
कोर्ट में लगे मामलों में देरी, त्रुटि, चूक के लिए दोषी सरकारी अफसरों से होगी नुकसान की वसूली
भोपाल. सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और अन्य न्यायालयों में लगे न्यायालयीन प्रकरणों में विभागीय अधिकारियों के मत में यदि किसी प्रकरण में देरी, त्रुटि या चूक और विषय वस्तु से भिन्नता के कारण राज्य शासन के विरुद्ध प्रतिकूल आदेश पारित होता है तो ऐसे दोषी शासकीय सेवक की जिम्मेदारी तय करते हुए उससे शासन को हुए नुकसान की राशि की वसूली की जाएगी और उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही भी की जाएगी।
सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी विभागीय अधिकारियों को कहा है कि उच्च न्यायालय में मध्यप्रदेश राज्य बनाम रामकुमार चौधरी प्रकरण में शासकीय सेवक की जिम्मेदारी निर्धारित करते हुए अनुशासनात्मक कार्यवाही करने एवं शासन को हुई हानि के लिए समरुप वसूली हेतु निर्देशित किया गया है। इस निर्देश का कड़ाई से पालन किया जाना सुनिश्चित किया जाए।
राज्य मुकदमा प्रबंधन नीति के अनुसार राज्य की ओर से या राज्य के विरुद्ध कोई भी अपील महाधिवक्ता के अभिमत और विधि विभाग की अनुमति के बिना दायर नहीं की जा सकती है। पुनरीक्षण के लिए यदि महाधिवक्ता कार्यालय या किसी विभाग के अभिमत में राज्य के हित में या न्याय के हित में आवश्यक हो तो विधि विभाग से अलग से अनुमति लेने की जरुरत नहीं होगी। महाधिवक्ता या कोई भी शासकीय अधिवक्ता यदि यह अभिमत देता है कि प्रकरण न्यायालय में चुनौती देने योग्य नहीं है तब संबंधित विभाग राज्य के विधि विभाग से विधिक अभिमत ले सकता है।
यदि विधि विभाग अपील दाखिल करने का अभिमत नहीं देता है तब भी संबंधित विभाग यदि उचित समझे तो याचिका, अपील, वाद आदि न्यायालय में दायर करने का निर्णय ले सकता है। ऐसी स्थिति में विभाग एक प्रभारी अधिकारी नियुक्त करेगा जो महाधिवक्ता से संपर्क कर सरकार की ओर से याचिका, अपील वाद दाखिल करेगा या न्यायालय में जवाबदावा प्रस्तुत कर मामले का प्रतिवाद करेगा। ऐसी स्थिति में महाधिवक्ता कार्यालय द्वारा अपील, पुनरीक्षण दायर किया जाएगा परन्तु कोई भी अन्य निजी अधिवक्ता शासन की ओर से अपील या वाद दाखिल नहीं कर सकेगा।





