
‘माखन के लाल’ किताब नहीं, बल्कि अदरक इलायची वाली चाय है!!
संजीव शर्मा
यह किताब नहीं, अनुभवी हाथों से बनी कड़क चाय है.. इसमें संघर्ष के अदरक का स्वाद है तो उपलब्धियों की इलायची की खुशबू भी है। इसमें विद्यार्थियों के चायपत्ती जैसे अनुभव के सुनहरे रंग हैं तो चीनी की मिठास भी। वैसे भी, माखन के हम पहले बैच वाले ‘लालों’ से लेकर बाद के कई बैच तक की जिंदगी के कई अहम पड़ाव यहां मौजूद चाय की टपरी पर ही तय हुए थे।
हम बात कर रहे हैं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा अपने 50 से ज्यादा पूर्व विद्यार्थियों की अनुभव-गाथाओं पर केंद्रित पुस्तक ‘माखन के लाल’ की। यह अपने अपने क्षेत्र के महारथी छात्रों के अनुभवों की पूंजी से भरा एक ऐसा खजाना है, जिसका फायदा हर आने वाली पीढ़ी को मिलता रहेगा। मुझे भी इस स्मृति कोष में अपने अनुभवों की धरोहर सौंपने का सुअवसर मिला है। यह कोई साधारण स्मृति-संग्रह नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है जो पत्रकारिता के सपने देखने वाले हर युवा को सिखाता है कि सफलता का रास्ता कितना कठिन, रोमांचक और प्रेरणादायी हो सकता है। पुस्तक पढ़ते हुए लगता है जैसे पुराने दोस्त उसी चाय की टपरी पर पर एक बार फिर चाय की चुस्कियों के साथ अपनी अपनी सफलता एवं संघर्ष की कहानी सुना रहे हों। इसलिए, मैंने शुरुआत में ही कहा है कि ‘माखन के लाल’ बिल्कुल कड़क अदरक-इलायची वाली चाय है..। इसमें पहली रिपोर्टिंग की घबराहट है तो बाइलाइन छपने की खुशी भी, नौकरी न मिलने का संघर्ष है तो महज 600 रुपए से लेकर 1000 रुपए महीने के वेतन में छिपी समृद्धता भी, ब्रेकिंग न्यूज़ जैसा रोमांच भी है तो किसी मीडिया हाउस में शीर्ष पद तक पहुंचने के सपने के साकार होने की कहानी भी।
‘माखन के लाल’.. एक संस्थान से विश्वविद्यालय बनने की, चार कमरों से विशाल आकर्षक परिसर में बदलने की गाथा है। इसमें चालीस विद्यार्थियों से लाखों विद्यार्थियों का परिवार बनने की महागाथा भी है । यह किताब हमें बताती है कि कैसे माखन के ये लाल
साहस, सत्य और संवेदनशीलता के साथ
विश्वविद्यालय की मूल परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं ।
किताब का सबसे आकर्षक पक्ष सच्चाई के साथ वास्तविक जीवन की कहानियों में समाई विविधता है । यहां सिर्फ बड़े चैनलों के एंकर नहीं, बल्कि छोटे-छोटे शहरों से आए, रात-दिन मेहनत करने वाले, गाँव की खबरों को राष्ट्रीय पटल पर लाने वाले, डिजिटल युग में नई मीडिया क्रांति रचने वाले, मीडिया गुरु से गुल्लक रचने वाले और यहां तक कि शिक्षक एवं कुलगुरू बनकर नई पीढ़ी को तैयार करने वाले पूर्व छात्रों के निजी अनुभव शामिल हैं।
कोई विद्यार्थी बताता है कि MCU (विश्वविद्यालय) की क्लास रूम में हुई बहस आज भी उनके लेखनी में झलकती है, वहीं किसी विद्यार्थी की लेखनी में मैस की चाय और दोस्तों के साथ बिताए ठहाके याद आ जाते हैं। पुस्तक का सबसे सुंदर पहलू यह है कि यह सिर्फ सफलता की चमक नहीं दिखाती, बल्कि इसके पीछे छिपे संघर्ष, आर्थिक तंगी एवं शिक्षकों से लेकर संपादक तक की डांट को भी बेझिझक सामने लाती है। नए विद्यार्थियों के लिए तो यह पुस्तक गीता/बाइबिल/कुरान की तरह मार्गदर्शक है जो बिना किसी बौद्धिक बोझ के सहज भाव से, उनकी भाषा में, मीडिया की तमाम कठिनाइयों के बीच अनुभव पर आधारित आसान रास्ता सुझा देती है।
माखन के लाल को पढ़ते हुए नयी पीढ़ी के छात्रों को ऐसा लगेगा जैसे कि कोई सीनियर बाजू में बैठकर सलाह दे रहा हो कि न तो डरना है, न ही गिरना है..बस, सदैव रीढ़ सीधी रखकर संघर्ष करना है क्योंकि सफलता की रोशनी किसी भी मोड़ पर हमकदम बन सकती है । मसलन, मीडिया के शिखर पर परचम लहरा रहे संजय सलिल कहते हैं कि ‘खुद को झोंकना पड़ता है और नई पीढ़ी में सबसे ज्यादा इसी की कमी दिखाई पड़ रही है। आज लोग स्मार्ट हैं लेकिन मेहनत की कमी है।’ पहले बैच की प्रतिनिधि आवाज़ पदम भंडारी ने बताया कि ‘हमारे बैच में 17 गोल्ड मेडलिस्ट थे’..इससे साफ होता है कि एडमिशन के लिए कितनी जद्दोजहद थी। इसी बैच के प्रकाश पंत पहली बार अखबार में नाम छपने की खुशी आज तक नहीं भूल पायें हैं तो हमारे साथी अजय उपाध्याय बताते हैं कि ‘शुरुआत में पहचान का संकट बाद में सबसे बड़ी ताकत बना एवं जिंदगी की हर चुनौती से लड़ना सिखाया।’
एक विद्यार्थी ने लिखा है कि ‘यह संस्थान मेरे लिए सिर्फ विश्वविद्यालय नहीं था बल्कि भाषा की प्रयोगशाला भी था।’ किसी ने लिखा है कि ‘विश्वविद्यालय ने हमें किताबों से बाहर की दुनिया से सीधे जोड़ा।’ एक अनुभवी विद्यार्थी ने बताया कि ‘पत्रकारिता का सफ़र सिर्फ़ प्रतिभा से तय नहीं होता, उसमें जिद भी चाहिए।’ इसी तरह हर विद्यार्थी ने अपने अनुभव से इस किताब को सींचा और सँवारा है।
खास बात यह भी है कि ‘माखन के लाल’ किताब का प्रकाशन उदंत मार्तंड से शुरू हुए भारतीय पत्रकारिता के 200 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक अवसर पर किया गया है। किताब के पहले ही पन्ने पर मोटे अक्षरों में संपादक की ओर से लिखा गया है- “एक एक ईंट जोड़कर ही इतिहास स्वयं का निर्माण करता है।” इसलिए, किताब में संकलित कई पीढ़ियों के अनुभव पढ़कर मन में एक बात साफ हो जाती है कि MCU सिर्फ डिग्री नहीं देता, बल्कि एक ‘हौंसला’ देता है।
प्रधान संपादक एवं कुलगुरू विजय मनोहर तिवारी, प्रबंध संपादक डॉक्टर पी शशिकला तथा संपादक विनयश्री के नेतृत्व में 32 लोगों की संपादकीय टीम वाकई बधाई की पात्र है क्योंकि उन्होंने
पांच महीनों के परिश्रम से पचास विद्यार्थियों के सपनों में चुस्त संपादन, आकर्षक चित्रों एवं बेहतरीन शीर्षकों से मनमोहक रंग भर दिए हैं। पुस्तक का कवर, आकार, मुद्रण, फ़ॉन्ट, साइज़ सब कुछ अनूठा है । यह पुस्तक अतीत की याद नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा है। पत्रकारिता, संचार, कंटेंट क्रिएशन या मीडिया में अपना भविष्य देख रहे हर युवा को ‘माखन के लाल’ अवश्य पढ़नी चाहिए। यह पुस्तक का पहला संस्करण है । उम्मीद है कि आने वाले संस्करण और भी समृद्ध होंगे तथा माखन परिवार के और भी नगीनों से रूबरू कराएंगे।





