यह लोकतंत्र का खेला है… अब महिला आरक्षण संशोधन बिल की बेला है…

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यह लोकतंत्र का खेला है… अब महिला आरक्षण संशोधन बिल की बेला है…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

पश्चिम बंगाल में अब ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस का हाल ठीक उसी तरह हो गया है, जिस तरह कभी महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शिवसेना का हुआ था। जिस तरह महाराष्ट्र में असली शिवसेना से उद्धव ठाकरे को हाथ धोना पड़ा था, अब ठीक उसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी से सत्ता छिनने के बाद अब तृणमूल कांग्रेस भी छिन गई है। यह परिस्थितियों का खेल है कि महाराष्ट्र में असली शिवसेना के मालिक बने एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री का पद नसीब हो गया था, लेकिन पश्चिम बंगाल की परिस्थितियों के मुताबिक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को नेता प्रतिपक्ष के पद से ही संतोष करना पड़ेगा। हालांकि नेता प्रतिपक्ष रहते हुए भी ऋतब्रत सभी ऋतुओं में राजसी ठाठ-बाट के साथ पूरे पांच साल गुजार सकेंगे। और उनके साथ आए 58 विधायकों को भी सत्ता में रहने का ही अहसास बना रहेगा। अब ममता बनर्जी के पास रुदन करने के अलावा कुछ भी नहीं बचा है। उद्धव ठाकरे तो महाराष्ट्र में फिर भी अपना सम्मान बचाने की हैसियत रखते हैं लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता की जमीन अब पूरी तरह से खिसक चुकी है। और यह सभी जानते हैं कि यह लोकतंत्र का खेला है, लेकिन संवैधानिक तौर पर किसी के सामने भी इस खेला को चुनौती देने की कोई क्षमता नहीं है। पश्चिम बंगाल के साथ ही अब यह साफ हो गया है कि एनडीए और मोदी-शाह ने लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन विधेयक खारिज होने के बाद जो कहा था, वह अब करके दिखाने वाले हैं और 2029 लोकसभा चुनाव के पहले महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पारित होने की पूरी संभावनाएं आकार ले रही हैं।

तो अब नजर पश्चिम बंगाल पर डालते हैं। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हारने के बाद ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस बिखर चुकी है। पार्टी की बैठक में सांसदों और विधायकों की अनुपस्थिति के बाद अब 59 विधायकों के अलग खेमा बनाने के बाद ममता का 28 साल का महल पूरी तरह से ढह चुका है। ममता बनर्जी ने पार्टी में फूट टालने को सभी फ्रंटल विंग्स को भले ही भंग कर दिया हो, लेकिन अब वह ऐसे चक्रव्यूह का हिस्सा बन चुकी हैं जहां से बाहर निकलना असंभव है। अब उन्हें असली तृणमूल कांग्रेस से हाथ धोने के साथ ही केंद्रीय निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पानी पी-पीकर कोसने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। अब, यदि यह ममता के साथ अन्याय है तो यह अन्याय भी न्याय की चासनी में ही डूबा हुआ है। अब यदि तृणमूल कांग्रेस के बागी नेता ऋतब्रत ने 80 में 59 विधायकों के समर्थन का पत्र स्पीकर को सौंपा है। तो इसमें स्पीकर संवैधानिक दायरे में ही ऋतब्रत को मान्यता देने के लिए पूरी तरह से संवैधानिक तौर पर बंधनकारी हैं। और स्पीकर के इस फैसले के साथ ही पश्चिम बंगाल में 28 साल की तृणमूल कांग्रेस ममता विहीन होने को मजबूर है। ममता बनर्जी ने अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस ( टीएमसी) की स्थापना 1 जनवरी 1998 को की थी। अब 2026 में तृणमूल कांग्रेस निर्ममतापूर्वक ममता को त्याग रही है। मजाक की भी हद है कि बागी गुट उसी तरह ममता को अपना नेता बता रहा है, जिस तरह कभी महाराष्ट्र में बागी एकनाथ शिंदे गुट हमेशा बाला साहब ठाकरे को ही अपना नेता बताता रहा था। वहां उद्धव के उत्तराधिकारी होने से बागी खफा थे, तो पश्चिम बंगाल में अभिषेक बनर्जी के उत्तराधिकारी होने से बागी खफा हैं। अब यह बात भी साफ है कि ममता कभी भी अभिषेक से अलग नहीं हो सकती हैं, ऐसे में बागी गुट ममता को अपना नेता मानते हुए बगावत को पूरी तरह एंजॉय करने को स्वतंत्र है। सच यही है कि टीएमसी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को 58 हस्ताक्षरों वाला एक पत्र सौंपा है, जिसमें नेता प्रतिपक्ष के तौर पर ऋतब्रत बंद्योपाध्याय के नाम का प्रस्ताव किया गया है। अध्यक्ष ने इस पत्र को स्वीकार कर लिया है। अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। ममता बनर्जी ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को नेता विपक्ष बनाया था। लेकिन अब ममता-शोभन खेला का हिस्सा बन चुके हैं।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के बड़े नेता अधीर रंजन चौधरी ने टीएमसी में बगावत पर चुटकी ली है। अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि ये लोग सीधे तौर पर डरकर भाजपा के सामने नतमस्तक हो रहे हैं। आज जो (टीएमसी) चुने हुए जनप्रतिनिधि नया दल बनाने का प्रयास कर रहे हैं, उन सभी के खिलाफ कोई न कोई भ्रष्टाचार का आरोप है क्योंकि भाजपा के साथ ईडी, सीबीआई तो थी और है ही, अब बंगाल पुलिस और सीआईडी भी भाजपा के साथ है। अधीर रंजन का मतलब यही है कि बागी विधायक भाजपा के प्रकोप से खुद की रक्षा करने के लिए मोदी-शाह की अभिरक्षा में पहुंच चुके हैं।

तो यही कहा जा सकता है कि खेल खुला है और पिछले 12 साल से खुलकर खेला जा रहा है। अधीर रंजन हों या सोनिया, राहुल-प्रियंका और अखिलेश यादव, ममता और पूरा विपक्ष, सबके पास केवल प्रतिक्रिया देने का अधिकार बचा है, लेकिन यह सबको पता है कि संवैधानिक तौर पर, वह केवल मूक या मुखर दर्शक से ज्यादा कुछ भी नहीं है। यह लोकतंत्र का खेला है… अब मोदी-शाह के मुताबिक महिला आरक्षण संशोधन बिल पारित होने की बेला है…।

 

 

 

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।