पुस्‍तक ‘’घर बैठे घुमक्कड़ी’’  :आधुनिक घुमक्कड़ी का दिलचस्प दस्तावेज़

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पुस्‍तक ‘’घर बैठे घुमक्कड़ी’’  :आधुनिक घुमक्कड़ी का दिलचस्प दस्तावेज़

कुमार सिद्धार्थ

 

हिंदी साहित्य में यात्रा-वृत्तांत की परंपरा हमेशा समृद्ध और प्रभावशाली रही है। राहुल सांकृत्यायन, अमृतलाल वेगड़, विद्यानिवास मिश्र और निर्मल वर्मा जैसे लेखकों ने यात्राओं के बहाने केवल भूगोल नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, प्रकृति और मनुष्य के अंतर्मन को भी समझने का प्रयास किया। बदलते समय में तकनीक ने यात्रा की परिभाषा को नया आयाम दिया है। अब दुनिया केवल रेल, सड़क और हवाई जहाज से नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन, इंटरनेट और यूट्यूब के माध्यम से भी देखी और महसूस की जा रही है।

वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक और साहित्य-संवेदनशील लेखक ब्रजेश कानूनगो की नई पुस्तक “घर बैठे घुमक्कड़ी” हिंदी यात्रा-साहित्य में बिल्कुल नए प्रयोग की तरह सामने आती है।

न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली से प्रकाशित यह पुस्तक 217 पृष्ठों की है तथा इसका मूल्य 399 रुपये रखा गया है। पुस्तक का उपशीर्षक “दुनिया को जानने की प्रक्रिया में कुछ नोट्स” इसकी मूल प्रकृति और उद्देश्य को सटीक ढंग से व्यक्त करता है।

ब्रजेश कानूनगो लंबे समय से पत्रकारिता और वैचारिक लेखन से जुड़े रहे हैं। सामाजिक सरोकार, सांस्कृतिक चेतना और समकालीन विषयों पर उनकी सजग दृष्टि उनके लेखन की प्रमुख पहचान है। उनकी भाषा में पत्रकारिता की स्पष्टता है तो साहित्य की आत्मीयता भी। यही गुण इस पुस्तक को सामान्य यात्रा-वृत्तांतों से अलग पहचान देते हैं।

यह पुस्तक पारंपरिक यात्रा संस्मरण नहीं है। लेखक ने स्वयं स्वीकार किया है कि कोरोना काल और बदलती परिस्थितियों में उन्होंने “घर बैठे” दुनिया की यात्राएँ कीं। यूट्यूब, ट्रैवल व्लॉग्स और डिजिटल माध्यमों के जरिए उन्होंने विभिन्न देशों, संस्कृतियों, प्राकृतिक स्थलों और मानवीय जीवन को देखा-समझा और उन्हीं अनुभवों को पुस्तक में शब्द दिए।

यहीं से यह पुस्तक अपने समय की एक नई अवधारणा प्रस्तुत करती है- “डिजिटल घुमक्कड़ी”। यह विचार कि बिना किसी स्थान पर भौतिक रूप से पहुंचे भी मनुष्य दुनिया को समझ सकता है, आज के तकनीकी युग का बड़ा सच है। ब्रजेश कानूनगो ने इस अनुभव को केवल सूचनात्मक नहीं रहने दिया, बल्कि उसे संवेदनात्मक और वैचारिक स्वरूप भी प्रदान किया है।

पुस्तक का विषय-विस्तार अत्यंत व्यापक है। इसमें प्रकृति, पर्यावरण, विज्ञान, पर्यटन, संस्कृति, समुद्र, पहाड़, सभ्यताएं, वन्य जीवन, मानवीय संबंध और आधुनिक ट्रैवल संस्कृति तक अनेक विषय शामिल हैं। पुस्तक के अध्यायों के शीर्षक ही पाठक में उत्सुकता जगाते हैं। “सूर्योदय और सूर्यास्त का अलौकिक सुख”, “अद्भुत और दिलचस्प प्रक्रिया है ग्रहों का निर्माण”, “धरती पर बिखरे इंद्रधनुष”, “समुद्र में डूबते देश”, “चेरी ब्लॉसम”, “काउच सर्फिंग और हिच हाइकिंग” तथा “जैव विविधता” जैसे विषय लेखक की जिज्ञासु और व्यापक दृष्टि को दर्शाते हैं।

पुस्तक की एक बड़ी विशेषता यह है कि लेखक केवल दृश्य-वर्णन तक सीमित नहीं रहते। वे हर विषय के पीछे छिपे सामाजिक, वैज्ञानिक और मानवीय पक्ष को भी सामने लाते हैं। उदाहरण के लिए “सूर्योदय और सूर्यास्त” वाले अध्याय में वे केवल प्रकृति की सुंदरता का वर्णन नहीं करते, बल्कि उसके वैज्ञानिक कारणों और मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर उसके प्रभाव की भी चर्चा करते हैं। इसी तरह ग्रहों और तारों के निर्माण से जुड़े अध्यायों में विज्ञान को बेहद सरल और रोचक भाषा में प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष आधुनिक ट्रैवल व्लॉगिंग संस्कृति पर लेखक की टिप्पणियाँ हैं। लेखक ने विस्तार से बताया है कि किस प्रकार यूट्यूब और डिजिटल मीडिया ने यात्रा को लोकतांत्रिक बना दिया है। अब केवल संपन्न वर्ग ही नहीं, बल्कि सामान्य लोग भी दुनिया के दूरस्थ हिस्सों को देख और समझ सकते हैं। पुस्तक में हरीश बाली, वरुण वागीश, माउंटेन ट्रेकर, नोमैडिक इंडियन और अन्य भारतीय ट्रैवल व्लॉगर्स का उल्लेख करते हुए लेखक ने डिजिटल युग के इस नए सांस्कृतिक परिवर्तन को रेखांकित किया है।

“काउच सर्फिंग और हिच हाइकिंग” जैसे अध्याय पुस्तक को और अधिक समकालीन तथा जीवंत बनाते हैं। लेखक इन माध्यमों के जरिए केवल यात्रा तकनीकों की जानकारी नहीं देते, बल्कि यह भी बताते हैं कि दुनिया के अलग-अलग देशों में लोग किस तरह एक-दूसरे पर भरोसा कर नए सांस्कृतिक रिश्ते बना रहे हैं। इन अध्यायों में मानवीय आत्मीयता और वैश्विक नागरिकता की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

भाषा की दृष्टि से यह पुस्तक अत्यंत सहज, आत्मीय और संवादधर्मी है। लेखक पाठकों पर ज्ञान का दबाव नहीं डालते, बल्कि उन्हें अपने साथ यात्रा पर ले चलते हैं। कई जगह ऐसा लगता है जैसे कोई मित्र बैठकर दुनिया के रोचक अनुभव साझा कर रहा हो। यही शैली पुस्तक को बोझिल होने से बचाती है।

ब्रजेश कानूनगो की संवेदनशीलता पुस्तक के अनेक प्रसंगों में दिखाई देती है। वे केवल पर्यटन स्थलों की चमक नहीं दिखाते, बल्कि वहां के आम लोगों, उनकी जीवनशैली, संघर्ष और संस्कृति को भी महत्व देते हैं। यही कारण है कि पुस्तक कई बार यात्रा-वृत्तांत से आगे बढ़कर सामाजिक और सांस्कृतिक दस्तावेज़ का रूप ले लेती है।

हालांकि पुस्तक की कुछ सीमाएँ भी हैं। कई अध्यायों में सूचनात्मक विस्तार इतना अधिक हो जाता है कि यात्रा-वृत्तांत की मूल आत्मीयता थोड़ी कम महसूस होती है। कुछ स्थानों पर पाठक को लगता है कि लेखक ने इंटरनेट आधारित सामग्री पर अधिक भरोसा किया है। यदि कुछ प्रसंगों में लेखक अपने निजी अनुभवों, स्मृतियों और आत्मकथात्मक टिप्पणियों को और विस्तार देते तो पुस्तक का प्रभाव और गहरा हो सकता था।

इसके बावजूद “घर बैठे घुमक्कड़ी” हिंदी के समकालीन यात्रा साहित्य में एक महत्वपूर्ण और प्रयोगधर्मी कृति कही जा सकती है। यह पुस्तक बताती है कि घुमक्कड़ी केवल भौगोलिक दूरी तय करने का नाम नहीं, बल्कि दुनिया को समझने की मानसिक प्रक्रिया भी है। डिजिटल समय में यात्रा की यह नई अवधारणा हिंदी पाठकों के लिए ताज़गी भरा अनुभव प्रस्तुत करती है।

आज जब मनुष्य तकनीक से घिरा हुआ है और वास्तविक यात्राओं के अवसर सीमित होते जा रहे हैं, तब यह पुस्तक एक नए प्रकार की यात्रा-संस्कृति का परिचय कराती है। यह पाठकों को केवल दुनिया देखने के लिए नहीं, बल्कि उसे समझने और महसूस करने के लिए प्रेरित करती है।

ब्रजेश कानूनगो की “घर बैठे घुमक्कड़ी” उन पाठकों के लिए विशेष रूप से पठनीय है जो यात्रा, प्रकृति, संस्कृति, विज्ञान और दुनिया के विविध अनुभवों में रुचि रखते हैं। यह पुस्तक मनोरंजन के साथ-साथ दृष्टि का विस्तार भी करती है। यही किसी सार्थक पुस्तक की सबसे बड़ी सफलता मानी जानी चाहिए।

 

( समीक्षक कुमार सिद्धार्थ, पिछले चार दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। आप पर्यावरण, शिक्षा, सामाजिक आयामों पर देशभर के विभिन्‍न अखबारों/पत्रिकाओं में लिखते रहते हैं।)

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