औद्योगिक और उपभोक्ता उत्पादों के लिए जारी किया जाने वाला एक अनिवार्य प्रमाणन चिह्न है, जो भारतीय गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के अनुपालन को दर्शाता है। यह उत्पाद की विश्वसनीयता की गारंटी देता है और बिजली के उपकरणों, स्टील और सीमेंट जैसे उत्पादों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्या इनको देखा जाता है ? या कम कीमत में बड़ा बील बना दें, उन कम्पनियों से माल उठा लिया।

अब सवाल और जांच इनकी खरीदियों की भी होना चाहिए। क्या वहां जहाँ जीवन और मृत्यु का फासला एक लहर से तय हो गया। वहां कोई जवाबदार पर्यटन अधिकारी का कार्यालय नहीं था? कोई अधिकारी की ड्यूटी अनिवार्य नहीं होनी चाहिए ? जो देखे कि नियमों का पालन छोटे कर्मचारी कर रहे हैं या नहीं? कई बार जनता छोटे कर्मचारियों को डरा धमका कर मनमानी भी करती है तो नियंत्रण के लिए नियंत्रण लायक व्यक्ति क्यूँ नहीं था? कहा तो यह तक जा सकता है कि यही वह पहलू है जो इस दर्दनाक घटना का बड़ा कारण बना। पता चला है कि जब कर्मचारी क्रूज में सवार लोगों को लाइफ जैकेट देने की तैयारी कर रहा था तो सभी यात्रियों ने कहा कि हम यहां डांस करेंगे- मस्ती करने आए हैं, हमें लाइफ जैकेट नहीं चाहिए। ऐसे में अब यह जरूरी हो गया है कि सरकार ऐसा नियम बनाए कि बिना लाइफ जैकेट के क्रूज में कोई चढ़ ही नहीं सकता और इतना ही नहीं उस नियम का पूरी ईमानदारी और सख्ती से पालन भी हो।
इस मामले में यह भी कहा जा सकता है कि लाइफ जैकेट पहनने से पहले नाव में चढ़ने क्यों दिया गया? लाख पर्यटकों ने मना किया हो लेकिन कर्मचारियों को चाहिए था कि वह उन्हें लाइफ जैकेट पहनने के लिए बाध्य करता,नियम का पालन ना करने पर टिकिट रद्द करने का नियम भी हो सकता है . लेकिन सिर्फ इसलिए कि जैकेट वापस लेने ,गिनती करने और वापस सुरक्षित रखने की जहमत कौन करें ,और कई बार लोग वापस भी नहीं करते जैसे रेलवे में चादर तकियों के किस्से आते है.तो सबसे आसान दो ही मत, तो लेने की जहमत होगी ही नहीं ?


मैं अमेरिका नियाग्रा फॉल्स की यात्रा के लिए गई थी वहां हम एक बहुत बड़े से जहाज में थे लेकिन टिकिट के साथ एक रेन कोट , बरसाती सेंडिल और सुरक्षा जैकेट दी गई और जब तक आप वह धारण नहीं करते लाइन में नहीं लग सकते और वापसी पर बड़े बड़े ड्रम रखे थे जहाँ आप उन्हें वापस अलग अलग ड्रम में डाल सकते है . चाहें तो साथ ले जा सकते हैं .टिकिट के साथ उनका मूल्य भी शामिल था .क्या हमारे देश में चाहे भेडाघाट की यात्रा हो, चाहे वाटर स्पोर्ट्स की, कहीं इस तरह की कोई व्यवस्था हैं ?

केदार नाथ हादसा हो, या इंदौर का भागीरथपुरा पेय जल काण्ड ,भोपाल गैस त्रासदी हो चाहे बरगी हादसा,हमारी सरकारें केवल सबसे अदने कर्मचारी को नौकरी से निकाल देती है ,थोड़े से ऊपर वाले कर्मचारी को सस्पेंड कर देती है। ये वो मामाजी की गायें होती हैं जिन्हें पहले से ही पता होता है कि अपने को तो हलाल होना ही है .बड़े मुख्यालय अटैच कर दिए जाते हैं ताकि वे दबे हुए सदा चुप की पट्टी बाँध कर रहेगें .उनसे बड़े का कभी कुछ हुआ हो ट्रांसवर से ज्यादा यह मेरे देखने में नहीं आया कभी .

हम विश्व गुरु कहते हैं खुद को पर विश्व में जो व्यवस्थाएं हैं हम उनसे अभी सदियों पीछे हैं ,हमारे यहाँ नदियों में नाव लेकर जानेवाले ,लोगों को कितनी सुरक्षा दी जाती है,तूफ़ान आने का अलर्ट विदेशों में कई दिनों पहले जारी हो जाता है लोग संभल जाते हैं हम अभी इन सब से बहुत दूर है क्योंकि बताया जा रहा है कि बरगी डैम पर जहाँ से लोगों को नाव ले जा रही थी वहां यह व्यवस्था नहीं थी .
अब सवाल खुद से मतलब आम नागरिक से .मित्रों 21 वीं सदी में भी हम जागरूक नहीं होंगे क्या ? हमारे परिवार ,हमारे अनमोल बच्चे हमारा सब कुछ जहाँ दाव पर लगा हो वहां हमें खुद अपने बचाव ,अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर अलर्ट नहीं होना चाहिए .क्या हमें आनंद से ऊपर परिवार की सुरक्षा नहीं रखना चाहिए . पानी की यात्रा कर रहे हैं तो यात्रा के नियम पढना चाहिए ,जानकारी के बगैर आप घूमने निकल पड़ते है .याद रखना चाहिए हवाई जहाज की यात्रा के पहले सेफ्टी रूल्स बताये जाते हैं और सामने रखे भी होते हैं तो पानी भी तो खतरनाक यात्रा ही है जब आपको तैरना नहीं आता तब तो और ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए .बच्चों को तैरना सिखाया जाना भी बहुत जरुरी है ,हमारे देश में इन बातों पर ध्यान नहीं दिया जाता ..जैसे हेलमेट जरुरी है पर हेलमेट सडक किनारे मिलने वाले सस्ते खरीद लेने का चलन है वह भी टैफिक पुलिस को देख कर तो गलती ना तो हेलमेट की है खराब निकला ना टैफिक पुलिस की ,गलती सबसे पहले हमारी होती है, अधिकृत खरीदें ,हर बार सही तरीके से लगाएं और चालान से नहीं मृत्यु से दुर्घटना से स्वयम को बचाए.

बोरिंग में बच्चों के गिरने और निकालने की मशक्कत के बावजूद बोरिंग खुले छोड़े ही जाते है और बच्चे गिर ही रहे हैं। बोरिंग सरकार से ज्यादा हमारी ही लापरवाही से खुले रह जाते हैं ,क्यों नहीं बोरिंग के लिए काम कर रही किसी कम्पनी को बंद कर दिया जाय बोरिंग खुली छोड़ने पर ,पर अभी तक नहीं हुआ इस तरह कभी कुछ ढक्कन को अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए किया भी होगा पर फिर भी—बच्चे गिर ही जाते हैं क्यों? नागरिक जागरूक नहीं होना चाहता .
सतपुड़ा भवन सरकारी बिल्डिंग जल जाती है आग से ,फायर ब्रिगेड वहां तक पंहुच नहीं पाया था ,तो जो करोड़ों का फायरब्रिगेड बड़े भारी भवन को नहीं बचा सका वो गली गुचे की दुर्घटना में क्या ही काम आया होगा कभी ? तो जनता को सवाल पूछने चाहिए करोड़ों का वह सफ़ेद हाथी क्यों ख़रीदा गया ?

इंदौर में भागीरथ पूरा काण्ड हुआ सबसे स्वच्छ शहर में ,पुरस्कृत शहर में तो गाँव गाँव के पेयजल क्या ही पीने लायक होंगें ? तो पुरस्कार वापस करना चाहिए हम स्वच्छ जल नहीं दे पाए स्वच्छ शहर में ?जनता सवाल नहीं करती . और मौन सबसे बड़ा समर्थन हो जाता है मनमानी का .जागरूक करने नगर निगम को रोज गाड़ी में रिकार्डेड गीत बजाना इस बात का प्रमाण हैं हम अभी भी जागरूक नहीं हुए हैं .हम व्यवस्थों से समझोते कर लेते हैं ,सिर्फ इसलिए की जिन्दगी में यूँही कम झंझट है क्या ?पर हम यह क्यों नहीं सोचते ,जिन्दगी ही सबसे कीमती है उस पर जो जो व्यवस्थाएं संकट डालेंगी हम वहां अडेंगे- लड़ेंगे और सवाल खड़े करेंगे ?
अंत में मुख्यमंत्री जी आपसे भी एक सवाल क्या मध्य प्रदेश में वह दिन कभी आएगा और ऐसा सिस्टम विकसित हो जाएगा कि भागीरथपुरा- बरगी जैसे हादसे ही न होने पाए?





