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वो तीन बीघा गलियारा… अब पहले जैसा नहीं रहेगा…

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वो तीन बीघा गलियारा… अब पहले जैसा नहीं रहेगा…

कौशल किशोर चतुर्वेदी

भारत के कूचबिहार जिले में स्थित तीन बीघा गलियारे का उपयोग बांग्लादेश अपने दहग्राम-अंगरपोटा एन्क्लेव तक पहुंचने के लिए करता है। अब पश्चिम बंगाल में आजादी के बाद पहली बार भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने पर भारतीय क्षेत्र तीन बीघा से गुजरने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की निगरानी और जांच प्रक्रिया को अधिक कठोर कर दिया गया है। तीन बीघा कॉरिडोर के बिना फेंसिंग वाले हिस्से का इस्तेमाल अवैध गतिविधियों और सीमा पार आवाजाही के लिए होता था। लेकिन केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार होने के कारण सुरक्षा बलों को स्थानीय स्तर पर अब अधिक सहयोग मिल रहा है। पूर्ववर्ती सरकार के विपरीत, भाजपा सरकार ने अटकी हुई बाड़बंदी यानी फेंसिंग को प्राथमिकता दी है। बीएसएफ को रुकी हुई जमीन सौंपने की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है ताकि ‘जीरो पॉइंट’ पर फेंसिंग की जा सके।

तीन बीघा गलियारे के संदर्भ में 26 जून की तारीख खास तौर पर महत्वपूर्ण है। इसीलिए हम आज इसकी बात कर रहे हैं। सबसे पहले हम यह जानते हैं कि क्या है वो तीन बीघा गलियारा, जिसको भारत ने 26 जून 1992 को बांग्लादेश को 999 सालों के लिए दे दिया था ?भारत ने तीन बीघा गलियारा आज ही के दिन यानी 26 जून 1992 को 999 सालों के लिए बांग्लादेश को लीज पर दे दिया था। अब इस गलियारे से बांग्लादेशी नागरिक बिना वीजा के आ-जा सकते हैं। तीन बीघा कॉरिडोर भारतीय जमीन का वो हिस्सा है जो दोनों देशों की सीमा पर स्थित है। 26 जून 1992 में इसे बांग्लादेश को लीज पर दिया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य बांग्लादेश के दहग्राम-अंगरपोटा एन्क्लेव को सीधे जमीनी रास्ते से बांग्लादेश से जोड़ना था। केवल यही जगह है जहां से बांग्लादेशी नागिरक बिना पासपोर्ट और बिना वीजा के आना-जाना कर सकते हैं। यही नहीं इस कॉरिडोर में आने जाने वालों की जांच भारतीय सुरक्षा अधिकारी नहीं कर सकते। यह भारत की ही जमीन है, लेकिन बांग्लादेश इसका उपयोग कर सकता है। यह गलियारा भारत के पश्चिम बंगाल राज्य के कूच बिहार जिले में स्थित है और बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन से लगता है। यह एक छोटा भूमि क्षेत्र (लगभग 3 बीघा यानी 1.15 एकड़) है। भारत ने इस भूमि को बांग्लादेश को 999 वर्षों के लिए पट्टे पर दिया, लेकिन भारत का इस पर अब भी पूरा अधिकार है।

दरअसल, यह कहानी बांग्लादेश के विभाजन से शुरू होती है। यह समस्या आजादी के समय से थी, लेकिन असली कहानी बांग्लादेश के बनने के बाद शुरू हुई। उस समय दोनों देशों की सीमा पर कई ऐसे क्षेत्र थे जो प्रशासनिक रूप से तो एक देश के अधिकार में थे, लेकिन उन तक पहुंचने का रास्ता दूसरे देश से होकर गुजरता था। इससे नागरिकों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। इसी समस्या को देखते हुए साल 1971 में दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ। 1974 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान के बीच हुई संधि के तहत इस गलियारे को बांग्लादेश को सौंपने का फैसला किया गया था। हालांकि इसे लागू करने में 18 साल लग गए और 1992 में इसे अंतिम रूप दिया गया।

भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख मुजीबुर्रहमान के नेतृत्व में हुए इस समझौते में पहली बार तीन बीघा कॉरिडोर का जिक्र हुआ। समझौते के अनुसार, बांग्लादेश को दक्षिण बेरूबारी इलाके का एक हिस्सा भारत को देना था। बदले में यह तय हुआ कि भारत उसे तीन बीघा जमीन सौंप देगा ताकि बांग्लादेशियों के लिए आवागमन आसान हो सके। इस समझौते को लैंड बाउंड्री एग्रीमेंट कहा गया। कुछ ही समय बाद बांग्लादेश ने बेरूबारी का हिस्सा भारत को दे दिया, लेकिन भारत से उसे तीन बीघा गलियारा नहीं मिल पा रहा था। इसकी वजह कई कानूनी अड़चनें थीं। इस फैसले का पश्चिम बंगाल के स्थानीय लोगों और विपक्षी दलों ने विरोध किया था। कुछ लोगों को डर था कि इससे सुरक्षा संबंधी खतरे पैदा हो सकते हैं। मामला उलझता देख दोबारा बैठक हुई और साल 1982 में फिर से समझौता हुआ, लेकिन तब भी काम नहीं बन सका। आखिरकार यह तय हुआ कि गलियारा दिन में 6 घंटों के लिए बांग्लादेशी लोगों के आने-जाने के लिए खोला जाएगा। पर तीन बीघा कॉरिडोर को लेकर एक बड़ा समझौता 26 जून 1992 में हुआ। इसके तहत भारत में पड़ने वाला 178 x 85 वर्ग मीटर का यह क्षेत्र 999 सालों के लिए बांग्लादेश को लीज पर दे दिया गया। हालांकि इस क्षेत्र पर पूरा नियंत्रण भारत का ही रहा। यानी यह भारत की ही जमीन है, लेकिन बांग्लादेश इसका उपयोग कर सकता है। इससे सालों से ज्यादा समय से टुकड़ों में रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों को बड़ी राहत मिली। इसकी मदद से बांग्लादेशी अब अपनी मर्जी से कभी भी भारत से बाहर जाने और अपने देश में प्रवेश करने के लिए इस सड़क का उपयोग कर सकते हैं। तीन बीघा कॉरिडोर को लेकर एक और समझौता सितंबर 2011 में हुआ। यह समझौता तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के बीच हुआ था। उम्मीद की जा रही थी कि तभी तीस्ता नदी का विवाद भी सुलझ सकेगा, लेकिन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दौरे पर न जाने के कारण यह नहीं हो सका। 19 अक्टूबर को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने घोषणा की कि तीन बीघा गलियारा अब चौबीसों घंटे खुला रहेगा। यह दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण समझौता था।

2015 में भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि सीमा समझौता हुआ। जिसमें सभी एन्क्लेव्स (छोटे-छोटे विवादित क्षेत्र) का आदान-प्रदान किया गया। इसके बाद दहग्राम-अंगरपोटा सहित सभी एन्क्लेव्स का मुद्दा स्थायी रूप से सुलझ गया लेकिन तीन बीघा गलियारा बांग्लादेश के उपयोग में ही रहा। अब इसको वापस लेने के लिए तकनीकी रूप से भारत एकतरफा कार्रवाई कर सकता है। लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा और भारत-बांग्लादेश संबंधों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

भारत और बांग्लादेश ने तीन बीघा समझौते पर हस्ताक्षर किए, लेकिन प्रभावित निवासियों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। तीन बीघा और उसके आसपास के इलाकों के निवासियों, जो इस समझौते से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे, के विरोध की दयनीय आवाजों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। स्थानीय आबादी की सबसे बड़ी समस्या डाकू हैं जो नियमित रूप से बांग्लादेश सीमा से हमले करते हैं। घुसपैठ और तस्करी यहां की सबसे बड़ी समस्या रही है। पर अब उम्मीद की जा सकती है कि पश्चिम बंगाल में डबल इंजन की सरकार बनने के बाद वो तीन बीघा गलियारा… अब पहले जैसा नहीं रहेगा…।

 

लेखक के बारे में –

कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पिछले ढ़ाई दशक से सक्रिय हैं। पांच पुस्तकों व्यंग्य संग्रह “मोटे पतरे सबई तो बिकाऊ हैं”, पुस्तक “द बिगेस्ट अचीवर शिवराज”, ” सबका कमल” और काव्य संग्रह “जीवन राग” के लेखक हैं। वहीं काव्य संग्रह “अष्टछाप के अर्वाचीन कवि” में एक कवि के रूप में शामिल हैं। इन्होंने स्तंभकार के बतौर अपनी विशेष पहचान बनाई है।

वर्तमान में भोपाल और इंदौर से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र “एलएन स्टार” में कार्यकारी संपादक हैं। इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में एसीएन भारत न्यूज चैनल में स्टेट हेड, स्वराज एक्सप्रेस नेशनल न्यूज चैनल में मध्यप्रदेश‌ संवाददाता, ईटीवी मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ में संवाददाता रह चुके हैं। प्रिंट मीडिया में दैनिक समाचार पत्र राजस्थान पत्रिका में राजनैतिक एवं प्रशासनिक संवाददाता, भास्कर में प्रशासनिक संवाददाता, दैनिक जागरण में संवाददाता, लोकमत समाचार में इंदौर ब्यूरो चीफ दायित्वों का निर्वहन कर चुके हैं। नई दुनिया, नवभारत, चौथा संसार सहित अन्य अखबारों के लिए स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं।