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जनभागीदारी से ही रुक पाएगी कालाबाजारी…

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राशन की कालाबाजारी का ज्वर प्रदेश में कहर बरपा रहा है। आखिर चौकीदारी भी कितनी की जाए। जितनी चौकीदारी उससे ज्यादा चोरी के रास्ते की खोज करने में माहिर हैं कालाबाजारी करने वाले। कालाबाजारी करने वाले चोरी और सीनाजोरी करने में माहिर हैं। और जिनके हिस्से का राशन वह डकारते हैं, उनकी मजबूरी यह है कि अगर दुकानदार ने राशन के लिए उसका नाम ब्लैकलिस्टेड कर दिया… तो उसके परिवार के लोगों की भूख कैसे मिटेगी। राशन बांटने वाला दादा है और दादागिरी दिखाने में माहिर भी है। कह दिया मत आना मेरी दुकान में, जा जिससे शिकायत करना हो सो कर देना और बिगाड़ लेना जो बिगाड़ सके। तब फिर किसका दरवाजा खटखटाएगा बेचारा गरीब उपभोक्ता। गांव में सरपंच या शहर में पार्षद, जहां उसकी पहुंच है कहीं भी गुहार लगाए, लेकिन प्यार बरसाने वाला कोई नहीं मिलता है। दुत्कार हर द्वार पर मुंह बाए खड़ी रहती है। सरकारी नंबर पर शिकायत करो, तो जांच करने वाले वही  कनिष्ठ और वरिष्ठ आपूर्ति अधिकारी…जिनकी जांच में सबूतों का खेल शिकायतकर्ता के साथ खेल करने पर आमादा रहता है। ऐसे में तंत्र में बेचारा पिसता है, तो वही गरीब…जिसकी किस्मत काली स्याही से लिखी है और कालाबाजारी की मारी है। भलाई इसी में कि पांच किलो राशन कम मिले, तो कम ले लो। एक महीने का राशन मिल रहा और दुकानदार दो माह की पर्ची पर दस्तखत करवा रहा है, तब भी चुपचाप करने में ही भलाई है। दुकानदार सबूत भी जुटा लेता है और गरीबों के पेट का राशन भी चुरा लेता है। यह खेल आज का नहीं है, शुरु से चल रहा है और शायद इस राशन व्यवस्था के अंत तक चलता रहेगा। यदि अंत करने की हर उपभोक्ता ने नहीं ठानी।
एक कहावत है कि खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी। तब अंग्रेजों ने रानी के राज्य की कालाबाजारी का मन ही बनाया था। पर किसी कागज पर दस्तखत करने की बजाय रानी ने हक की लड़ाई लड़ी। इसमें भले ही खुद को खोया, लेकिन आजादी का जो बीज बोया, तो 90 साल बाद फिर अंग्रेजों को उल्टे पांव ही दौड़ लगानी पड़ी। और देश की आजादी के 75 साल बाद ऐसा संयोग कि भारत से पलायन करने वाले सुनक परिवार का इंग्लैंड निवासी बेटा वहां का प्रधानमंत्री बन गया। यदि राशन उपभोक्ताओं को कालाबाजारी से आजादी चाहिए है तो बिना पूरा राशन पाए दस्तखत करने से परहेज करना ही पड़ेगा। लड़ना ही पड़ेगा और हर उपभोक्ता को जागरूक होकर जनभागीदारी से कालाबाजारी पर रोक लगानी पड़ेगी। क्योंकि दुकानदार के हाथ बहुत लंबे होते हैं। और सरपंच, पार्षद तो ठीक ही हैं, बड़े-बड़े नेताओं और अफसरों तक उनके हाथ पहुंचे हुए रहते हैं। पर जब देश से अंग्रेजों को भगाया जा सकता है, तो कालाबाजारी करने वाले दुकानदारों के लंबे हाथों की लंबाई तो कम की ही जा सकती है।
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति संचालक दीपक सक्सेना ने गड़बड़ी के आरोपी सवा दर्जन खाद्य अफसरों को निलंबित कर और इनमें से कुछ को आरोप पत्र जारी कर एक संदेश देने की कोशिश तो की ही है। पर कठिनाई की एक लंबी प्रक्रिया के बाद ही यह कार्यवाही संभव हो पाई। जांच में जब दुकानदार द्वारा चालबाजी सहित जुटाए सबूतों को दरकिनार कर सीधे गरीब उपभोक्ताओं से संपर्क कर हकीकत को उजागर किया गया, तब जाकर कार्यवाही का यह दिन आ पाया। पर यह साफ हो गया कि साजिश करने वालों का दिमाग सब कुछ मुमकिन बना लेता है, तो कानून के हाथ उससे भी लंबे होते हैं अगर कार्यवाही करने वाला ठान ले तो…। प्रक्रिया ऑनलाइन की गई तो उसमें राशन वितरण का आंकड़ा हाथ से भरने की प्रक्रिया ने ही दुकानदारों को कालाबाजारी का अवसर मुहैया करा दिया। अभी एक और नई व्यवस्था प्रक्रिया में है कि अब तौलने वाली मशीन से तौल का आंकड़ा सीधा अपडेट होगा। तब भी यह संभव है कि औपचारिकता पूरी कर दुकानदार बाद में उसका राशन डकार जाए। इसके बाद यही है कि कैमरा राशन दुकानदार की पूरे समय निगरानी करे। वैसे व्यवस्था तो सतर्कता समिति भी दुरुस्त करा सकती है। इसमें पार्षद-सरपंच जैसे जिम्मेदार नागरिक शामिल रहते हैं, लेकिन मानसिकता ऐसी कि किसी के सिर पर जूं नहीं रेंगती और कालाबाजारी का खेल फलता-फूलता रहता है। जिम्मेदार लोग तो हर माह की 7,8,9 तारीख को आयोजित अन्न उत्सव में भी शामिल नहीं होते।
तो गरीबों की मरण दोनों तरफ से। एक तरफ पूरा देश कोसता है कि सस्ता राशन और फ्री राशन देकर सरकारों ने इनका दिमाग खराब कर दिया है। इससे अब काम करने को मजदूर नहीं मिलते। तो दूसरी तरफ दुकानदार है जो सस्ता या मुफ्त मिलने वाला राशन डकारता रहता है और डकार भी नहीं लेता। लक्ष्मी जी की कृपा मानकर सभी लोग कुछ भी गलत करने की कसौटी पर पूरे खरे उतरकर खुद को चौबीस कैरट सोना साबित करने में कोई कंजूसी नहीं करते। तो चौबीस कैरट सोना राशन की दुकान पर मारा-मारा फिरता है और दुकानदारों की ठोकरें बीसवीं सदी में भी खा रहा था और इक्कीसवीं सदी के बाईस साल पूरे होने तक खाए जा रहा है। और यह भी तय है कि तब तक खाता रहेगा, जब तक जनभागीदारी से कालाबाजारी रोकने का संकल्प नहीं लेगा…।