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Ketan Agarwal-Siya Goyal Case: लड़कियों में बढ़ता मानसिक विचलन और समाज की चिंता, आइये अपने बेटों को बचाएं!

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विशेष सम्पादकीय

Ketan Agarwal-Siya Goyal Case: लड़कियों में बढ़ता मानसिक विचलन और समाज की चिंता, आइये अपने बेटों को बचाएं!

                  आँखों में शर्म थी, आँखों का भय था,

                और

             था आँखों में पानी

     आज हमने अपने बच्चों में ये तीनों ही खो दिए!

डॉ .स्वाति तिवारी 

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कल एक मित्र कह रही थी की बेटे की शादी करने के लिए लड़की ढूंढना बेहद मुश्किल काम हो गया है। एक समय था हम अच्छे लड़के तलाशते थे, अब अच्छी लड़की की परिभाषा क्या होना चाहिए समझ नहीं आ रहा! ज्यादातर लड़कियां या तो कहीं पहले से इंगेज हैं या — कह कर वे चुप  हो गई।
मैं उनकी चिंता समझ रही थी वे कहती हैं मुझे अपने लड़के की चिंता है। अब समय आगया है कि हमें अपने लड़के बचाने होंगे। एक बार गलत  लड़की घर आ गई तो सारा घर –.और क्या पता खाने में कुछ मिला दे ,बिल्डिंग से धक्का दे दे ,पहाड़ों से फेंक दें .लड़के इतने चौकन्ने नहीं  होते। वे प्रेम में भरोसा करते हैं और फंस जाते हैं। अब लड़कियों की चिंता करने वाले  माँ बाप कम दिखते हैं और लड़कों की चिंता  करते माँ बाप ज्यादा क्यों ?
अब माएं कहती है- समय खराब है, अपने बेटों को शोषण और खतरों से बचाने का समय आ गया है। समाज में जो हो रहा है उस पर विचार किया जाना बेहद जरुरी है। राजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल जैसे प्रकरणों को देखकर समाज में यह विमर्श उठना स्वाभाविक है कि क्या लड़कियों का स्वभाव बदल रहा है या उनमें क्रूरता बढ़ रही है। लेकिन इस विषय को केवल किसी एक जेंडर के चश्मे से देखना अभी अधूरा होगा। यह बदलाव “लड़कियों के क्रूर होने” का नहीं है, बल्कि “अपराध के जेंडराइजेशन  के खत्म होने” का है क्योंकि अभी अभी भोपाल में बहुचर्चित त्विषा शर्मा का मामला इसके उल्टा था। समर्थ सिंह को सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किया गया। मतलब अपराध अब दोनों ही खुल कर करने लगे है ,बिना डर,बिना खौफ के जिसका अर्थ है अपराध के जेंडराइजेशन मिट गया है
राजा रघुवंशी (इंदौर) और केतन अग्रवाल (पुणे) के प्रकरण वर्तमान में देश के सबसे चर्चित और सनसनीखेज आपराधिक मामलों में से हैं। इन दोनों मामलों में इतनी अविश्वसनीय समानताएं हैं कि मीडिया और पुलिस और शायद हम सब इन्हें एक-दूसरे की ‘कार्बन कॉपी’ या ‘पार्ट-2’ मान रहे हैं। दोनों ही मामलों में परिवार के दबाव में तय हुई शादी/मंगेतर से पीछा छुड़ाने के लिए युवतियों ने अपने प्रेमियों के साथ मिलकर साजिश रची और अपने पार्टनर को गहरी खाई में धकेल कर मौत के घाट उतार दिया। राजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल के मामले यह चेतावनी देते हैं कि आधुनिक समाज में संवादहीनता (Communication Gap) और नैतिक मूल्यों का ह्रास किस स्तर पर पहुँच चुका है। जब व्यक्ति अपनी भावनाओं को सही तरीके से व्यक्त नहीं कर पाता और उसमें धैर्य तथा सहानुभूति का अंत हो जाता है, तो एक सामान्य दिखने वाला इंसान भी ‘मॉन्स्टर’ में तब्दील हो सकता है।
हम दोनों ही मामलों पर एक सरसरी भी नजर डालें तो जो दिखता है वह लगभग एक जैसा ही हैं और एक  ही मानसिकता दिखा रहा है। लड़की उसके मंगेतर के साथ वैवाहिक जीवन नहीं चाहती थी पर उसे बरगलाए रख रही थी। यह कैसी मजबूरी है, यह समझ नहीं आता। छोड़ देना इतना मुश्किल भी नहीं था फिर मार देने और क्रूरता से मारने की यह वृति क्या लड़कियों में पनप रही कोई खरतनाक व्याधि है ?विश्लेष्ण करते हैं तो –
दोनों ही मामलों में युवतियां किसी और से प्यार करती थीं, लेकिन पारिवारिक दबाव के कारण उन्होंने शादी या सगाई की।
दोनों ही घटनाओं में पीड़ितों को किसी खूबसूरत टूरिस्ट या ट्रैकिंग स्पॉट (शिलांग और लोहागढ़ किला) पर ले जाया गया और गहरी खाई का इस्तेमाल करके हत्या को अंजाम दिया गया।
दोनों मामलों में शुरुआत में इसे लूटपाट, अपहरण या पैर फिसलने का सामान्य हादसा दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन पुलिस की तकनीकी जांच (कॉल डिटेल्स और जीपीएस) ने सच सामने ला दिया।
रजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल के मामलों ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। इन दोनों ही घटनाओं में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बेहद सामान्य और सुशिक्षित पृष्ठभूमि से आने वाली युवतियों ने इतनी ठंडी क्रूरता (Cold-blooded cruelty) के साथ हत्या की साजिश रची।
मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से, ये मामले किसी अचानक उठे गुस्से  का नतीजा नहीं हैं, बल्कि यह गहन मानसिक विकृति, सामाजिक दबाव और नैतिक पतन के जटिल ताने-बाने से उपजे अपराध हैं।मनोविज्ञान में जब कोई व्यक्ति प्रेम संबंध और जबरन शादीके बीच फंस जाता है, तो उसके भीतर भयंकर मानसिक द्वंद्व पैदा होता है। मनोवैज्ञानिक इस विषय को कम्पार्टमेंटलाइजेशन और ‘डार्क ट्रायड’ कहते हैं। क्या होता है- पूछने पर पता चला इन युवतियों ने अपने दिमाग में दो अलग-अलग हिस्से बना लिए थे। एक हिस्से में वे एक ‘आदर्श बेटी/मंगेतर’ का नाटक कर रही थीं (जैसे केतन के साथ प्री-बर्थडे मनाना या राजा के साथ हनीमून पर जाना), जबकि दूसरे हिस्से में वे बेहद क्रूरता से हत्या की योजना बना रही थीं। यह कम्पार्टमेंटलाइजेशन उन्हें बिना किसी झिझक या ग्लानि के अपने शिकार के साथ हंसने-बोलने और अगले ही पल उसकी जान लेने की क्रूरता देता है। ऐसे जघन्य और सुनियोजित अपराधों के पीछे अक्सर ‘डार्क ट्रायड’ मानसिक लक्षण पाए जाते हैं, जिसमें तीन चीजें शामिल हैं:

आत्ममोह: खुद की इच्छाओं और सुख को सर्वोपरि रखना। “मुझे जो चाहिए, वो किसी भी कीमत पर चाहिए, चाहे उसके लिए किसी की जान ही क्यों न चली जाए।”

चालाकी: दूसरों का इस्तेमाल करना और अपने लक्ष्य के लिए बेहद चालाकी से झूठ बोलना। (जैसे खुद के अपहरण का नाटक करना या पैर फिसलने की झूठी कहानी गढ़ना)।

साइकोपैथी : उस व्यक्ति के प्रति दया या सहानुभूति का पूरी तरह खत्म हो जाना, जिसके साथ उनका जीवन भर का रिश्ता तय हुआ हैं। अपने पार्टनर को तड़पते हुए देखने या उसे खाई में धकेलने के विचार से भी उनके मन में कोई डर या पछतावा नहीं उपजता है।
पुलिस ने दोनों केस  में तारिफेकाबिल रोल दिखाया। पुलिस को शक तब हुआ जब सिया के बयानों में विरोधाभास मिला। फोन रिकॉर्ड्स खंगालने पर चेतन के साथ उसकी हजारों कॉल्स सामने आईं। आखिरकार गवाहों और तकनीकी सबूतों ने इस खौफनाक साजिश को उजागर कर दिया।
यह एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय है और दुविधात्मक होने लगा हैं। पिछले दो-तीन दशकों में भारतीय समाज में बेटियों के पालन-पोषण (Parenting) के तरीकों में बहुत बड़ा बदलाव आया है। इसे केवल “अधिक लिबरल (उदार)” होने के नजरिए से देखने के बजाय, इसके दोनों पहलुओं—सकारात्मक और चुनौतीपूर्ण—को समझना जरूरी है। बेटियों और लड़कियों के प्रति समाज अपना दृष्टिकोण फिर बदल ले उसके पहले  बेटियों की पेरेंटिंग पर ध्यान दिया जाना बहुत ही जरुरी है .
इस तरह के मानसिक भटकाव से बच्चों को बचाने के लिए माता-पिता और समाज को अपनी एप्रोच में थोड़ा बदलाव करना होगा। उन्हें शिक्षा देना सबसे पहली जरूरत है पर वे दुसरे शहरों में जाकर क्या कर रही हैं ,किसके साथ मेल जोल हैं ,कितना खर्च कर रही है, यह सब अनुशासन की सीमा और आपकी निगरानी की मांग करने लगा है। माता-पिता अब बेटियों को मानसिक और आर्थिक रूप से मजबूत बना रहे हैं ताकि वे जीवन के फैसले खुद ले सकें। लेकिन यह आत्मनिर्भरता उन्हें बेखौफ , बेलगाम ना कर दे, यह देखना भी जरुरी है। स्त्री मुक्ति या स्वतंत्रता का कतई यह अर्थ ना लगाले की उनको वह सब करने की छुट है जो सामाजिक वर्जनाएं थी। स्त्रियां पुरुषों से भी ज्यादा क्रूर और अनैतिक हो जाएं, तो ऐसा नारीवाद पूरी तरह असफल और खोखला है।
ऐसी लड़कियों के कारण, समाज में जो असल पीड़ित महिलाएं हैं, उन्हें भी अब संदेह की नजर से देखा जाने लगेगा। ‘प्रोटेक्शन’ और ‘फ्रीडम’ का भी यूटोपिया फ़ैल रहा है। कई बार माता-पिता आधुनिक दिखने की होड़ में या बेटियों को खुश रखने के लिए उन्हें हर तरह की छूट दे देते हैं, लेकिन उन्हें ‘जवाबदेही’ (Accountability) और सही-गलत की परख करना नहीं सिखा पाते। लिबरल होने का एक मतलब यह भी निकाल लिया गया है कि बच्चों की प्राइवेसी में बिल्कुल दखल न दिया जाए। इसके कारण कई बार लड़कियां सोशल मीडिया के आभासी और नकली संसार (जैसे लाइक्स, फॉलोअर्स, और ऑनलाइन रिलेशनशिप) के प्रभाव में आकर गलत फैसले ले लेती हैं। जब माता-पिता काम में व्यस्त होते हैं, तो वे अपनी व्यस्तता के अपराधबोध (Guilt) को मिटाने के लिए बच्चों को जरूरत से ज्यादा आर्थिक छूट या आजादी दे देते हैं। संवाद की इस कमी के कारण बच्चे माता-पिता से कटना शुरू हो जाते हैं।समाज में एक और विरोधाभास भी दिख रहा है। जहां एक तरफ लड़कियों को लेकर माता-पिता अधिक उदार और प्रगतिशील हुए हैं, वहीं कई बार बेटों को लेकर वे आज भी पुराने ढर्रे पर हैं या उनकी गलतियों को नजरअंदाज कर देते हैं। संतुलन दोनों तरफ जरूरी है। परिवार और समाज के प्रति उनके ‘कर्तव्य’ और ‘नैतिक मूल्यों’ की शिक्षा कहीं पीछे छूट रही है।
तानाशाही के बजाय संवादवादी  पेरेंटिंग की जरूरत का समय है। केवल नियम थोपने या “ऐसा नहीं करना है” कहने के बजाय, बच्चों को उसके पीछे का तर्क समझाना जरूरी है। जब बच्चों को लगता है कि उनकी बात सुनी जा रही है, तो वे बाहर सहारा नहीं ढूंढते।
अगर बच्चा परेशान है, गुस्से में है या किसी बात से असहमत है, तो उसकी बात को “बकवास” कहकर खारिज न करें। पहले उसकी भावना को समझें, फिर उसे सही-गलत का अंतर बताएं।
और, जब ख़ास कर लड़कियां भावनात्मक रूप से कमजोर हो रही हों तो विशेष चौकस नजर की जरूरत को समझना होगा। अगर बच्चा अचानक बहुत चुप रहने लगे, कमरे में बंद रहे, चिड़चिड़ा हो जाए, या उसकी संगति अचानक बदल जाए, तो यह डांटने का नहीं बल्कि उसके साथ बैठकर प्यार से बात करने या किसी प्रोफेशनल काउंसलर की मदद लेने का समय होता है।
दोनों ही मामलों में युवतियों ने अकेले काम नहीं किया, बल्कि अपने प्रेमियों को भी इस खूनी खेल में शामिल किया। मनोविज्ञान में इसे ‘शेयर्ड साइकोसिस’ कहा जाता है, जहाँ दो लोग एक-दूसरे के प्यार या जुनून में इस कदर अंधे हो जाते हैं कि वे एक-दूसरे के अनैतिक और आपराधिक विचारों को सही मानने लगते हैं। सोनम द्वारा पति की लाइव लोकेशन शूटरों को भेजना और सिया द्वारा इंटरनेट पर ‘मर्डर के तरीके’ खोजना यह दर्शाता है कि आज की युवा पीढ़ी का एक हिस्सा वास्तविक दुनिया और स्क्रीन (डिजिटल दुनिया) के अंतर को भूल रहा है।
समाज में एक और विचार तेजी से विकसित हो रहा है। पुरानी सामाजिक व्यवस्थाएं बेहतर थी ,संस्कार और जीवन मूल्य थे ,और सबसे बड़ी बात आँखों में शर्म थी . आँखों का भय था .और आँखों में पानी भी था, आज हमने अपने बच्चों में ये तीनों ही खो दिए.
अब समय आ गया है जब पेरेंट्स को पेरेंटिंग के तौर तरीकों के बारे में नए सिरे से सोचना होगा ताकि भविष्य में इस तरह के दर्दनाक हादसों की पुनरावृत्ति को समय पर नियंत्रित किया जा सके या यूं कहें रोका जा सके।

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